अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
326 अपराजितपृच्छा स्पष्टार्थ चक्र¹ | चैत्र | वैशाख | ज्येष्ठ | आषाढ़ | श्रावण | भाद्र | आश्विन | कार्तिक | मार्ग | पौष | माघ | फाल्गुन | मास | | शो. | धन प्रा. | मरण | पशु हा. | पशुवृद्धि | शून्य | कलह | मृत्यु नाश | धान्य | धा. | अग्निभय | श्री | फल | अथ तिथ्यनुसारेणगृहारम्भफलमाह — तृतीया पञ्चमी चैव सप्तमी नवमी तथा। एकादशीत्रयोदश्यौ तिथयश्च सुखावहाः ॥ 5 ॥ इसी तरह तिथियों के बारे में भी विचार किया जाता है कि तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी और त्रयोदशी तिथियाँ शुभ और सुखदायी हैं। बलादीनां विचारमाह — चन्द्रताराबलं भर्तू राजमानं हि शस्यते। सूर्यपाततिथिं दद्याद् विष्टिगण्डान्तवर्जितम् ॥ 6 ॥ चन्द्र और ताराबल देखकर निकाला गया मुहूर्त भर्ता को राजा से सम्मान दिलाने वाला, शुभ होता है। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस समय कोई सूर्यपात तिथि², विष्टिकरण (भद्रा)³, गण्डान्त⁴ आदि न हो।
- श्रीपतिभट्टाचार्य का मत है— शोको धान्यं मृतपशुहर्ता द्रव्यवृद्धिर्विनाशो युद्धं भृत्यक्षतिरथ फलं श्रीश्च वह्नेर्भयं च। लक्ष्मीप्राप्तिर्भवति भुवनारम्भकर्तुः क्रमेण चैत्रादूचे मुनिरिति फलं वास्तुशास्त्रोपदिष्टम्॥ (ज्योतिषरत्नमाला 17, 14)
- महेश्वरोपाध्याय ने ज्योतिषवृत्तशतं में त्याज्य विषयों को लिखा है। यथा— नक्षत्रादि न संयुता तिथितीद्रैकोनविंशाष्ट दिक्त्रिःसप्ताङ्गतित च शैल विकृतीः वर्हत्प्रसङ्ख्येषु च। धिष्ण्येब्बिन्दु युतेषु दण्डकमुखायोगा भवन्ति क्रमात त्याज्याः कर्मसु शोभनेषु सुधियो सर्वेषु देशेषु वै॥ वाराणां त्रितयं तिथिः स्पृशति या वारस्तिथीनां त्रयं त्याज्योर्यम्णइने दिने तु हिमगौब्राह्मयस्तथा राक्षसः। पित्र्यस्यो क्षितिजे बुधे चभिजितोरक्षभोसर्वाक्पतौ तिथ्यांशो पितृवेधसोभृगुसुतो- युपोशयोः सूर्येजे॥ (ज्योतिषवृत्त. 1, 5-6)
- मास के शुक्लपक्ष में चतुर्थी, अष्टमी, एकादशी एवं पूर्णिमा तथा कृष्णपक्ष में एक-एक तिथि पूर्व अर्थात् तृतीया, सप्तमी, दशमी और चतुर्दशी को भद्रा की पुच्छ होती है। यह उक्त तिथियों में क्रमशः आठवें, पहले, छठे, तीसरे, सातवें, दूसरे, पाँचवें और चौथे प्रहर के अन्त में तीन-तीन घटी तक होती है। उक्त तिथियों में उक्त अवधि को ही शुभ जानना चाहिए, शेष अवधि शुभ कार्यार्थ त्याज्य होती है। इसी प्रकार चन्द्रमा और खलग्रहों (सूर्य, मङ्गल, शनि, राहु व केतु व इनसे युक्त बुध एवं क्षीण चन्द्रमा) का लग्न और नवांश भी त्याज्य है जैसा कि बृहस्पतिसंहिता में भी आया है— सिते चतुर्थ्यामन्त्यार्धमष्टम्याद्यार्धमेव च। एकादश्यां परार्धं तु पूर्वार्धं पूर्णशीतगौ॥ कृष्णे तृतीयान्त्यार्धं हि सप्तम्याद्यार्धमेव च। दशम्यामूत्तरार्धं तु चतुर्दश्यर्धमादितः। विष्ट्याख्योऽयं महादोषः कथितोऽत्र समस्तगः। तदानीं कृतसत्कर्मकर्ता सह विनश्यति॥ (पीयूषधाराटीका 1, 43 पर उद्धृत)
- त्रिविध गण्डान्त के विषय में ज्योतिष की मान्यता यह भी है कि नक्षत्र, तिथि व लग्न या राशि संज्ञक तीनों ही गण्डान्त का त्याग करना चाहिए। नक्षत्र गण्डान्त में नौ 2 के अन्त में 2 घटी, तिथि में पाँचवीं 2 के बाद 1 घटी तथा लग्न या राशि गण्डान्त में चौथी 2 के अन्त वाली घटी का त्याग किया जाना
