भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

धर्मार्थकाममोक्षाश्च शिष्यैर्वै गुर्वनुग्रहात् ॥ 11 ॥ दीक्षा भी बारह कही गई है जो प्रति मास शाश्वत रूप से धर्म, काम, मोक्ष के हेतु से शिष्यों को गुरु के अनुग्रह से प्रदान की जाती है। फाल्गुने वाऽथ चैत्रे वा माघे वैशाख उत्तमा । ज्येष्ठे मासे तथाऽऽषाढे आदित्ये चोत्तरस्थिते ॥ 12 ॥ इसके लिए फाल्गुन, चैत्र, माघ, वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़ मास सूर्य के उत्तरायण में स्थिति में होने से उत्तम मानी गई है। द्वितीया च तृतीया च पञ्चमी चाऽथ सप्तमी । दशम्येकादशी रम्या पूर्णिमा च त्रयोदशी ॥ 13 ॥ इसी तरह तिथियों में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी और पूर्णिमा बड़ी ही रम्य सुन्दर शुभ मानी गई हैं। उत्तरात्रयरोहिण्य आर्द्रा चैव पुनर्वसू । पुष्यानुराधाश्रवणं मृगस्वात्यौ च हस्तकम् ॥ 14 ॥ मूलं च नक्षत्राणि हि गृहे विष्टिविवर्जितम्। एतत्प्रोक्तं प्रतिष्ठादौ देवानां देववेश्मनाम् ॥ 15 ॥ इसी तरह शुभ नक्षत्रों का भी ध्यान रखना चाहिए जो इस प्रकार है- तीनों उत्तरा (उत्तराषाढ़ा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तरा भाद्रपद), रोहिणी, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा, श्रवण, मृगशिरा, स्वाती, हस्त और मूल- ये नक्षत्र गृह निर्माण के लिए ठीक हैं, इनमें यही ध्यान रखना आवश्यक है कि उस समय विष्टिकरण या भद्रा नहीं हो। यही समयादि देवताओं के मन्दिरों की प्रतिष्ठा में भी उपयुक्त कहा गया है। नक्षत्रफलमाह - उत्तरायां सदा वृद्धिर्हस्ते सिद्धिर्यथेप्सिता । ज्ञानलाभश्च श्रवणे मूले नन्दन्ति मन्त्रिणः ॥ 16 ॥ आर्द्रायां चैव सौभाग्यं रोहिण्यां न च संशयः । स्वातिः शान्तिप्रदा नित्यमनुराधा वरप्रदा ॥ 17 ॥ पुनर्वस्वोः प्रजावृद्धिः पुष्ये नीरोगिताश्रियौ । एतावन्त्येव लग्नानि यानि पूर्वोदितानि च ॥ 18 ॥ इति द्वादशप्रतिष्ठाः। (अब इन नक्षत्रों में कार्यारम्भ के फल कहते हैं) उत्तरा नक्षत्र में कार्यारम्भ करने पर सदा वृद्धि होती है; हस्त में भी जैसी चाहो वैसी सिद्धि प्राप्त होती है;