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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-६० ३१३ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टनक्रसमारूढ क्षेत्रपैः परिवेष्टित जलाधिराज नमोऽस्तुते ॥ 27 ॥ और, पश्चिम दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में कमल धारण करने वाले, मगर पर सवारी करने वाले जलेश्वर वरुणदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे आठ नक्रों-मगरों पर समारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित जलाधिराज वरुणदेव! हम आवाहन मन्त्रों से आपको बलि-पूजा निवेदित करते हुए नमस्कार करते हैं कि आप इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। वायव्यकोण्यां वायुदेवपूजानिर्देशमाह – आँ वायव्यां तु दिशापते ध्वजहस्त महाबल। मृगपृष्ठसमारूढ वायुदेव यथाविधि ॥ 28 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टमृगारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित पवनाधिराज नमोऽस्तु ते ॥ 29 ॥ इसी प्रकार वायव्य दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में ध्वज धारण करने वाले तथा मृगारूढ़ वायुदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे आठ मृगारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित, पवनाधिराज वायुदेव आपको नमस्कार है। हम आवाहन मन्त्रों से आपको बलि-पूजा निवेदन करते हैं, इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। उत्तरदिशायां निधिराजपूजानिर्देशमाह – आँ उत्तरस्यां दिशापते निधिहस्त महाबल। हस्तिस्कन्धसमारूढ निधिराज यथाविधि ॥ 30 ॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टगजारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित निधिराज नमोऽस्तु ते ॥ 31 ॥ और, उत्तर दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथों में निधि धारण किए हुए, हाथी के कन्धे पर सवारी करने वाले निधिराज कुबेर की भी यथाविधि पूजा करें। कहें. कि 'हे आठ गजारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित निधिराज कुबेरदेव आपको नमस्कार है, आपको हम आवाहन मन्त्रों के साथ बलि-पूजा निवेदन करते हैं, उसे आप ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा। ईशान्यां रुद्रदेवपूजानिर्देशमाह – आँ ईशान्यां तु दिशापते शूलहस्त महाबल। वृषपृष्ठसमारूढ रुद्रदेव यथाविधि ॥ 32 ॥

314 अपराजितपृच्छा आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टवृषारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित भूतराज नमोऽस्तु ते ॥ ३३ ॥ और, ईशानकोण की दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथ में शूल को धारण करने वाले और बैल की पीठ पर सवारी करने वाले रुद्र देव की भी यथाविधि पूजा करे। कहें कि 'हे अष्टवृषारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित भूतराज रुद्रदेव! आपको नमस्कार है; हम आपको आवाहन मन्त्रों से बलि-पूजा निवेदित करते हैं; इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा।' अधस्तात्तु विष्णुदेवपूजानिर्देशमाह - आँ अधस्तात्तु दिशापते चक्रहस्त महाबल। गरुडं च समारूढ विष्णुदेव यथाविधि ॥ ३४॥ आवाहनमन्त्रैः पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टगरुडस्थ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित जगत्पते नमोऽस्तु ते ॥ ३५ ॥ इसी प्रकार अधस्तात्तु (नीचे स्थित) दिशाधिपति, महाबलवान, हाथ में चक्र को धारण करने वाले गरुड़ की सवारी करने वाले विष्णुदेव की भी यथाविधि पूजा करे। इस अवसर पर कहें कि 'हे आठ गरुड़ों पर सवारी करने वाले क्षेत्रपालों से परिवेष्टित जगत्पते! आपको नमस्कार है; हम आवाहन मन्त्रों से पूजा-बलि आपको निवेदित करते हैं; इसे आप ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा।' अथोर्ध्वायां ब्रह्मदेवपूजानिर्देशमाह - आँ ऊर्ध्वायां तु दिशापते अक्षहस्त महाबल। हंसे चैव समारूढ ब्रह्मदेव यथाविधि ॥ ३६॥ आवाहनमन्त्रैः पूजा बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा। अष्टहंसारूढ क्षेत्रपालैश्च परिवेष्टित सृष्टिराज नमोऽस्तु ते ॥ ३७ ॥ और, ऊर्ध्व दिशा के अधिपति, महाबलवान, हाथ में अक्षमाला धारण करने वाले और हंस सवार ब्रह्मदेव की भी यथाविधि पूजा करें। कहें कि 'हे आठ हंसारूढ़ क्षेत्रपालों से परिवेष्टित सृष्टिराज-ब्रह्मदेव! आपको नमस्कार है, हम आपको आवाहन मन्त्रों से बलि-पूजा निवेदन करते हैं; इसे ग्रहण करें, ग्रहण करें, स्वाहा।' अन्यदप्याह - स्थानदेवा जलदेवाः स्थलदेवास्तथैव च। तथाऽन्तरिक्षदेवाश्च भूमिदेवास्तथैव च ॥ ३८ ॥

सूत्र-६१ 315 तथा पातालदेवाश्च अमृतवृक्षदेवताः । तथा प्रासाददेवाश्च गृहदेवास्तथैव च ॥ ३९ ॥ बृहद्देवाः क्षेत्रदेवा दद्यादेभ्यो बलिं बुधः । क्षमापयेन्नमस्कृत्य तथैव सर्वदेवताः ॥ ४० ॥ (इसके अनन्तर इसी क्रम में) स्थानदेव, जलदेव, स्थलदेव, अन्तरिक्षदेव, भूमिदेव, पातालदेव, अमृतवृक्षदेवता, प्रासाददेव, गृहदेव, बृहद्देव, क्षेत्रदेव आदि समस्त देवताओं को समझदार लोगों को बलि प्रदान करते हुए नमस्कार और क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां दिक्पालादिवास्तुदेवपूजाबलिकर्मयुक्त्यधिकारो नाम षष्टितमं सूत्रम् ॥ ६० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में दिक्पालादिवास्तुदेव पूजा-बलिकर्मयुक्त अधिकार नामक साठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥ आचार्यसूत्रधारपूजानिर्णयो नामैकषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६१ ॥ विश्वकर्मोवाच — आचार्य पूजयेत्तत्र वस्त्रालङ्कारभूषणैः । स्वर्णपट्टैः कुण्डलाभ्यां कण्ठाभरणकङ्कणैः ॥ १ ॥ रत्नयुक्तमुद्रिकाभिः कटिसूत्रादिकैस्तथा । पादाभरणकैश्चैव हवेन्द्र ¹साङ्गमालिकाः ॥ २ ॥ विश्वकर्मा बोले कि वास्तुपूजावसर पर आचार्य की वस्त्र, अलङ्कार, आभूषण, स्वर्णपट्ट, कानों के कुण्डलों, गले के आभरण और हाथों के स्वर्ण कङ्कणों, रत्नयुक्त अङ्गूठी, कमरबन्द करधनी, पाँवों के गहने, हवि वस्तु और समस्त अङ्गों में धारण हो सके—ऐसी मालाओं को प्रदान कर पूजन करना चाहिए। परीपट्टैरूर्णवस्त्रैः ²शिखिरोमाश्र्व छत्रकैः । वाहनैर्युक्तमेवाथ यानझम्पानकोत्तमैः ॥ ३ ॥ अश्वो गजो रथो वापि दातव्या भूमिसंयुताः । ग्रामो देशाः पृथगुक्तं गुरुपत्नीं विशेषतः ॥ ४ ॥

  1. 'साङ्गमात्रिकाः' इति प्रकाशित पाठः।
  2. 'शिखरो मात्र ? छत्रकैः' इति प्रकाशित पाठः।