सूत्र-६३ ३२७ इह वै सूत्रपातैश्च क्रियाः प्रासादकर्मणि। कार्याः पुरनिवेशे तु प्रारम्भे भवनस्य च॥ ७॥ भवन, प्रासादों के निर्माण के सूत्रपात के आरम्भ अर्थात् डाकवेल डालने (चूर्णादि डालकर या डोरी आदि बाँधकर भूमि चयन) तथा पुर निवेश, भवनादि के प्रारम्भ करने की यही विधि है। भूम्यारम्भे शिलान्यासे द्वारस्तम्भोच्छ्रयादिषु। आदित्ये चोत्तरस्थे च शोभने लग्न एव च॥ ८॥¹ इत्यारम्भादिशस्तमासादीनाः। भूमि चयन के आरम्भ में, शिलान्यास के अवसर पर, द्वार तथा स्तम्भों को खड़ा करते समय सदा ध्यान रखें कि सूर्य की स्थिति उत्तरायण में हो और लग्न भी शुभ और शोभन हो। निर्माणोपरान्त प्रासादप्रतिष्ठाविधिं — प्रतिष्ठाद्यं प्रवक्ष्यामि प्रोक्तं यत्परमेश्वरैः। अहं तत्कथयिष्यामि प्राग्देवज्ञैश्च भाषितम्॥ ९॥ अब जबकि भवन, प्रासादिक बनकर तैयार हो जाए तब उनकी प्रतिष्ठा होना भी परम आवश्यक है, उसके बारे में परमेश्वर ने जो प्रतिष्ठा विधि कही है, उसे मैं भी वैसे ही पुनः कहता हूँ, जैसे पहले के देवज्ञों, ज्योतिषियों ने कही थी। दीक्षा च सर्वकालेषु प्रतिष्ठा पञ्चमासिकी। चैत्रश्रावणवैशाखे शिवरात्रौ च कीर्तिके॥ १०॥ यह ध्यान में रखने की बात है कि दीक्षा और प्रतिष्ठादि सभी का समय पाँच मास का होता है। ये हैं— चैत्र, श्रावण, वैशाख, शिवरात्रि और कार्तिक मास। दीक्षाश्च द्वादश₁₂ प्रोक्ता मासे मासे च शाश्वताः। चाहिए। आश्लेषा, मूल एवं गण्डान्त की निवृत्ति के लिए अपने निमित्त शुभैच्छु जनों को विधिपूर्वक सूतकान्त में तीसरे मास में अथवा वर्ष के अन्त में, उसी जन्म नक्षत्र में उसकी शान्ति शास्त्रोक्त विधि से करवानी चाहिए, ऐसा वशिष्ठ का मत है— नैर्ऋत्य भौजङ्गमगण्डदोषनिवारणायाभ्युदयाय नूनम्। पितामहोक्तां रुचिरां च शान्ति प्रकुर्याद्दंशस्य हिताय नूनम्॥ शास्त्रोक्तरीत्या खलु सूतकान्ते मासे तृतीयेऽप्यथ वत्सरान्ते। कुर्याच्छान्तिं तदृक्षे वा तद्दोषस्यापनुत्तये॥ (वशिष्ठसंहिता 42, 22 एवं 27-28)
- उक्त श्लोक समराङ्गण. से तुलनीय है— द्वितीया पञ्चमी मुख्या सप्तमी नवमी तथा। एकादशीत्रयोदश्यस्ति (श्यौ ति) थयः स्युः शुभावहाः॥ चन्द्रताराबलं भर्तुरनुकूलं च शस्यते। इयं हि सूत्रपाताख्या क्रिया प्रासादकर्मणि॥ कार्या पुरनिवेशे च प्रारम्भे भवनस्य च। शिलानिवेशने द्वारस्तम्भोच्छ्रायादिकेषु च॥ आद्रियेत सिते पक्षे शोभने लग्न एव हि। (समराङ्गण. 26, 5-8)
धर्मार्थकाममोक्षाश्च शिष्यैर्वै गुर्वनुग्रहात् ॥ 11 ॥ दीक्षा भी बारह कही गई है जो प्रति मास शाश्वत रूप से धर्म, काम, मोक्ष के हेतु से शिष्यों को गुरु के अनुग्रह से प्रदान की जाती है। फाल्गुने वाऽथ चैत्रे वा माघे वैशाख उत्तमा । ज्येष्ठे मासे तथाऽऽषाढे आदित्ये चोत्तरस्थिते ॥ 12 ॥ इसके लिए फाल्गुन, चैत्र, माघ, वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़ मास सूर्य के उत्तरायण में स्थिति में होने से उत्तम मानी गई है। द्वितीया च तृतीया च पञ्चमी चाऽथ सप्तमी । दशम्येकादशी रम्या पूर्णिमा च त्रयोदशी ॥ 