अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६५ ७८५ श्रवण में ज्ञान लाभ होता है और मूल में मन्त्रिगणों में आनन्द होता है। आर्द्रा में सौभाग्य और रोहिणी में भी निश्चित सौभाग्य मिलता है; स्वाती में शान्ति प्राप्त होती है और अनुराधा नक्षत्र में किया गया कार्य सदा वरद होता है। पुनर्वसु में प्रजावृद्धि होती है और पुष्य में निरोगता और श्रिय, सम्पत्ति आदि इन नक्षत्रों में आने वाले लग्नों के पूर्व में उदित होने पर मिलते हैं। अथ प्राचीमतमाह — प्राचीमतः प्रवक्ष्यामि दिङ्मूढभ्रान्तिनाशिनीम्। सा च पञ्चविधा उक्ता कथये यामनुक्रमात् ॥ 19 ॥ अब मैं प्राची साधन-मत के बारे में कहता हूँ, (प्राच्यादि दिशाओं के साधन के अभाव में) भवन या प्रासाद के दिङ्मूढ़ होने की भ्रान्ति का विनाश हो जाता है। यह प्राची साधन भी पाँच प्रकार का कहा गया है जिसे मैं अनुक्रम से कहता हूँ। राश्यानुसारेण शङ्कुच्छायाविचारः — दिनादौ मेषतुलयोः कृत्तिकाश्रवणोदये। चित्रास्वात्यन्तरे चैव शङ्कुच्छाया ध्रुवेषु च ॥ 20 ॥ दिवस के आरम्भ के समय तो मेष और तुला राशि का, उदय के पश्चात् कृत्तिका व श्रवण नक्षत्र का चित्रा व स्वाती नक्षत्र के अन्तर पर शङ्कु की छाया ध्रुव की ओर पड़ती है। नक्षत्रवेधवशाद्दिक्साधनम् — कृत्तिकोदये या प्राची सा प्राची श्रवणोदये। चित्रास्वात्यन्तरे प्राची तत्र सूत्रान्तरोत्तरा ॥ 21 ॥ ध्रुवशङ्कोद्भवा प्राची सूत्रसूत्रान्तरोत्तरा। दिनादौ मेषतुलयोः सूर्यसूत्रान्तरोत्तरा ॥ 22 ॥ कृत्तिका नक्षत्र के उदय होने पर जो प्राची (पूर्व) होती है, वही प्राची श्रवण नक्षत्र के उदय होने पर होती है और जो प्राची चित्रा और स्वाती नक्षत्र के अन्तर पर होती है और वहाँ उत्तरोत्तर सूत्र-सूत्र का अन्तर हो जाता है।¹ ध्रुव शङ्कु के
- कात्यायन शुल्बसूत्र में कहा गया है कि कृतिका, पुष्य, श्रवण और चित्रा स्वाती का अन्तर प्राची दिशा का रूप है अर्थात् कृतिका वेध की भाँति पुष्य व श्रवण का भी वेध करके प्राची या पूर्व दिशा का ज्ञान करना अपेक्षित होता है। यह साधन युगमात्र या 86 अङ्गुल नक्षत्रोंके ऊपर चढ़ने पर किया जाता है— कृतिका श्रवणं पुष्यं चित्रास्वात्योर्यदन्तरम्। एतत्प्राच्या दिशो रूपं युगमात्रोदिते पुरे॥ (कात्यायन. 34) यह मत है कि उज्जैयिनी से दक्षिण में रहने वालों को चित्रा व स्वाती के अन्तर से पूर्वा-पर दिशा का ज्ञान करना चाहिए