316 अपराजितपृच्छा भूमिस्थानगेहदानमाचन्द्रार्कं च तत्फलम्। वस्त्रालङ्करणैर्युक्तं गुरुं शिष्यस्तु भक्तितः ॥ ५॥ इति गुरुपूजा। इसी तरह सुन्दर रेशमी और ऊनी वस्त्रों से तथा मोरपह्नों से बने हुए छत्रक, पट्टों से युक्त वाहनों से, गाड़ी, ऐसे उत्तम यान झम्पानक अर्थात् जिन यानों से आसानी से किसी बाधा को छलाङ्ग लगाने में सफलता मिलती है; अश्व, गज, रथ, बावड़ी आदि भूमि सहित देनी चाहिए। ग्राम, देश आदि गुरु पत्नी को भी अलग से देने चाहिए। भूमि स्थान, ग्रह दानों को आचन्द्रार्क देना चाहिए अर्थात् ऐसा दान हो जो सूर्य-चन्द्र जब तक रहें तब तक के लिए देने चाहिए, वे वापस नहीं लिए जाए— तभी उनका पुण्यफल मिलता है। इसी तरह गुरु के शिष्य को भी भक्तिपूर्वक वस्त्रालङ्करण युक्त भेंट करनी चाहिए। सूत्रधारप्रशंसामाह – भूमेस्तले सूत्रधारो विश्वाधिपो द्वितीयकः । वेदवेदाङ्गसम्भूतो हविष्याशी ¹क्षिते द्विजः ॥ ६॥ इस भूमितल पर सूत्रधार एक प्रकार से दूसरा विश्वाधिप है। वह वेद-वेदाङ्ग से सम्भूत हविष्य को भोग करने वाला क्षिति पर रहने वाला द्विज है। सूत्रधारं ततः प्राज्ञः सर्वसूत्रादिबन्धकम् । वास्तुवेदप्रववतारं शास्त्रज्ञं प्रियवादिनम् ॥ ७ ॥ माधुर्यालापनोपेतं संसारमोहमुद्रकम् । यस्य नाशात्परे साध्यं धर्मार्थकाममोक्षकम् ॥ ८ ॥ तं शिल्पिनं पूजयेत आर्यदेशसमुद्भवम् । आर्यालापबालबोध्यं संसारार्णवतारणम् ॥ ९ ॥ वाग्मिनं च तथा हेतुज्ञानातर्कितकौशलम् । सर्वशास्त्रज्ञानवन्तं विज्ञानादिसमन्वितम् ॥ १० ॥ इस तरह सूत्रधार सभी प्रकार के सूत्रादि बन्धयुक्त प्राज्ञ एवं वास्तुवेद का प्रवक्ता तथा शास्त्रज्ञ और प्रियवादी होता है। वह मधुर वाणी में बातचीत करने वाला और संसार के मोह की मुद्रा का नाश करना इसके लिए परम साध्य है जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कारक है। ऐसे ही शिल्पी की पूजा करनी चाहिए

  1. 'धिते?' इति प्रकाशित पाठः ।

सूत्र-६१ 317 जो आर्यदेश (भारत) में उत्पन्न हुआ हो क्योंकि आर्यों की बोली में बातचीत बालक भी सरलता से समझ सकते है, वह बोली बड़ी सरल एवं संसार सागर से तारने वाली है। ऐसे आर्य देशोत्पन्न शिल्पी वाग्मिन या बृहस्पति के समान वाक्पटु, बुद्धिमान और हेतुज्ञान से तार्किकता के कौशल को जानने वाले, सभी शास्त्रों में ज्ञानवान्, विज्ञानादि से समन्वित होते हैं। शिल्पिनसम्मानह — पूजयेद् दिव्यवस्त्रैश्च दिव्यालङ्कारभूषितैः । पृष्ठपट्टैर्नेत्रपट्टैः सुवर्णैर्दशाङ्ग¹मालिकाः ॥ ११ ॥ पुत्रकलत्रसंयुक्तं भ्रातृयुक्तं तथोत्तमम्। सभृत्यं बलयुक्तं च शैलकर्माधिकारकम् ॥ १२ ॥ ऐसे योग्य शिल्पी को दिव्य वस्त्रों, दिव्य अलङ्कारों और आभूषणों से भूषित करें। पीठ वाला पट्ट, महीन रेशमी कपड़ा (नेत्रपट्ट), सुवर्ण की बनी हुई दशाङ्ग मालाएँ आदि उनके पुत्र-पत्नी तक और भाइयों तक को तथा उनके उत्तम भृत्यबलों तक भी और पाषाण कर्माधिकारी, सलाट, तक्षक गणों को भी भेंट-पूजा करें। कुटुम्बगृहचिन्ताश्च खाद्यपेयादिकोद्भवाः । वस्त्रताम्बूलादि चिन्ता गृहेषु या भवन्ति च ॥ १३ ॥ ताश्चापहारणीया वै कर्मचिन्ता यथा भवेत्। ग्रामं वा भोगभूमिं वा कर्मकारोचितं यथा ॥ १४ ॥ बलीवर्दाश्च वाहिनीयानझम्पानकादिकम्। हलं सकूपं क्षेत्र च पुष्पोद्यानं फलैर्युतम् ॥ १५ ॥ गृहं दिव्यं च भुवनं पञ्चभूम्यादिकं गृहम्। ध्वजाकलशसंयुक्तं कर्त्तव्यं शिल्पिने तथा ॥ १६ ॥ इसी प्रकार खाद्य, पेय आदि के कारण होने वाली कुटुम्ब-गृहचिन्ता, घरों में आवश्यक वस्त्र ताम्बूलादि की चिन्ता जो प्रायः घर-घर होती है, उन सब चिन्ताओं का जो कर्मकारों में भी होती है— उन चिन्ताओं के निवारण हेतु उन कर्मकारों के लिए उचित ग्राम या भोगभूमि, खेती के लिए वलीवर्द अर्थात् बैल, गाड़ी, वाहन, यानादि झम्पादि से युक्त तथा हल² प्रमाण वाली ऐसी भूमि जो कूप, फल-पुष्पोद्यान

  1. 'मात्रिका: ?' इति प्रकाशित पाठः।
  2. यहाँ हल से आशय हल के प्रमाण की भूमि से प्रतीत होता है। हल भू-माप की इकाई के रूप में स्वीकृत है। एक हल से जोती गई भूमि के माप को हल-माप कहा जाता है। वासिष्ठीपुत्र पुलुमवि के