13 ॥ इसी तरह तिथियों में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी और पूर्णिमा बड़ी ही रम्य सुन्दर शुभ मानी गई हैं। उत्तरात्रयरोहिण्य आर्द्रा चैव पुनर्वसू । पुष्यानुराधाश्रवणं मृगस्वात्यौ च हस्तकम् ॥ 14 ॥ मूलं च नक्षत्राणि हि गृहे विष्टिविवर्जितम्। एतत्प्रोक्तं प्रतिष्ठादौ देवानां देववेश्मनाम् ॥ 15 ॥ इसी तरह शुभ नक्षत्रों का भी ध्यान रखना चाहिए जो इस प्रकार है- तीनों उत्तरा (उत्तराषाढ़ा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तरा भाद्रपद), रोहिणी, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा, श्रवण, मृगशिरा, स्वाती, हस्त और मूल- ये नक्षत्र गृह निर्माण के लिए ठीक हैं, इनमें यही ध्यान रखना आवश्यक है कि उस समय विष्टिकरण या भद्रा नहीं हो। यही समयादि देवताओं के मन्दिरों की प्रतिष्ठा में भी उपयुक्त कहा गया है। नक्षत्रफलमाह - उत्तरायां सदा वृद्धिर्हस्ते सिद्धिर्यथेप्सिता । ज्ञानलाभश्च श्रवणे मूले नन्दन्ति मन्त्रिणः ॥ 16 ॥ आर्द्रायां चैव सौभाग्यं रोहिण्यां न च संशयः । स्वातिः शान्तिप्रदा नित्यमनुराधा वरप्रदा ॥ 17 ॥ पुनर्वस्वोः प्रजावृद्धिः पुष्ये नीरोगिताश्रियौ । एतावन्त्येव लग्नानि यानि पूर्वोदितानि च ॥ 18 ॥ इति द्वादशप्रतिष्ठाः। (अब इन नक्षत्रों में कार्यारम्भ के फल कहते हैं) उत्तरा नक्षत्र में कार्यारम्भ करने पर सदा वृद्धि होती है; हस्त में भी जैसी चाहो वैसी सिद्धि प्राप्त होती है;
सूत्र-६५ ७८५ श्रवण में ज्ञान लाभ होता है और मूल में मन्त्रिगणों में आनन्द होता है। आर्द्रा में सौभाग्य और रोहिणी में भी निश्चित सौभाग्य मिलता है; स्वाती में शान्ति प्राप्त होती है और अनुराधा नक्षत्र में किया गया कार्य सदा वरद होता है। पुनर्वसु में प्रजावृद्धि होती है और पुष्य में निरोगता और श्रिय, सम्पत्ति आदि इन नक्षत्रों में आने वाले लग्नों के पूर्व में उदित होने पर मिलते हैं। अथ प्राचीमतमाह — प्राचीमतः प्रवक्ष्यामि दिङ्मूढभ्रान्तिनाशिनीम्। सा च पञ्चविधा उक्ता कथये यामनुक्रमात् ॥ 19 ॥ अब मैं प्राची साधन-मत के बारे में कहता हूँ, (प्राच्यादि दिशाओं के साधन के अभाव में) भवन या प्रासाद के दिङ्मूढ़ होने की भ्रान्ति का विनाश हो जाता है। यह प्राची साधन भी पाँच प्रकार का कहा गया है जिसे मैं अनुक्रम से कहता हूँ। राश्यानुसारेण शङ्कुच्छायाविचारः — दिनादौ मेषतुलयोः कृत्तिकाश्रवणोदये। चित्रास्वात्यन्तरे चैव शङ्कुच्छाया ध्रुवेषु च ॥ 20 ॥ दिवस के आरम्भ के समय तो मेष और तुला राशि का, उदय के पश्चात् कृत्तिका व श्रवण नक्षत्र का चित्रा व स्वाती नक्षत्र के अन्तर पर शङ्कु की छाया ध्रुव की ओर पड़ती है। नक्षत्रवेधवशाद्दिक्साधनम् — कृत्तिकोदये या प्राची सा प्राची श्रवणोदये। चित्रास्वात्यन्तरे प्राची तत्र सूत्रान्तरोत्तरा ॥ 21 ॥ ध्रुवशङ्कोद्भवा प्राची सूत्रसूत्रान्तरोत्तरा। दिनादौ मेषतुलयोः सूर्यसूत्रान्तरोत्तरा ॥ 22 ॥ कृत्तिका नक्षत्र के उदय होने पर जो प्राची (पूर्व) होती है, वही प्राची श्रवण नक्षत्र के उदय होने पर होती है और जो प्राची चित्रा और स्वाती नक्षत्र के अन्तर पर होती है और वहाँ उत्तरोत्तर सूत्र-सूत्र का अन्तर हो जाता है।¹ ध्रुव शङ्कु के
