भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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304 अपराजितपृच्छा पर छह पदों का लोप करके— इस तरह चौबीस पदों का लोप कर दें। ईशाद्या रुद्रदासान्ता लता वीथ्यन्तरे गताः । एवं पदानि जायन्ते षट्त्रिंशदधिकं शतम् ॥ 25 ॥ बाह्यकर्णे तु चत्वारः प्रस्थाप्या नवभिः पदैः । सप्त सप्त तदाश्रिता योज्या अष्टाष्टभिः पदैः ॥ 26 ॥ तन्मानानुक्रमाद्योज्याः शेषा अष्टपदास्तथा । एवं सहस्रपदैर्युक्तं सर्वतोभद्रलक्षणम् ॥ 27 ॥ इति सहस्रपदं सर्वतोभद्रवास्तु। ईशादि से रुद्रदासान्त तक इन वीथियों के अन्तर में लता जाती है। इस प्रकार एक सौ छत्तीस पद बनते हैं। चारों बाह्य कर्णों पर नव पदों की प्रस्थापना करें तथा उनके अश्रित आठ-आठ पदों की सात-सात ओर प्रस्थापित करें। उन्हीं के मानानुक्रम से शेष आठो पदों को भी जोड़े इस तरह हजार पदों वाला सर्वतोभद्र लक्षण का वास्तु बनता है। ईशस्तथा च पर्जन्यो जयो माहेन्द्र एव च। आदित्यः सत्यभृशौ चाऽन्तरिक्षान्ताऽष्ट पूर्वतः ॥ 28 ॥ अग्निः पूषा च वितथो गृहक्षतो यमस्तथा। गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगान्ताश्चाष्ट दक्षिणे ॥ 29 ॥ पितरो दौवारिकश्च सुग्रीवः पुष्पदन्तकः । वरुणश्चासुरः शोषः पापयक्ष्मा तु पश्चिमे ॥ 30 ॥ रोगोनागस्तुमुख्यश्च भल्लाटः सोम एव च। गिर्यदितिर्दितिश्चैवाष्टावुत्तरदिशि क्रमात् ॥ 31 ॥ इसी प्रकार ईश, पर्जन्य, जय, महेन्द्र, आदित्य, सत्य, भृश और अन्तरिक्ष— ये आठों पूर्व दिशा की ओर; अग्नि, पूषा, वितथ, गृहक्षत, यमगन्धर्व, भृङ्गराज और मृग— ये आठों दक्षिण दिशा की ओर; पितर, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, असुर, शोष और पापयक्ष्मा पश्चिम दिशा की ओर; रोग, नाग, मुख्य, भल्लाट, सोम, गिरि, अदिति, दिति— ये आठों क्रम से उत्तर दिशा की ओर होती हैं। ब्रह्मकर्णे तथा चाष्टावीशान्यादि क्रमेण तु। आपश्चैवापवत्सश्च ईशकर्णे तु संश्रितौ ॥ 32 ॥ सविता चैव सावित्री आग्नेय्यां तु समाश्रितौ । इन्द्र इन्द्रजयश्चैव नैर्ऋत्यां ब्रह्मणः स्थितौ ॥ 33 ॥