318 अपराजितपृच्छा युक्त हो देनी चाहिए। इसी प्रकार गृह, भुवन दिव्यस्वरूप के, यहाँ तक कि पाँच तलों तक के भवनों, गृहों को ध्वजा-कलश से युक्त सजावट के साथ शिल्पियों के लिए प्रदान करने की व्यवस्था होनी चाहिए। पादापत्यददे तस्या प्रेक्षनादिक्ष सन्तताः ?। तेन तत् ह्रियते चैव गृहचिन्तादि बाह्यतः ॥ 17 ॥ एकचित्ते समाधिष्ठे प्रासादकर्मकौशलम्। परब्रह्मानुष्ठानवत् लीयमानो यथा भवेत्॥ 18 ॥ तस्याहाय्यं वृद्धिहेतु प्रारब्धकृतनिश्चयम्। तेनासौ लभते सिद्धिमिहलोके परत्र च॥ 19 ॥ इसी प्रकार उनके लिए (आपदाओं का निवारण करने वाले निरीक्षक पदादि की व्यवस्था करें) ताकि वे गृह विषयक चिन्ताओं को बाहर ही त्याग दें और एकचित से अर्थात् एकाग्र मन से प्रासाद कर्म कौशल दिखाने में समाधिष्ठ हो सकें। उनकी सांसारिक चिन्ताओं को दूर करने पर वे अपने कर्म-कौशल में इतने लीन हो जाएँ मानों वे परब्रह्मानुष्ठान में ही लीयमान हो गए हों। यह स्मरणीय है कि उन शिल्पियों के कर्म-कौशल दिखलाने में उनकी सहायता में वृद्धि हेतु ही उपर्युक्त तरीकों के प्रारब्ध के उपायों का कृतनिश्चय अर्थात् पूरी व्यवस्था की गई है, जिससे कि ये इस लोक और परलोक में भी सिद्धि का लाभ पा सके। सूत्रधारसम्मुखे प्रार्थनानिवेदनम् — सूत्रधारं तथाचार्यं बद्धहस्तः क्षमापयेत्। पिता च मम त्वष्टा च इह लोके भवान् मतः ॥ 20 ॥ यजमान को चाहिए कि इस सब भेंट-पूजा-सम्मान के बाद वह सूत्रधार तथा आचार्य से हाथ जोड़कर क्षमा याचना करें और कहे कि 'आप ही हे त्वष्टा! मेरे द्वितीय शती के नासिक गुहाभिलेख में यह माप पहली बार देखने में आया है। (सेलेक्टेड इन्सक्रिप्शंस फ्रॉम महाराष्ट्र : एम. जी. दीक्षितार, पूना 1947 ई., भाग 1, पृष्ठ 208) ऐसी भूमि करमुक्त होती थी। कृष्णा-गुण्टूर (आन्ध्रप्रदेश) से प्राप्त तीसरी व चौथी शताब्द के एक अभिलेख से हलवाहा द्वारा हल से जोते जाने योग्य कर-मुक्त भूमि भिक्षुओं को पुण्यवृद्धि के प्रयोजन से दान में दिए जाने का उल्लेख मिलता है— ...हल सतस पदायिस...। (तत्रैव पृष्ठ 238) इतिहासकारों के अनुसार हल का वास्तविक भू-माप क्षेत्र निर्धारित करना कठिन है किन्तु अभिलेखों के अनुसार यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि योग्य भूमि की, एक हल द्वारा वर्ष पर्यन्त जोती गई सारी भूमि का माप 'एक हल भूमि' से लगाया जा सकता है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा का मत है कि मेवाड़ में भूमि का माप बीघा व हल से होता आया है जो छोटे और बड़े नाप थे। एक हल में 50 बीघा का प्रमाण होता था। बीघा साधारणतः 25 से 40 बाँस तक आंका जाता था। (राजस्थान के इतिहास के स्रोत, जयपुर 1982 ई. पृष्ठ 237)

सूत्र-६२ 319 पिता है इस लोक में — ऐसा मेरा मत है। परत्र च स्वयं स्रष्टा तथा मम भवान् गुरुः । त्वं माता च पिता चैव त्वं च पितृपितामहः ॥ २१ ॥ संसारपाशच्छेदं च त्वं कुर्या मम योगतः । भूषणार्थैः पूजनीया वस्त्रैश्च खातकारकाः ॥ २२ ॥ आप ही स्वयं सृष्टा है तथा आप ही मेरे गुरु है; आप ही माता और आप ही पिता तथा आप मेरे पितृ, पितामह ही हैं। सुयोग से कृपा करके आपने मेरे संसार पाश रूपी फँदे को काट दिया है और मुझ से बन पड़ी, उतनी मैंने भूषण से, अर्थ और वस्त्र से हे खातकारकगणो ! मैंने आपकी पूजा की। विश्रामस्तद् दिने वास्तो सर्वविघ्नोपशामकः । दीनान्धयाचकेभ्यस्तु तुलादानं समर्पयेत् ॥ २३ ॥ अस्तु, आज के दिन अब आप विश्राम करें; आज के दिन को विश्राम का दिवस समझें जिससे वास्तु सर्व विघ्नों को शमन करने वाला सिद्ध हो सके।' इसके बाद यजमान दीनों को, अन्धों, याचकों को तुलादान¹ की सामग्री को समर्पित कर दें। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छा- यामाचार्यसूत्रधारपूजानिर्णयाधिकारो नामैकषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६१ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में आचार्य- सूत्रधार पूजा निर्णय अधिकार नामक इकसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥ वास्तुपरिभ्रमण॥दिग्गुणदोषनिर्णयो नाम द्वाषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६२ ॥ विश्वकर्मोवाच — अतः परं प्रवक्ष्यामि ज्ञानं च धर्मदुर्लभम् । वास्तुविद्यापूर्वकं च सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि इसके आगे मैं वास्तुविद्यापूर्वक सर्व सिद्धि देने वाले धर्म हेतु परम दुर्लभ ज्ञान के विषय में कहता हूँ।

  1. तुलादान की सामग्री का वर्णन मत्स्यपुराण, लिङ्गपुराण व अग्निपुराण में आया है। मत्स्यपुराण में तुलापुरुषदान की विधि आई है। आरोहणकाल में राजा खड्ग, ढाल, कवच एवं अन्य समस्त आभरणों से भूषित रहे एवं स्वर्ण निर्मित सूर्य सहित धर्मराज को बँधी मुट्ठी वाले दोनों हाथों से पकड़कर विष्णु के मुख की ओर देखता हुए स्थिर रहे— सखड्गचर्मकवचः सर्वाभरणभूषितः ॥ धर्मराजमथादाय हैमं सूर्येण संयुतम्। कराभ्यां बद्धमुष्टिभ्यामास्ते पश्यन् हरेर्मुखम् ॥ (मत्स्य. 274, 65-66)

320 अपराजितपृच्छा वास्तुदिशामुक्तिमानं रव्यानुसारेण वास्तुमुखस्थितिं — ज्योतिःशास्त्रप्रणेतारं सर्वकामफलप्रदम्। प्रणम्यं तं च पुरुषं राशिमध्ये तथा स्थितम् ॥ २ ॥ रवौकन्यातुलालौच पूर्वे शिरः समाश्रितः। धनोश्च मकरे कुम्भे दक्षिणे तु व्यवस्थितः ॥ ३ ॥ मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमे तु समाश्रितः। मिथुने सिंहकर्क च ह्युत्तरेण व्यवस्थितः ॥ ४ ॥ सर्वकालक्रमोऽयं च राशिमध्ये ह्यतः शृणु॥ देवताश्च क्रमयोगेन स वास्तुः सरते महीम् ॥ ५ ॥ यह ज्ञान ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के लिए सर्वकाम फल प्रदान करने वाला है। अतः राशियों के मध्य स्थित रहने वाले पुरुष को प्रणाम करें। वृश्चिक, कन्या, तुला (के सूर्य में) पूर्व की ओर सिर रखे हुए; धनु, मकर कुम्भ को दक्षिण की ओर सिर किए हुए; मीन, मेष और वृष को पश्चिम की ओर सिर किए हुए; मिथुन, सिंह और कर्क का उत्तर दिशा की ओर सिर किए हुए— इस समस्त काल क्रम को राशियों के मध्य चलता हुआ समझें। अतः इसके बारे में सुनें कि देवता भी अपने क्रमानुसार ही इस भूमि पर वास्तु में आते हैं। यत्र भानुस्तत्र शिरं लक्षितव्यं रविक्रमात्। अन्यथा कुरुते दुःखं शिरो वास्तावलङ्कृतम् ॥ ६ ॥ उक्त विधि से जहाँ सूर्य की स्थिति हो वहीं वास्तु का सिर लक्षित करके सूर्य के ही क्रम से वास्तु का अलङ्करण करना चाहिए, यदि वास्तु के सिर का इसके अतिरिक्त अलङ्करण किया जाएगा तो दुःख का कारण बनेगा। देवागारं गृहं यत्र न कुर्याच्छिरः सम्मुखम्। मृत्युरोगभया नित्यं शस्तं च कुक्षिसन्मुखम् ॥ ७ ॥ वहाँ देवागार, देवता के मन्दिर तथा घर वास्तुपुरुष के सिर के सम्मुख कभी भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर नित्य ही रोग और मृत्यु का भय बना रहता है अस्तु, वास्तुदेव की कुक्षि के सन्मुख ही देवागार, गृहादिक बनाने चाहिए, यही प्रशस्त माना गया है। इत्यमनन्तर एषां फलमाह — कन्यातुलावृश्चिके च भास्करो यदि संस्थितः। पूर्वे मुखं न कर्तव्यं गृहं भवति निष्फलम् ॥ ८ ॥