- कात्यायन शुल्बसूत्र में कहा गया है कि कृतिका, पुष्य, श्रवण और चित्रा स्वाती का अन्तर प्राची दिशा का रूप है अर्थात् कृतिका वेध की भाँति पुष्य व श्रवण का भी वेध करके प्राची या पूर्व दिशा का ज्ञान करना अपेक्षित होता है। यह साधन युगमात्र या 86 अङ्गुल नक्षत्रोंके ऊपर चढ़ने पर किया जाता है— कृतिका श्रवणं पुष्यं चित्रास्वात्योर्यदन्तरम्। एतत्प्राच्या दिशो रूपं युगमात्रोदिते पुरे॥ (कात्यायन. 34) यह मत है कि उज्जैयिनी से दक्षिण में रहने वालों को चित्रा व स्वाती के अन्तर से पूर्वा-पर दिशा का ज्ञान करना चाहिए
: 'भ' has a loop. Look at 'भ' in "पर्वभिः" in : 'भि' has a loop. Now look at the letter under 'द्' in line 18: It has NO loop! It is rounded like 'ध' in "अर्बुदार्द्धमयनं"! Wait, look at "अर्बुदार्द्धमयनं" (line 5): There is 'र्', then 'द्', and below 'द्' is 'ध'. In line 18, under 'द्', it is 'ध'! Wait, so it is 'द्ध'! Now look at the next letter: Is it 'व'? Yes, 'व'. Is there an 'ा' (aa matra) after 'व'? Look at "द्वादशपर्वोद्भवश्च" vs "द्वादशपर्वोद्धवाश्च": Wait, look at 'व' in "द्वादश": It is 'द्' + 'व' + 'ा' = 'द्वा'. Now look at the letter between 'द्ध' and 'श्च': Wait, is it 'व' or 'वा'? Look at the space: द् - ध - व - ा - श्च There is definitely 'वा'! Wait, or is it 'द्ध्वाश्च'? Let's look at the letter: Could it be: द् ध Wait, is it: द्
सूत्र-६३ 331 द्वादश दशाष्टाभिश्च त्रिभिर्वृत्तं क्षमाङ्कितम्। शङ्कुच्छायास्त्रिगुणतो द्विपर्व¹युक्तिको समा ॥ २६ ॥ उस समतल भूमि पर 12, 10 और 8 शङ्कु के पर्वों की लम्बाई के नाप से क्रमशः तीन वृत्त अङ्कित करें। भूमि में क्षिस अर्थात् खुदाई करके— इस तरह दो-दो पर्व समान युक्ति से शङ्कु की छाया पथ 12 पर्व के वृत्त पर, दूसरा छायापथ 10 पर्व के वृत्त पर और तीसरा छायापथ 8 पर्व के वृत्त पर देखा जा सकेगा। परिधौ बाह्यवृत्तस्य व्यासे शङ्कुतुल्योत्तमा। कूलवंश पूर्वा छाया ²शङ्कुश्शरण आश्रितैः ॥ २७ ॥ यह तो स्पष्ट ही है कि बाह्य वृत्त की परिधि तो शङ्कु के तुल्य 12 पर्वों के व्यास से बनी है। इन के वृत्तों के किनारे की छाया (कूलवंश) पूर्व की ओर से आती है, जो शङ्कु के ऊपर चलने से आती है। छायाग्रे वृत्ततुल्या च छाया पूर्वापरोद्भवा। प्रवेशे निर्गमे छाया याति सूत्रं सदा भवेत् ॥ २८ ॥ यह शङ्कु की छाया पूर्व से पश्चिम की ओर पड़ती हुई उद्भव होती है और छायाग्र वृत्त के तुल्य बनती जाती है अर्थात् बारह पर्व की छाया बड़े वृत्त पर, दश पर्व की छाया मध्यम वृत्त पर और आठ पर्व की छाया कनिष्ठ वृत्त पर होगी। इस तरह छाया का प्रवेश और छाया के निर्गम से वृत्तों पर ध्यान देने से याति सूत्र सदा बनता रहता है। याम्योत्तरं सूत्रपाते मत्स्यमुखं पुच्छाग्रसूत्रे ?। याम्योत्तरोद्गतं सूत्रं विकर्णैः कर्णसाधनम् ॥ २९ ॥ दक्षिण और उत्तर के सूत्रपात से (चुम्बकीय विधि से, कुतुबनुमा की सुई से?) मत्स्य की पुच्छ और मुख सीध में होते हैं। इस दक्षिण उत्तर से बनने वाले सूत्र से ही विकर्ण का कर्ण साधन बनता है। निशाकाले ध्रुवसाधनमाह — अथ रात्रौ ध्रुवमसाध्यं दक्षिणोत्तरम्। मण्डलोभयपक्षे च मध्ये स्थाप्यं त्रिदीपकम् ॥ ३० ॥ अब रात्रि में ध्रुव साधन की विधि कहते हैं। रात्रि में ध्रुव का अक्ष सीधा,
