अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें326 अपराजितपृच्छा स्पष्टार्थ चक्र¹ | चैत्र | वैशाख | ज्येष्ठ | आषाढ़ | श्रावण | भाद्र | आश्विन | कार्तिक | मार्ग | पौष | माघ | फाल्गुन | मास | | शो. | धन प्रा. | मरण | पशु हा. | पशुवृद्धि | शून्य | कलह | मृत्यु नाश | धान्य | धा. | अग्निभय | श्री | फल | अथ तिथ्यनुसारेणगृहारम्भफलमाह — तृतीया पञ्चमी चैव सप्तमी नवमी तथा। एकादशीत्रयोदश्यौ तिथयश्च सुखावहाः ॥ 5 ॥ इसी तरह तिथियों के बारे में भी विचार किया जाता है कि तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी और त्रयोदशी तिथियाँ शुभ और सुखदायी हैं। बलादीनां विचारमाह — चन्द्रताराबलं भर्तू राजमानं हि शस्यते। सूर्यपाततिथिं दद्याद् विष्टिगण्डान्तवर्जितम् ॥ 6 ॥ चन्द्र और ताराबल देखकर निकाला गया मुहूर्त भर्ता को राजा से सम्मान दिलाने वाला, शुभ होता है। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस समय कोई सूर्यपात तिथि², विष्टिकरण (भद्रा)³, गण्डान्त⁴ आदि न हो।
- श्रीपतिभट्टाचार्य का मत है— शोको धान्यं मृतपशुहर्ता द्रव्यवृद्धिर्विनाशो युद्धं भृत्यक्षतिरथ फलं श्रीश्च वह्नेर्भयं च। लक्ष्मीप्राप्तिर्भवति भुवनारम्भकर्तुः क्रमेण चैत्रादूचे मुनिरिति फलं वास्तुशास्त्रोपदिष्टम्॥ (ज्योतिषरत्नमाला 17, 14)
- महेश्वरोपाध्याय ने ज्योतिषवृत्तशतं में त्याज्य विषयों को लिखा है। यथा— नक्षत्रादि न संयुता तिथितीद्रैकोनविंशाष्ट दिक्त्रिःसप्ताङ्गतित च शैल विकृतीः वर्हत्प्रसङ्ख्येषु च। धिष्ण्येब्बिन्दु युतेषु दण्डकमुखायोगा भवन्ति क्रमात त्याज्याः कर्मसु शोभनेषु सुधियो सर्वेषु देशेषु वै॥ वाराणां त्रितयं तिथिः स्पृशति या वारस्तिथीनां त्रयं त्याज्योर्यम्णइने दिने तु हिमगौब्राह्मयस्तथा राक्षसः। पित्र्यस्यो क्षितिजे बुधे चभिजितोरक्षभोसर्वाक्पतौ तिथ्यांशो पितृवेधसोभृगुसुतो- युपोशयोः सूर्येजे॥ (ज्योतिषवृत्त. 1, 5-6)
- मास के शुक्लपक्ष में चतुर्थी, अष्टमी, एकादशी एवं पूर्णिमा तथा कृष्णपक्ष में एक-एक तिथि पूर्व अर्थात् तृतीया, सप्तमी, दशमी और चतुर्दशी को भद्रा की पुच्छ होती है। यह उक्त तिथियों में क्रमशः आठवें, पहले, छठे, तीसरे, सातवें, दूसरे, पाँचवें और चौथे प्रहर के अन्त में तीन-तीन घटी तक होती है। उक्त तिथियों में उक्त अवधि को ही शुभ जानना चाहिए, शेष अवधि शुभ कार्यार्थ त्याज्य होती है। इसी प्रकार चन्द्रमा और खलग्रहों (सूर्य, मङ्गल, शनि, राहु व केतु व इनसे युक्त बुध एवं क्षीण चन्द्रमा) का लग्न और नवांश भी त्याज्य है जैसा कि बृहस्पतिसंहिता में भी आया है— सिते चतुर्थ्यामन्त्यार्धमष्टम्याद्यार्धमेव च। एकादश्यां परार्धं तु पूर्वार्धं पूर्णशीतगौ॥ कृष्णे तृतीयान्त्यार्धं हि सप्तम्याद्यार्धमेव च। दशम्यामूत्तरार्धं तु चतुर्दश्यर्धमादितः। विष्ट्याख्योऽयं महादोषः कथितोऽत्र समस्तगः। तदानीं कृतसत्कर्मकर्ता सह विनश्यति॥ (पीयूषधाराटीका 1, 43 पर उद्धृत)
- त्रिविध गण्डान्त के विषय में ज्योतिष की मान्यता यह भी है कि नक्षत्र, तिथि व लग्न या राशि संज्ञक तीनों ही गण्डान्त का त्याग करना चाहिए। नक्षत्र गण्डान्त में नौ 2 के अन्त में 2 घटी, तिथि में पाँचवीं 2 के बाद 1 घटी तथा लग्न या राशि गण्डान्त में चौथी 2 के अन्त वाली घटी का त्याग किया जाना