सूत्र-६२ 321 यदि सूर्य कन्या, तुला और वृश्चिक राशि पर हो तब कभी भी घरों को पूर्व की . ओर मुख किए हुए नहीं बनाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर ये भवन गृह निष्फल हो जाएंगे। मकरे चैव धनुषि कुम्भे वा च दिवाकरे। याम्यादिशि मुखं कुर्याद्राजचौराग्निजं भयम्॥ ९॥ यदि सूर्य धनु, मकर, और कुम्भ राशि पर स्थित हो तो भवनादिक का मुख दक्षिण दिशा की ओर नहीं बनाएँ क्योंकि ऐसा करने पर राज्य की ओर से, चोर- तस्कर तथा अग्नि से होने वाला भय बना रहेगा। मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमा दिग् च दूषिता। स्त्रीणां रोगं महाघोरं भवति ह्यतिदारुणम्॥ १०॥ यदि सूर्य मीन, मेष और वृष राशि पर स्थित हो तब भवनादिक का मुख पश्चिम दिशा की और नहीं रखें क्योंकि ऐसा करने पर घर की स्त्रियों में महाघोर रोग अतिदारुण रूप से बढ़ने का भय बना रहता है। मिथुने सिंहकर्कै च वेश्म नैवोत्तराननम्। दोषशोकभयं तत्तु न कुर्याच्च विचक्षणैः॥ ११॥ इसी प्रकार यदि सूर्य मिथुन, सिंह और कर्क राशिस्थ हो तो घरों को उत्तराभिमुखी कभी नहीं बनाएँ। इसे विद्यावान् लोगों ने दोषपूर्ण बताया है और शोक तथा भय का कारक कहा है। तत्र ना सर्पति वास्तु ¹भ्रमतेरग्निमध्यतः। पूर्वदक्षिणतश्चैव पश्चिमोत्तरतो मुखम्॥ १२॥ अग्नि कोण के मध्य से सर्प-वास्तु नहीं चलता है अथवा नहीं फिरता। अस्तु, पूर्व-दक्षिण तथा उत्तर-पश्चिम की ओर मुख से भवन बना सकते हैं। शिरो नेत्रे च बाहू च उदरं कटिजङ्घया। वेध्यन्ते गृहे मर्म पूजाहानिर्महद्भयम्॥ १३॥ यदि वास्तुपुरुष के सिर, नेत्र, बाहू, उदर, कटि, जङ्घा को गृह के मर्म वेधते हों तो पूजा की हानि और महद्भय की उत्पत्ति होगी। कन्यादिसङ्क्रान्तियोगे प्राच्यादिक्रमतो दिशि। न कुर्वीतं शिरो वास्तोर्न कार्यं तन्मुखं गृहम्॥ १४॥


  1. 'भ्रमणै?' इति प्रकाशित पाठः।

322 अपराजितपृच्छा कन्यादि संक्रान्ति योगों में प्राच्यादि दिशा क्रम से वास्तु का सिर नहीं करना चाहिए और उस सिर की ओर गृह का मुख भी नहीं रखना चाहिए। क्षपाकरेणैव गृहं पुरस्तात् कुर्यान्न वास्तु न च यातु कर्ता। पतन्ति खन्या न च दृष्टिसंस्थिता तस्मात्प्रयत्नेन त्विदं विचिन्त्यताम् ॥ 15 ॥ इति वास्तुदिशामुक्तिमानम्। पिशाचों (प्रवृत्तिवालों या चन्द्रमा) के अनुसार गृह नहीं बनवाएँ क्योंकि उनके बनाए गए गृह, वास्तु तथा वे पिशाच वास्तुकर्त्ता¹ सभी खड्डे में पड़ते हैं परन्तु जिनके सही-सही शास्त्र बुद्धि की आँखें हैं, वे खड्डे में नहीं पड़ते। अतएव इस बात पर पूरे प्रयत्न के साथ ध्यान देना और इनको हमेशा मनन करते रहना चाहिए। अथ दिक्‍विदिक् वास्तुवेधमाह — दिशायां विदिशायां च वास्तुवेधविशोधनम्। जीर्णे नवतरे वापि वेधदोषं विवर्जयेत्॥ 16 ॥ दिशाओं और विदिशाओं में जो वास्तुवेध पड़ते हों, उनका विशोधन अवश्य करना चाहिए परन्तु जीर्ण वास्तु को पुनः उद्धार करके नवीन बनाया जाता हो तो कोई वेध दोष का चिन्तन नहीं करें। वेधा नः कथिता पूर्व दोषांश्चैव ततः श्रृणु। एकपादादिकं वास्तु पर्यन्तं सहस्रान्तिकम्॥ 17 ॥ अब तक मैंने वेधों के बारे में नहीं कहा है। अस्तु, अब वेधों के दोषों को सुनो जो एक पादादिक वास्तु से सहस्र पादादिक वास्तु पर्यन्त पाए जाते हैं। सुरस्थानं यदा शून्यं पदं पूजां विना यदा। विघ्नोत्कटं महाघोरं कुरुते दारुणं भयम्॥ 18 ॥ जिस वास्तु में यदि सुरस्थान बिना पूजा के और बिना पद के शून्य ही रह जाए तो ऐसे वास्तु को 'विघ्नोत्कटवास्तु' कहते है जो महाघोर दारुण भय कारक बनता है। वीथिकान्तरबाह्येषु पदमेकं सुरैर्विना। विरोधं गोत्रकलहं मुक्तकोणस्य तत्फलम्॥ 19 ॥


  1. पिशाच से आशय सम्भवतः पिशाचपद भी हो सकता है। मयमतं में पैशाचपद का वर्णन हुआ है। नारदसंहिता में भी पिशाचांश का वर्णन है। इक्यासीपद वास्तुचक्र में मध्य के नौ कोष्ठकं ब्रह्मस्थान के होने से त्याज्य हैं, चक्र के चारों ही ओर 32 कोष्ठकों को छोड़कर समीप के 24 कोष्ठक पिशाचांश कहे जाते हैं। इसमें यदि गृहारम्भ, शिलान्यासादि किया जाता है तो दुःख, शोक तथा भयप्रद होता है— मध्ये नवपदं ब्रह्मस्थानं तदतिनिन्दितम्। द्वात्रिंशदंशाः प्राकाराः समीपांशाः समन्ततः॥ पिशाचांशा गृहारम्भे दुःखशोकभयप्रदाः। शेपास्युर्गृहनिर्माणे पुत्रपौत्र धनप्रदाः॥ (नारद. 31, 20-21)