- 'युक्तिकोत्तमा?' इति प्रकाशित पाठः।
- 'शङ्कुशरुणाश्रितैः?' इति प्रकाशित पाठः।
३३८ अपराजितपृच्छा हमेशा दक्षिण उत्तर की दिशा की सूचक है। उस शङ्कु मण्डल के घेरों पर दोनों ओर एक मध्य में तीन दीपक रखें। एकसूत्रे यदा त्रीणि दीपशिखाग्रकाणि च। पूर्वसंस्थं ध्रुवसाध्यमपरस्थं च दोषकृत् ? ॥ ३१ ॥ जब तीनों दीपकों का शिखाग्र एक सूत्र में आ जाए, तो पूर्व की तरह की ध्रुव साध्य हो जाता है। इसमें अन्य अन्तर रह जाए तो दोषपूर्ण माना जाता है। शस्तं तु मीनपातैश्च पूर्वापरादिसाधनम्। विकर्णकर्णगा साध्या ध्रुवशङ्कुप्राच्युद्भवः ॥ ३२ ॥ (अब यह सिद्ध हो गया है कि ध्रुवार्थ चुम्बक विधि से) मत्स्यपातानुसार देखा गया पूर्वा-पर दिक् साधन प्रशस्त है अर्थात् ठीक-ठीक है तथा विकर्ण और कर्ण की ओर जाने वाली दिशा-रेखाएँ इससे साध्य हैं, वैसे ही जैसे ध्रुव शङ्कु से प्राच्युद्भव छाया से साध्य होती है।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गृहारम्भप्रतिष्ठादिनमासनिर्णयाधिकारो नाम त्रिषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गृहारम्भ, प्रतिष्ठा दिन मास निर्णय अधिकार नामक तिरसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥ आयाधिकारो नाम चतुःषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६४ ॥ विश्वकर्मोवाच — आयव्यांशका ऋक्षं ताराचन्द्रबलं गृहे। जीवितं मरणं ज्ञेयं वास्तुविज्ञानपूर्वकम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा कि गृहों के आय-व्यय, अंशक, नक्षत्र, ताराबल, चन्द्रबल,
- ग्रन्थकार यहाँ दिक्सूचकयन्त्र की प्रशंसा करता ही प्रतीत होता है। वैसे दिक्सूचकयन्त्र बहुत पहले ही प्रयोग में आ चुका था। ज्योतिषियों ने भी इसकी प्रशंसा में कहा है कि शिल्पीगण चुम्बकीय यन्त्र से भी दिशा का ज्ञान करते हैं, पूर्वा-पर का जो ज्ञान किया गया, वह सममण्डलीय है, इससे सूर्य के उदयास्त, पूर्वा-पर और अर्ध्यादि उदित और अन्यत्र अल्प अन्तरादि को समझा जा सकता है — सचुम्बकादेव सुशिल्पविज्ञाः कुर्वन्ति दिग्ज्ञानमितोऽन्यथैव । पूर्वापरा याऽत्र कृता प्रकारैर्ज्ञेया बुधैः सा सममण्डलीया ॥ अर्कोदयास्तजे पूर्वापरे तेऽर्ध्यादिपूदिते। अन्यत्राल्पान्तरात् केचिदुदङ्मेरुं ततो जगुः ॥ (सिद्धान्ततत्त्वविवेक : कमलाकर भट्ट, परिष्कर्ता : पं. सुधाकर द्विवेदी व पं. मुरलीधर शर्मा, ब्रजभूषणदास एण्ड कंपनी, बनारस, द्वितीयावृत्ति, 3, त्रिप्रश्नाधिकार 378-379, पृष्ठ 302-303)
