भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 372

सूत्र-६३ ३२७ इह वै सूत्रपातैश्च क्रियाः प्रासादकर्मणि। कार्याः पुरनिवेशे तु प्रारम्भे भवनस्य च॥ ७॥ भवन, प्रासादों के निर्माण के सूत्रपात के आरम्भ अर्थात् डाकवेल डालने (चूर्णादि डालकर या डोरी आदि बाँधकर भूमि चयन) तथा पुर निवेश, भवनादि के प्रारम्भ करने की यही विधि है। भूम्यारम्भे शिलान्यासे द्वारस्तम्भोच्छ्रयादिषु। आदित्ये चोत्तरस्थे च शोभने लग्न एव च॥ ८॥¹ इत्यारम्भादिशस्तमासादीनाः। भूमि चयन के आरम्भ में, शिलान्यास के अवसर पर, द्वार तथा स्तम्भों को खड़ा करते समय सदा ध्यान रखें कि सूर्य की स्थिति उत्तरायण में हो और लग्न भी शुभ और शोभन हो। निर्माणोपरान्त प्रासादप्रतिष्ठाविधिं — प्रतिष्ठाद्यं प्रवक्ष्यामि प्रोक्तं यत्परमेश्वरैः। अहं तत्कथयिष्यामि प्राग्देवज्ञैश्च भाषितम्॥ ९॥ अब जबकि भवन, प्रासादिक बनकर तैयार हो जाए तब उनकी प्रतिष्ठा होना भी परम आवश्यक है, उसके बारे में परमेश्वर ने जो प्रतिष्ठा विधि कही है, उसे मैं भी वैसे ही पुनः कहता हूँ, जैसे पहले के देवज्ञों, ज्योतिषियों ने कही थी। दीक्षा च सर्वकालेषु प्रतिष्ठा पञ्चमासिकी। चैत्रश्रावणवैशाखे शिवरात्रौ च कीर्तिके॥ १०॥ यह ध्यान में रखने की बात है कि दीक्षा और प्रतिष्ठादि सभी का समय पाँच मास का होता है। ये हैं— चैत्र, श्रावण, वैशाख, शिवरात्रि और कार्तिक मास। दीक्षाश्च द्वादश₁₂ प्रोक्ता मासे मासे च शाश्वताः। चाहिए। आश्लेषा, मूल एवं गण्डान्त की निवृत्ति के लिए अपने निमित्त शुभैच्छु जनों को विधिपूर्वक सूतकान्त में तीसरे मास में अथवा वर्ष के अन्त में, उसी जन्म नक्षत्र में उसकी शान्ति शास्त्रोक्त विधि से करवानी चाहिए, ऐसा वशिष्ठ का मत है— नैर्ऋत्य भौजङ्गमगण्डदोषनिवारणायाभ्युदयाय नूनम्। पितामहोक्तां रुचिरां च शान्ति प्रकुर्याद्दंशस्य हिताय नूनम्॥ शास्त्रोक्तरीत्या खलु सूतकान्ते मासे तृतीयेऽप्यथ वत्सरान्ते। कुर्याच्छान्तिं तदृक्षे वा तद्दोषस्यापनुत्तये॥ (वशिष्ठसंहिता 42, 22 एवं 27-28)

  1. उक्त श्लोक समराङ्गण. से तुलनीय है— द्वितीया पञ्चमी मुख्या सप्तमी नवमी तथा। एकादशीत्रयोदश्यस्ति (श्यौ ति) थयः स्युः शुभावहाः॥ चन्द्रताराबलं भर्तुरनुकूलं च शस्यते। इयं हि सूत्रपाताख्या क्रिया प्रासादकर्मणि॥ कार्या पुरनिवेशे च प्रारम्भे भवनस्य च। शिलानिवेशने द्वारस्तम्भोच्छ्रायादिकेषु च॥ आद्रियेत सिते पक्षे शोभने लग्न एव हि। (समराङ्गण. 26, 5-8)