सूत्र-६२ ३२३ जिस वास्तु की वीथिका अन्दर और बाहर की ओर से सुरों के बिना हो तो ऐसे वास्तु को 'विरोधवास्तु' (मुक्त कोण) कहते हैं। इसका फल यह होता है कि अपने ही गोत्र में कलह उत्पन्न होता है और बिखराव उत्पन्न करता है। अन्यपृष्ठे यदा चान्यं प्रासादं पुरमन्दिरम्। खादकं नाम तद्वास्तु परस्परविरोधकृत् ॥ २० ॥ जिस वास्तु में प्रासाद मन्दिर आदि एक के पीछे एक बने हों तो ऐसे वास्तु को 'खादक' नाम दिया जाता है जो आपस में विरोध उत्पन्न कराता है। कुक्षिद्वारं गृहे वापि कुर्याद्वा सुरसद्मनि। विभ्रमं नाम तद् वास्तु विभ्रमेत गृहाधिपम् ॥ २१ ॥ यदि देवता के मन्दिर का या गृह का कोई भीतरी द्वार (कुक्षि द्वार) बना हो तो ऐसे वास्तु को 'विभ्रम' नामक वास्तु कहते हैं। उसके गृहस्वामी को सदा ही भ्रम बना रहता है। कुक्षिभागे यदा चान्यं गृहं च सुरसद्म वा। कुक्षिदं नाम तद्वास्तु विभ्रमेनैतद् दृश्यत ॥ २२ ॥ यदि इसी तरह देवता के मन्दिर के या गृह के भीतरी भाग (कुक्षिभाग) में कोई अन्य देव मन्दिर या अन्य गृह बना हो तो उसे 'कुक्षिदवास्तु' नाम दिया गया है। इसे देखते ही विभ्रम उत्पन्न होने लगता है। अग्रे द्वारोन्नतं गेहं निम्नगं मध्यसंस्थितम्। उच्छ्रितं नाम तद् वास्तु वृद्धिपूजादिकं हनेत् ॥ २३ ॥ जिस गेह के आगे का द्वार उन्नत हो और मध्य का द्वार नीचा हो उस वास्तु को 'उच्छ्रितवास्तु' नाम दिया गया है। ऐसे वास्तु वृद्धि, पूजादिक में हानि पहुचाते हैं। समगृहं समरूपं द्वारमध्ये पट्टाग्रजम्। बिन्दूकं नाम तद् वास्तु हनेच्च सन्तत्यादिकम् ॥ २४ ॥ समान रूप वाले दो समान गृहों के मध्य का द्वार यदि चौकी युक्त हो तो ऐसे वास्तु का नाम 'बिन्दूकवास्तु' नाम दिया गया है। यह दोष सन्तानादि की मृत्यु का कारण बनता है। अन्यान्य दोषमाह — गृहव्यासकर्णायतं त्रिपञ्चहस्तमुच्छ्रितम्। द्रव्यादिकं बहुकाष्ठं शाश्वतं न भवेद् गृहम् ॥ २५ ॥

324 अपराजितपृच्छा जिस गृह का व्यास कर्णायत हो और वह पन्द्रह हाथ (गज) ऊँचा हो उसको 'द्रव्यादिकवास्तु' कहते है। ऐसा बहुत से काष्ठ से बनता है, इसलिए यह गृह शाश्वत अर्थात् चिरस्थायी नहीं होता है। कर्णशाला यदा लग्ना आग्नेय्यां दिशि संश्रिताः । अग्निदं नाम तद्वास्तु कुरुतेऽग्निभय ध्रुवम् ॥ 26 ॥ यदि किसी गृह की कर्णशाला (कोने में निकला हुआ कक्ष) आग्नेय दिशा से लगी हुई हो तो ऐसे वास्तु को 'अग्निद' नाम दिया गया है। ऐसे वास्तु से निश्चय ही अग्निभय बना रहता है। नैर्ऋत्ये च यदा लग्नाः शालाश्च वास्तुबाह्यतः । नैर्ऋत्यं नाम तद्वास्तु व्याध्याधिक्यं तु मृत्युकृत् ॥ 27 ॥ यदि किसी गृह की नैर्ऋत्य दिशा से लगी हुई कोई शाला बाहर की ओर बनी हुई हो तो उसे 'नैर्ऋत्य वास्तु' नाम से कहा है। उसमें इतनी व्याधियाँ आती है कि जिनसे मृत्यु का सङ्कट ही उत्पन्न हो जाता है। वायव्ये तु यदा लग्नाः शालाश्च गृहबाह्यतः । वायव्यं नाम तद् वास्तु गृहे वायुभयं भवेत् ॥ 28 ॥ इसी प्रकार से गृह की वायव्य दिशा से लगी हुई कोई शाला बाहर की ओर बनी हो तो ऐसे वास्तु का 'वायव्य' नाम दिया गया है, ऐसे घर में वायु (अन्धड़, प्रभञ्जनादि) से भय सदा बना रहता है। ईशाने तु यदा लग्नाः शालाश्च गृहबाह्यतः । देवकं नाम तद्वास्तु देवदोषः सदा भवेत् ॥ 29 ॥ यदि किसी गृह के ईशान कोण से लगी हुई कोई शाला बाहर की ओर बनी हुई हो तो ऐसे वास्तु को देवक वास्तु कहते हैं। इसमें सदा ही देव दोष बने रहते हैं। अधोभम्यां तु ये दोषास्तथैव चोर्ध्वमादिशेत् । ऊर्ध्वभूमिदिशाश्रं चैतद्गुणं दोषमादहेत् ॥ 30 ॥ मकानों, घरों में अधो भूमि (नीचे के तल) में जो-जो दोष बताए गए हैं, वे ही दोष ऊपर के तलों में भी उसी प्रकार होते है, ऐसा समझे। अस्तु, ऊँचे तल या मंजिलों की दीवारों (अश्र) की दिशाओं के भी यह गुण-दोष दुःखदायी होते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वास्तुपरिभ्रमणादिगुणदोषनिर्णयाधिकारो नाम द्वाषष्टितमं सूत्रम् ॥ 62 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वास्तुपरिभ्रमणादि गुण-दोष निर्णय अधिकार नामक बासठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 62 ॥

326 अपराजितपृच्छा स्पष्टार्थ चक्र¹ | चैत्र | वैशाख | ज्येष्ठ | आषाढ़ | श्रावण | भाद्र | आश्विन | कार्तिक | मार्ग | पौष | माघ | फाल्गुन | मास | | शो. | धन प्रा. | मरण | पशु हा. | पशुवृद्धि | शून्य | कलह | मृत्यु नाश | धान्य | धा. | अग्निभय | श्री | फल | अथ तिथ्यनुसारेणगृहारम्भफलमाह — तृतीया पञ्चमी चैव सप्तमी नवमी तथा। एकादशीत्रयोदश्यौ तिथयश्च सुखावहाः ॥ 5 ॥ इसी तरह तिथियों के बारे में भी विचार किया जाता है कि तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी और त्रयोदशी तिथियाँ शुभ और सुखदायी हैं। बलादीनां विचारमाह — चन्द्रताराबलं भर्तू राजमानं हि शस्यते। सूर्यपाततिथिं दद्याद् विष्टिगण्डान्तवर्जितम् ॥ 6 ॥ चन्द्र और ताराबल देखकर निकाला गया मुहूर्त भर्ता को राजा से सम्मान दिलाने वाला, शुभ होता है। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस समय कोई सूर्यपात तिथि², विष्टिकरण (भद्रा)³, गण्डान्त⁴ आदि न हो।