सूत्र-६४ 333 उनका जीवन और मरण वास्तुविज्ञान के अनुसार ठीक-ठीक से जानना चाहिए।¹ वास्तुदण्डाह — नगरे वा पुरे चैव मानं दण्डैर्विधीयते। वास्तुदण्ड इति प्रोक्तः सोऽत्र वै हस्तसङ्ख्यया ॥ २॥ चतुर्हस्तं च यत्क्षेत्रमङ्गुलैश्च फलप्रदम्। वस्वङ्गुलैश्च क्षेत्रं तु पादैर्वा प्रतिशोधयेत् ॥ ३॥ नगर और पुर आवासों का लम्बाई-चौड़ाई के माप के मान को दण्ड विधि से करना चाहिए। इसे 'वास्तुदण्ड' कहते है। उसकी हस्त संख्या (गज की संख्या) लम्बाई हेतु इस प्रकार समझें— चार हाथ के गज का जो क्षेत्र हो उसका उतने ही अङ्गुल माप का फल होता है। आठ अङ्गुल का क्षेत्र होने पर उसमें एक पाद से शोधन करना चाहिए। तत्क्षेत्रं तु यथाकारमश्मकार्ये विशोधयेत्। यत्र हस्तमितिः क्षेत्रे तद्गृहं हस्तसङ्ख्यया ॥ ४॥ क्षेत्रलाभे तु तत्रैव स्यात्स्वदेहाङ्गुलैर्गृहम्। अङ्गुलैः क्षेत्रमाने च अङ्गुलैस्तदलाभतः ॥ ५॥ उस क्षेत्र के आकार के ही पाषाण कार्य का शोधन करना चाहिए। जहाँ हस्त (गज) के नाप में क्षेत्र आते हों उन गृहों में हस्त-गज की संख्यानुसार क्षेत्रलाभ में वहाँ अपनी ही देह के अङ्गुल प्रमाण का गृह होता है तथा अङ्गुलों के क्षेत्रमान के अनुसार अङ्गुलों को उसका लाभ माने। पादैर्वापि यवैर्वापि गृहक्षेत्रानुसारतः। तृणच्छन्दे स्वामिहस्तैर्हर्म्यादौ कर्मिहस्ततः ॥ ६॥ (इसके अभाव में या वैसा सम्भव नहीं हो तो) गृहक्षेत्रानुसार पादमान से या यवमान लें। तृणच्छन्दों में तो गृहस्वामी के हाथ (गज) के अनुसार और हवेलियों आदि में कर्मिहस्त अर्थात् शिल्पी के हस्त (गज) अनुसार माप का मान लेना चाहिए। राजवेश्मपुरादीनां वापीकूपादिकस्य च। प्रासादेषु च देवानां शास्त्रहस्तेन केवलम् ॥ ७॥
- आचार्य श्रीपति का मत है— आयव्याक्षांशचन्द्रतारबलानि शास्त्रादवलोक्य सम्यक्। आयुर्धनाऽऽरोग्ययशोभिवृद्ध्यै गृहं गृहस्थो हि निधापयीत्॥ (ज्योतिषरत्नमाला 17, 1)
334 अपराजितपृच्छा इसी तरह राजाओं के महल, पुर आदि तथा कूपादिक और प्रासाद, देवमन्दिरों तथा देवों के लिए केवल शास्त्रविहित हाथ (गज) ही मान्य है। अथायनयनमाह — दैर्घ्यं हन्यात्पृथुत्वेन हरेद्भागं ततोऽष्टभिः । शेषमायं चैव विद्याच्छास्त्रदृष्टं ध्वजादिकम् ॥ 8 ॥ लम्बाई से चौड़ाई के माप को गुणा करके प्राप्त गुणनफल में 8 का भाग दें, जो शेष आएगा, उसे ध्वजादिक आय को शास्त्रीय दृष्टि से समझना चाहिए। विधि — लम्बाई × चौड़ाई / 8 = क्रमशः 1 से 8 तक ध्वजादि आय। आयनामानि — ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरौ गजः । ध्वाङ्क्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः ॥ 9 ॥ इन आयों के नाम हैं- 1. ध्वज, 2. धूम, 3. सिंह, 4. श्वान, 5. वृष, 6. खर, 7. गज और 8. ध्वांक्ष। इनको सदा प्राच्यादि, प्रदक्षिणतः क्रम में लेना चाहिए। अन्योऽन्याभिमुख्रास्ते च क्रमच्छन्दानुसारतः । पूर्वं च ये समुद्दिष्टाः आयुर्वृद्धिविधायकाः ॥ 10 ॥ ये परस्पर आमने-सामने हो सकते हैं, छन्द-क्रमानुसार हो सकते हैं, ऐसा पूर्व में (मनीषियों द्वारा) कहा गया है। गृह में ये आयु की वृद्धि के विधायक अर्थात् लाभदायक व अनुकूल होते हैं। आय प्रयोजनमाह — ध्वजः सिंहो वृषगजौ शस्यन्ते सुरवेश्मनि । अधमानां खरध्वजाङ्क्षधूम्रश्वानः सुखावहाः ॥ 11 ॥ देववेश्म अर्थात् मन्दिरादि में ध्वज, सिंह, वृष और गजाय प्रशस्त मानी गई है। इनको ही उचित मान कर ग्रहण किया गया है, परन्तु इन से कम के लिए खर, ध्वांक्ष, धूम और श्वानाय सुखप्रद होती है। युगादिपरत्वेन ग्राह्यायाः — ध्वजः प्रायः कृतयुगे त्रेतायां सिंह एव च । द्वापरे वृषबाहुल्यं गज एव कलौ युगे ॥ 12 ॥ ध्वज आय प्रायः सतयुग में तथा सिंह आय त्रेतायुग में और वृष बाहुल्य से वृष आय द्वापर युग में तथा गज आय कलियुग में मान्य कही गई है।