  1. श्रीपतिभट्टाचार्य का मत है— शोको धान्यं मृतपशुहर्ता द्रव्यवृद्धिर्विनाशो युद्धं भृत्यक्षतिरथ फलं श्रीश्च वह्नेर्भयं च। लक्ष्मीप्राप्तिर्भवति भुवनारम्भकर्तुः क्रमेण चैत्रादूचे मुनिरिति फलं वास्तुशास्त्रोपदिष्टम्॥ (ज्योतिषरत्नमाला 17, 14)
  2. महेश्वरोपाध्याय ने ज्योतिषवृत्तशतं में त्याज्य विषयों को लिखा है। यथा— नक्षत्रादि न संयुता तिथितीद्रैकोनविंशाष्ट दिक्त्रिःसप्ताङ्गतित च शैल विकृतीः वर्हत्प्रसङ्ख्येषु च। धिष्ण्येब्बिन्दु युतेषु दण्डकमुखायोगा भवन्ति क्रमात त्याज्याः कर्मसु शोभनेषु सुधियो सर्वेषु देशेषु वै॥ वाराणां त्रितयं तिथिः स्पृशति या वारस्तिथीनां त्रयं त्याज्योर्यम्णइने दिने तु हिमगौब्राह्मयस्तथा राक्षसः। पित्र्यस्यो क्षितिजे बुधे चभिजितोरक्षभोसर्वाक्पतौ तिथ्यांशो पितृवेधसोभृगुसुतो- युपोशयोः सूर्येजे॥ (ज्योतिषवृत्त. 1, 5-6)
  3. मास के शुक्लपक्ष में चतुर्थी, अष्टमी, एकादशी एवं पूर्णिमा तथा कृष्णपक्ष में एक-एक तिथि पूर्व अर्थात् तृतीया, सप्तमी, दशमी और चतुर्दशी को भद्रा की पुच्छ होती है। यह उक्त तिथियों में क्रमशः आठवें, पहले, छठे, तीसरे, सातवें, दूसरे, पाँचवें और चौथे प्रहर के अन्त में तीन-तीन घटी तक होती है। उक्त तिथियों में उक्त अवधि को ही शुभ जानना चाहिए, शेष अवधि शुभ कार्यार्थ त्याज्य होती है। इसी प्रकार चन्द्रमा और खलग्रहों (सूर्य, मङ्गल, शनि, राहु व केतु व इनसे युक्त बुध एवं क्षीण चन्द्रमा) का लग्न और नवांश भी त्याज्य है जैसा कि बृहस्पतिसंहिता में भी आया है— सिते चतुर्थ्यामन्त्यार्धमष्टम्याद्यार्धमेव च। एकादश्यां परार्धं तु पूर्वार्धं पूर्णशीतगौ॥ कृष्णे तृतीयान्त्यार्धं हि सप्तम्याद्यार्धमेव च। दशम्यामूत्तरार्धं तु चतुर्दश्यर्धमादितः। विष्ट्याख्योऽयं महादोषः कथितोऽत्र समस्तगः। तदानीं कृतसत्कर्मकर्ता सह विनश्यति॥ (पीयूषधाराटीका 1, 43 पर उद्धृत)
  4. त्रिविध गण्डान्त के विषय में ज्योतिष की मान्यता यह भी है कि नक्षत्र, तिथि व लग्न या राशि संज्ञक तीनों ही गण्डान्त का त्याग करना चाहिए। नक्षत्र गण्डान्त में नौ 2 के अन्त में 2 घटी, तिथि में पाँचवीं 2 के बाद 1 घटी तथा लग्न या राशि गण्डान्त में चौथी 2 के अन्त वाली घटी का त्याग किया जाना

सूत्र-६३ ३२७ इह वै सूत्रपातैश्च क्रियाः प्रासादकर्मणि। कार्याः पुरनिवेशे तु प्रारम्भे भवनस्य च॥ ७॥ भवन, प्रासादों के निर्माण के सूत्रपात के आरम्भ अर्थात् डाकवेल डालने (चूर्णादि डालकर या डोरी आदि बाँधकर भूमि चयन) तथा पुर निवेश, भवनादि के प्रारम्भ करने की यही विधि है। भूम्यारम्भे शिलान्यासे द्वारस्तम्भोच्छ्रयादिषु। आदित्ये चोत्तरस्थे च शोभने लग्न एव च॥ ८॥¹ इत्यारम्भादिशस्तमासादीनाः। भूमि चयन के आरम्भ में, शिलान्यास के अवसर पर, द्वार तथा स्तम्भों को खड़ा करते समय सदा ध्यान रखें कि सूर्य की स्थिति उत्तरायण में हो और लग्न भी शुभ और शोभन हो। निर्माणोपरान्त प्रासादप्रतिष्ठाविधिं — प्रतिष्ठाद्यं प्रवक्ष्यामि प्रोक्तं यत्परमेश्वरैः। अहं तत्कथयिष्यामि प्राग्देवज्ञैश्च भाषितम्॥ ९॥ अब जबकि भवन, प्रासादिक बनकर तैयार हो जाए तब उनकी प्रतिष्ठा होना भी परम आवश्यक है, उसके बारे में परमेश्वर ने जो प्रतिष्ठा विधि कही है, उसे मैं भी वैसे ही पुनः कहता हूँ, जैसे पहले के देवज्ञों, ज्योतिषियों ने कही थी। दीक्षा च सर्वकालेषु प्रतिष्ठा पञ्चमासिकी। चैत्रश्रावणवैशाखे शिवरात्रौ च कीर्तिके॥ १०॥ यह ध्यान में रखने की बात है कि दीक्षा और प्रतिष्ठादि सभी का समय पाँच मास का होता है। ये हैं— चैत्र, श्रावण, वैशाख, शिवरात्रि और कार्तिक मास। दीक्षाश्च द्वादश₁₂ प्रोक्ता मासे मासे च शाश्वताः। चाहिए। आश्लेषा, मूल एवं गण्डान्त की निवृत्ति के लिए अपने निमित्त शुभैच्छु जनों को विधिपूर्वक सूतकान्त में तीसरे मास में अथवा वर्ष के अन्त में, उसी जन्म नक्षत्र में उसकी शान्ति शास्त्रोक्त विधि से करवानी चाहिए, ऐसा वशिष्ठ का मत है— नैर्ऋत्य भौजङ्गमगण्डदोषनिवारणायाभ्युदयाय नूनम्। पितामहोक्तां रुचिरां च शान्ति प्रकुर्याद्दंशस्य हिताय नूनम्॥ शास्त्रोक्तरीत्या खलु सूतकान्ते मासे तृतीयेऽप्यथ वत्सरान्ते। कुर्याच्छान्तिं तदृक्षे वा तद्दोषस्यापनुत्तये॥ (वशिष्ठसंहिता 42, 22 एवं 27-28)

  1. उक्त श्लोक समराङ्गण. से तुलनीय है— द्वितीया पञ्चमी मुख्या सप्तमी नवमी तथा। एकादशीत्रयोदश्यस्ति (श्यौ ति) थयः स्युः शुभावहाः॥ चन्द्रताराबलं भर्तुरनुकूलं च शस्यते। इयं हि सूत्रपाताख्या क्रिया प्रासादकर्मणि॥ कार्या पुरनिवेशे च प्रारम्भे भवनस्य च। शिलानिवेशने द्वारस्तम्भोच्छ्रायादिकेषु च॥ आद्रियेत सिते पक्षे शोभने लग्न एव हि। (समराङ्गण. 26, 5-8)

धर्मार्थकाममोक्षाश्च शिष्यैर्वै गुर्वनुग्रहात् ॥ 11 ॥ दीक्षा भी बारह कही गई है जो प्रति मास शाश्वत रूप से धर्म, काम, मोक्ष के हेतु से शिष्यों को गुरु के अनुग्रह से प्रदान की जाती है। फाल्गुने वाऽथ चैत्रे वा माघे वैशाख उत्तमा । ज्येष्ठे मासे तथाऽऽषाढे आदित्ये चोत्तरस्थिते ॥ 12 ॥ इसके लिए फाल्गुन, चैत्र, माघ, वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़ मास सूर्य के उत्तरायण में स्थिति में होने से उत्तम मानी गई है। द्वितीया च तृतीया च पञ्चमी चाऽथ सप्तमी । दशम्येकादशी रम्या पूर्णिमा च त्रयोदशी ॥ 13 ॥ इसी तरह तिथियों में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी और पूर्णिमा बड़ी ही रम्य सुन्दर शुभ मानी गई हैं। उत्तरात्रयरोहिण्य आर्द्रा चैव पुनर्वसू । पुष्यानुराधाश्रवणं मृगस्वात्यौ च हस्तकम् ॥ 14 ॥ मूलं च नक्षत्राणि हि गृहे विष्टिविवर्जितम्। एतत्प्रोक्तं प्रतिष्ठादौ देवानां देववेश्मनाम् ॥ 15 ॥ इसी तरह शुभ नक्षत्रों का भी ध्यान रखना चाहिए जो इस प्रकार है- तीनों उत्तरा (उत्तराषाढ़ा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तरा भाद्रपद), रोहिणी, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा, श्रवण, मृगशिरा, स्वाती, हस्त और मूल- ये नक्षत्र गृह निर्माण के लिए ठीक हैं, इनमें यही ध्यान रखना आवश्यक है कि उस समय विष्टिकरण या भद्रा नहीं हो। यही समयादि देवताओं के मन्दिरों की प्रतिष्ठा में भी उपयुक्त कहा गया है। नक्षत्रफलमाह - उत्तरायां सदा वृद्धिर्हस्ते सिद्धिर्यथेप्सिता । ज्ञानलाभश्च श्रवणे मूले नन्दन्ति मन्त्रिणः ॥ 16 ॥ आर्द्रायां चैव सौभाग्यं रोहिण्यां न च संशयः । स्वातिः शान्तिप्रदा नित्यमनुराधा वरप्रदा ॥ 17 ॥ पुनर्वस्वोः प्रजावृद्धिः पुष्ये नीरोगिताश्रियौ । एतावन्त्येव लग्नानि यानि पूर्वोदितानि च ॥ 18 ॥ इति द्वादशप्रतिष्ठाः। (अब इन नक्षत्रों में कार्यारम्भ के फल कहते हैं) उत्तरा नक्षत्र में कार्यारम्भ करने पर सदा वृद्धि होती है; हस्त में भी जैसी चाहो वैसी सिद्धि प्राप्त होती है;

सूत्र-६५ ७८५ श्रवण में ज्ञान लाभ होता है और मूल में मन्त्रिगणों में आनन्द होता है। आर्द्रा में सौभाग्य और रोहिणी में भी निश्चित सौभाग्य मिलता है; स्वाती में शान्ति प्राप्त होती है और अनुराधा नक्षत्र में किया गया कार्य सदा वरद होता है। पुनर्वसु में प्रजावृद्धि होती है और पुष्य में निरोगता और श्रिय, सम्पत्ति आदि इन नक्षत्रों में आने वाले लग्नों के पूर्व में उदित होने पर मिलते हैं। अथ प्राचीमतमाह — प्राचीमतः प्रवक्ष्यामि दिङ्‌मूढभ्रान्तिनाशिनीम्। सा च पञ्चविधा उक्ता कथये यामनुक्रमात् ॥ 19 ॥ अब मैं प्राची साधन-मत के बारे में कहता हूँ, (प्राच्यादि दिशाओं के साधन के अभाव में) भवन या प्रासाद के दिङ्‌मूढ़ होने की भ्रान्ति का विनाश हो जाता है। यह प्राची साधन भी पाँच प्रकार का कहा गया है जिसे मैं अनुक्रम से कहता हूँ। राश्यानुसारेण शङ्कुच्छायाविचारः — दिनादौ मेषतुलयोः कृत्तिकाश्रवणोदये। चित्रास्वात्यन्तरे चैव शङ्कुच्छाया ध्रुवेषु च ॥ 20 ॥ दिवस के आरम्भ के समय तो मेष और तुला राशि का, उदय के पश्चात् कृत्तिका व श्रवण नक्षत्र का चित्रा व स्वाती नक्षत्र के अन्तर पर शङ्कु की छाया ध्रुव की ओर पड़ती है। नक्षत्रवेधवशाद्दिक्साधनम् — कृत्तिकोदये या प्राची सा प्राची श्रवणोदये। चित्रास्वात्यन्तरे प्राची तत्र सूत्रान्तरोत्तरा ॥ 21 ॥ ध्रुवशङ्कोद्भवा प्राची सूत्रसूत्रान्तरोत्तरा। दिनादौ मेषतुलयोः सूर्यसूत्रान्तरोत्तरा ॥ 22 ॥ कृत्तिका नक्षत्र के उदय होने पर जो प्राची (पूर्व) होती है, वही प्राची श्रवण नक्षत्र के उदय होने पर होती है और जो प्राची चित्रा और स्वाती नक्षत्र के अन्तर पर होती है और वहाँ उत्तरोत्तर सूत्र-सूत्र का अन्तर हो जाता है।¹ ध्रुव शङ्कु के

  1. कात्यायन शुल्बसूत्र में कहा गया है कि कृतिका, पुष्य, श्रवण और चित्रा स्वाती का अन्तर प्राची दिशा का रूप है अर्थात् कृतिका वेध की भाँति पुष्य व श्रवण का भी वेध करके प्राची या पूर्व दिशा का ज्ञान करना अपेक्षित होता है। यह साधन युगमात्र या 86 अङ्गुल नक्षत्रोंके ऊपर चढ़ने पर किया जाता है— कृतिका श्रवणं पुष्यं चित्रास्वात्योर्यदन्तरम्। एतत्प्राच्या दिशो रूपं युगमात्रोदिते पुरे॥ (कात्यायन. 34) यह मत है कि उज्जैयिनी से दक्षिण में रहने वालों को चित्रा व स्वाती के अन्तर से पूर्वा-पर दिशा का ज्ञान करना चाहिए

: 'भ' has a loop. Look at 'भ' in "पर्वभिः" in : 'भि' has a loop. Now look at the letter under 'द्' in line 18: It has NO loop! It is rounded like 'ध' in "अर्बुदार्द्धमयनं"! Wait, look at "अर्बुदार्द्धमयनं" (line 5): There is 'र्', then 'द्', and below 'द्' is 'ध'. In line 18, under 'द्', it is 'ध'! Wait, so it is 'द्ध'! Now look at the next letter: Is it 'व'? Yes, 'व'. Is there an 'ा' (aa matra) after 'व'? Look at "द्वादशपर्वोद्भवश्च" vs "द्वादशपर्वोद्धवाश्च": Wait, look at 'व' in "द्वादश": It is 'द्' + 'व' + 'ा' = 'द्वा'. Now look at the letter between 'द्ध' and 'श्च': Wait, is it 'व' or 'वा'? Look at the space: द् - ध - व - ा - श्च There is definitely 'वा'! Wait, or is it 'द्ध्वाश्च'? Let's look at the letter: Could it be: द् ध Wait, is it: द्

सूत्र-६३ 331 द्वादश दशाष्टाभिश्च त्रिभिर्वृत्तं क्षमाङ्कितम्। शङ्कुच्छायास्त्रिगुणतो द्विपर्व¹युक्तिको समा ॥ २६ ॥ उस समतल भूमि पर 12, 10 और 8 शङ्कु के पर्वों की लम्बाई के नाप से क्रमशः तीन वृत्त अङ्कित करें। भूमि में क्षिस अर्थात् खुदाई करके— इस तरह दो-दो पर्व समान युक्ति से शङ्कु की छाया पथ 12 पर्व के वृत्त पर, दूसरा छायापथ 10 पर्व के वृत्त पर और तीसरा छायापथ 8 पर्व के वृत्त पर देखा जा सकेगा। परिधौ बाह्यवृत्तस्य व्यासे शङ्कुतुल्योत्तमा। कूलवंश पूर्वा छाया ²शङ्कुश्शरण आश्रितैः ॥ २७ ॥ यह तो स्पष्ट ही है कि बाह्य वृत्त की परिधि तो शङ्कु के तुल्य 12 पर्वों के व्यास से बनी है। इन के वृत्तों के किनारे की छाया (कूलवंश) पूर्व की ओर से आती है, जो शङ्कु के ऊपर चलने से आती है। छायाग्रे वृत्ततुल्या च छाया पूर्वापरोद्भवा। प्रवेशे निर्गमे छाया याति सूत्रं सदा भवेत् ॥ २८ ॥ यह शङ्कु की छाया पूर्व से पश्चिम की ओर पड़ती हुई उद्भव होती है और छायाग्र वृत्त के तुल्य बनती जाती है अर्थात् बारह पर्व की छाया बड़े वृत्त पर, दश पर्व की छाया मध्यम वृत्त पर और आठ पर्व की छाया कनिष्ठ वृत्त पर होगी। इस तरह छाया का प्रवेश और छाया के निर्गम से वृत्तों पर ध्यान देने से याति सूत्र सदा बनता रहता है। याम्योत्तरं सूत्रपाते मत्स्यमुखं पुच्छाग्रसूत्रे ?। याम्योत्तरोद्गतं सूत्रं विकर्णैः कर्णसाधनम् ॥ २९ ॥ दक्षिण और उत्तर के सूत्रपात से (चुम्बकीय विधि से, कुतुबनुमा की सुई से?) मत्स्य की पुच्छ और मुख सीध में होते हैं। इस दक्षिण उत्तर से बनने वाले सूत्र से ही विकर्ण का कर्ण साधन बनता है। निशाकाले ध्रुवसाधनमाह — अथ रात्रौ ध्रुवमसाध्यं दक्षिणोत्तरम्। मण्डलोभयपक्षे च मध्ये स्थाप्यं त्रिदीपकम् ॥ ३० ॥ अब रात्रि में ध्रुव साधन की विधि कहते हैं। रात्रि में ध्रुव का अक्ष सीधा,

  1. 'युक्तिकोत्तमा?' इति प्रकाशित पाठः।
  2. 'शङ्कुशरुणाश्रितैः?' इति प्रकाशित पाठः।

३३८ अपराजितपृच्छा हमेशा दक्षिण उत्तर की दिशा की सूचक है। उस शङ्कु मण्डल के घेरों पर दोनों ओर एक मध्य में तीन दीपक रखें। एकसूत्रे यदा त्रीणि दीपशिखाग्रकाणि च। पूर्वसंस्थं ध्रुवसाध्यमपरस्थं च दोषकृत् ? ॥ ३१ ॥ जब तीनों दीपकों का शिखाग्र एक सूत्र में आ जाए, तो पूर्व की तरह की ध्रुव साध्य हो जाता है। इसमें अन्य अन्तर रह जाए तो दोषपूर्ण माना जाता है। शस्तं तु मीनपातैश्च पूर्वापरादिसाधनम्। विकर्णकर्णगा साध्या ध्रुवशङ्कुप्राच्युद्भवः ॥ ३२ ॥ (अब यह सिद्ध हो गया है कि ध्रुवार्थ चुम्बक विधि से) मत्स्यपातानुसार देखा गया पूर्वा-पर दिक् साधन प्रशस्त है अर्थात् ठीक-ठीक है तथा विकर्ण और कर्ण की ओर जाने वाली दिशा-रेखाएँ इससे साध्य हैं, वैसे ही जैसे ध्रुव शङ्कु से प्राच्युद्भव छाया से साध्य होती है।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गृहारम्भप्रतिष्ठादिनमासनिर्णयाधिकारो नाम त्रिषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गृहारम्भ, प्रतिष्ठा दिन मास निर्णय अधिकार नामक तिरसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥ आयाधिकारो नाम चतुःषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६४ ॥ विश्वकर्मोवाच — आयव्यांशका ऋक्षं ताराचन्द्रबलं गृहे। जीवितं मरणं ज्ञेयं वास्तुविज्ञानपूर्वकम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा कि गृहों के आय-व्यय, अंशक, नक्षत्र, ताराबल, चन्द्रबल,

  1. ग्रन्थकार यहाँ दिक्सूचकयन्त्र की प्रशंसा करता ही प्रतीत होता है। वैसे दिक्सूचकयन्त्र बहुत पहले ही प्रयोग में आ चुका था। ज्योतिषियों ने भी इसकी प्रशंसा में कहा है कि शिल्पीगण चुम्बकीय यन्त्र से भी दिशा का ज्ञान करते हैं, पूर्वा-पर का जो ज्ञान किया गया, वह सममण्डलीय है, इससे सूर्य के उदयास्त, पूर्वा-पर और अर्ध्यादि उदित और अन्यत्र अल्प अन्तरादि को समझा जा सकता है — सचुम्बकादेव सुशिल्पविज्ञाः कुर्वन्ति दिग्ज्ञानमितोऽन्यथैव । पूर्वापरा याऽत्र कृता प्रकारैर्ज्ञेया बुधैः सा सममण्डलीया ॥ अर्कोदयास्तजे पूर्वापरे तेऽर्ध्यादिपूदिते। अन्यत्राल्पान्तरात् केचिदुदङ्मेरुं ततो जगुः ॥ (सिद्धान्ततत्त्वविवेक : कमलाकर भट्ट, परिष्कर्ता : पं. सुधाकर द्विवेदी व पं. मुरलीधर शर्मा, ब्रजभूषणदास एण्ड कंपनी, बनारस, द्वितीयावृत्ति, 3, त्रिप्रश्नाधिकार 378-379, पृष्ठ 302-303)

सूत्र-६४ 333 उनका जीवन और मरण वास्तुविज्ञान के अनुसार ठीक-ठीक से जानना चाहिए।¹ वास्तुदण्डाह — नगरे वा पुरे चैव मानं दण्डैर्विधीयते। वास्तुदण्ड इति प्रोक्तः सोऽत्र वै हस्तसङ्ख्यया ॥ २॥ चतुर्हस्तं च यत्क्षेत्रमङ्गुलैश्च फलप्रदम्। वस्वङ्गुलैश्च क्षेत्रं तु पादैर्वा प्रतिशोधयेत् ॥ ३॥ नगर और पुर आवासों का लम्बाई-चौड़ाई के माप के मान को दण्ड विधि से करना चाहिए। इसे 'वास्तुदण्ड' कहते है। उसकी हस्त संख्या (गज की संख्या) लम्बाई हेतु इस प्रकार समझें— चार हाथ के गज का जो क्षेत्र हो उसका उतने ही अङ्गुल माप का फल होता है। आठ अङ्गुल का क्षेत्र होने पर उसमें एक पाद से शोधन करना चाहिए। तत्क्षेत्रं तु यथाकारमश्मकार्ये विशोधयेत्। यत्र हस्तमितिः क्षेत्रे तद्गृहं हस्तसङ्ख्यया ॥ ४॥ क्षेत्रलाभे तु तत्रैव स्यात्स्वदेहाङ्गुलैर्गृहम्। अङ्गुलैः क्षेत्रमाने च अङ्गुलैस्तदलाभतः ॥ ५॥ उस क्षेत्र के आकार के ही पाषाण कार्य का शोधन करना चाहिए। जहाँ हस्त (गज) के नाप में क्षेत्र आते हों उन गृहों में हस्त-गज की संख्यानुसार क्षेत्रलाभ में वहाँ अपनी ही देह के अङ्गुल प्रमाण का गृह होता है तथा अङ्गुलों के क्षेत्रमान के अनुसार अङ्गुलों को उसका लाभ माने। पादैर्वापि यवैर्वापि गृहक्षेत्रानुसारतः। तृणच्छन्दे स्वामिहस्तैर्हर्म्यादौ कर्मिहस्ततः ॥ ६॥ (इसके अभाव में या वैसा सम्भव नहीं हो तो) गृहक्षेत्रानुसार पादमान से या यवमान लें। तृणच्छन्दों में तो गृहस्वामी के हाथ (गज) के अनुसार और हवेलियों आदि में कर्मिहस्त अर्थात् शिल्पी के हस्त (गज) अनुसार माप का मान लेना चाहिए। राजवेश्मपुरादीनां वापीकूपादिकस्य च। प्रासादेषु च देवानां शास्त्रहस्तेन केवलम् ॥ ७॥


  1. आचार्य श्रीपति का मत है— आयव्याक्षांशचन्द्रतारबलानि शास्त्रादवलोक्य सम्यक्। आयुर्धनाऽऽरोग्ययशोभिवृद्ध्यै गृहं गृहस्थो हि निधापयीत्॥ (ज्योतिषरत्नमाला 17, 1)