सूत्र-६४ 335 विप्रादिजातिपरत्वेन ग्राह्यायाः - कल्याणं कुरुते सिंहो नृपाणां च विशेषतः। ध्वजः प्रशस्यते विप्रे वृषो वैश्ये उदाहृतः ॥ 13 ॥ सिंह आय विशेषकर राजा लोगों का कल्याण करती है जबकि ध्वजाय विप्रों के लिए लाभकारी शुभ है और वृष आय वैश्यों के लिए उचित कही है। उत्तरोत्तरमाख्याताश्चतुर्वर्णफलप्रदाः । ध्वजे चैवार्थलाभः स्याद् धूमे सन्ताप एव च ॥ 14 ॥ इस तरह ये आय चारों वर्णों के लिए उत्तरोत्तर कही गई है, जो उनके लिए शुभ फलदात्री है। (अब इन के लाभ हानि भी देखें) ध्वज आय आने पर धन की प्राप्ति होती है, अर्थ लाभ होता है परन्तु धूमाय आने पर सन्ताप का कारण बनता है। सिंहे च विपुला भोगाः कलिः श्वाने सदा भवेत्। धनधान्यं वृषे चैव स्त्रीदूषणं च रासभे ॥ 15 ॥ गजे भद्राणि पश्यन्ति ध्वाङ्क्षे च मरणं ध्रुवम्। इसी तरह सिंह आय आने पर विपुल भोग उपलब्ध होते हैं परन्तु श्वान आय आने पर सदा कलह होता रहता है। वृष आय आने पर धन-धान्य की प्राप्ति होती है परन्तु खर आय आने पर स्त्रीवर्ग में दूषण फैलने की आशङ्का होती है। गज आय से भला, सुन्दर होता है परन्तु ध्वांक्ष आय से निश्चित मरणान्तद कष्ट होता है। अथ प्रशस्तऽऽयोच्यते - प्रासादप्रतिमालिङ्गे जगतीपीठमण्डपे ॥ 16 ॥ वेदीकुण्डशुचिष्वेवं पताकाछत्रचामरे। वापीकूपतडागानां कुण्डानां च जलाशये ॥ 17 ॥ ध्वजोच्छ्रयस्य संस्थाने ध्वजं तत्र निवेशयेत्। (अब प्रशस्त आय कहाँ, कैसी हो उसके बारे में कहता हूँ) प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ, मण्डप, वेदी-कुण्ड, शुचि, पताका, छत्र, चामर, वापी, कूप, तड़ाग, कुण्ड, जलाशय और ध्वजा की ऊँचाई के स्थापन पर हमेशा ध्वज आय का प्रयोग करना चाहिए। आसने देवपीठेषु वस्त्रालङ्कारयोजने ॥ 18 ॥ केयूरमुकुटाद्ये च वेशयेच्च ध्वजं शुभम्। इसी तरह आसन, देवपीठ, वस्त्रालङ्कार के नियोजन में, केयूर, मुकुट आदि वेशों में भी ध्वज आय शुभ होती है।
336 अपराजितपृच्छा अग्निकर्मसु सर्वेषु होमशालामहानसे ॥ १९ ॥ धूमोऽग्निकुण्डसंस्थाने होमकर्मगृहेऽपि वा । सभी प्रकार के अग्नि सम्बन्धी कार्यों में, यज्ञ-होमशाला, रसोईघर, अग्निकुण्ड संस्थान में, होम करने के गृह में धूम आय देनी चाहिए। आयुधानां समस्तानां नृपाणां भवनेषु च ॥ २० ॥ नृपासने सिंहद्वारे सिंहं तत्र निवेशयेत् । समस्त आयुधों के निर्माण, राजाओं के महलों में, राजा के सिंहासन तथा राजप्रासाद के सिंहद्वार पर सिंह आय देनी चाहिए। श्वानश्च म्लेच्छजातौ च गेहे श्वानोपजीविनाम् ॥ २१ ॥ तथा चाऽशुद्धसंस्थाने प्रशस्तः श्वानको मतः । म्लेच्छ जाति के लोगों के घरों में, श्वान पालने वाले लोगों के घरों में तथा सभी अशुद्ध संस्थानों में श्वान आय ही प्रशस्त कही गई है। वणिकर्मसु सर्वेषु भोज्यपात्रेषु मण्डपे ॥ २२ ॥ वृषस्तुरङ्गशालायां गोशालायां च गोकुले । सभी वणिक कर्मों (व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, शोरूम, दुकानादि के कलम, फर्नीचर) में, खाने-पीने के पात्रों में, मण्डपों में, घुड़साल में, गोशाला में, गोकुलों में वृष आय प्रशस्त कही गई है। ततविततादिस्वरे वादित्रे विविधे तथा ॥ २३ ॥ कुलालरजकादीनां खरो गर्दभजीविनाम् । तत् वाद्य में, वितत् वाद्य में, अन्य तरह-तरह के वाद्यों (सुषिर, घनादि¹) में, कुलाल-कुम्भकारों के यहाँ, रजकों (धोबी) और गधों द्वारा जीविका चलाने वालों (ओड्रादि) के यहाँ खर आय प्रशस्त कही गई है। गजश्च गजशालायां यानझम्पानयो रथे ॥ २४ ॥ शय्यायां शिविकायां च गजमुद्रा चतुष्कतः । अन्तःपुरे गृहे प्रोक्तः पिण्डांवास्यादिकोद्भवः ? ॥ २५ ॥ अन्योपस्करकादौ च मदनागारके गजः । इसी प्रकार गजशाला में, यान, झम्पान में, रथों में, शय्या में, शिबिका, तम्बू-
- वाद्यों का वर्णन अपराजित. में 237वें सूत्र में आया है। नाट्यशास्त्र, सङ्गीतरत्नाकर आदि ग्रन्थों में भी यह वर्णन हुआ है। यथा— वाद्यतन्त्रीततं वाद्यं सुषिरं मतम् ॥ चर्मावनद्धवदनमवनद्धं तु वाद्यते घनो मूर्तिः साभिघाताद् वाद्यते यत्र तद्धनम् ॥ (सङ्गीतरत्नाकर 6, 5-6)
सूत्र-६४ 337 डेरों (शिविर) में, गजमुद्रा की चौकी पर, अन्तःपुर में, पिण्ड आवास आदि गृहों में, अन्य उपकरणों में भी, मदनागार अर्थात् रतिगृहों में, शीशमहल में गज आय प्रशस्त होती है। तथाऽरहट्टयन्त्रेषु जिनशालादिकेषु च ॥ २६ ॥ ध्वाङ्क्षः कल्याणकृच्चैव शिल्पकर्मोपजीविनाम् । अरहट्ट यन्त्रों अर्थात् जलोत्थान के लिए प्रयोक्तव्य रहटों में और जिनालयों में ध्वांक्ष आय देना शिल्प कर्मोपजीवियों के लिए कल्याणकारक है। स्वके स्वके वै स्थाने च सर्वे कल्याणकारकाः ॥ २७ ॥ मित्रस्नेहानुगाश्चैव ते सर्वे हितकामदाः । इस प्रकार जिस-जिस स्थान के लिए जो-जो आय कही गई है, उन आयों को अपने-अपने स्थान पर देना कल्याणकारक है। जो मित्रों के स्नेह के अनुसार चलती है, वे भी सभी हितकारी व कामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है। परस्परदेय आयानि — वृषस्थाने गजं दद्यात् सिंहं वृषभहस्तिनोः ॥ २८ ॥ वृष के स्थान पर गज आय दी जा सकती है और सिंह के स्थान पर वृष आय और गज आय दी जा सकती है। ध्वजः सर्वेषुदातव्यो वृषो नाऽन्यत्रदीयते । गजाभिदृष्टिः सिंहः स्याद् वारुणाभिमुखो ध्वजः ॥ २९ ॥ वृषभः प्राच्याभिमुखो गजो वाम्यमुखस्तथा । सन्मुखा याम्योत्तराश्च अशस्ताः पृष्ठातोमुखाः ॥ ३० ॥ स्वके स्वके वै स्थाने च प्रशस्ताश्च त्रिदिक्षु च । ध्वज आय सभी स्थानों पर दी जा सकती है, परन्तु वृष आय को अन्यत्र कहीं भी नहीं देना चाहिए। गज के सम्मुख सिंह आय हो, वारुणाभिमुख ध्वज आय हो, वृषभ आय पूर्वाभिमुख हो, गज आय दक्षिणमुखी हो और ये सभी सम्मुख, दक्षिण- उत्तर की ओर की तथा पृष्ठतोमुखी आए तो ठीक नहीं, अशस्त कही गई है। अपने- अपने स्थान पर तो ये तीनों दिशाओं से प्रशस्त ही होती है। अथाऽऽयस्वरूपाणि — ध्वजः पुरुषरूपश्च सिंहः सिंहस्वरूपकः ॥ ३१ ॥ वृषो वृषभरूपाढ्यो गजो हस्तिस्वरूपकः । धूमो मार्जाररूपश्च श्वानः श्वानाधिरूपकः ॥ ३२ ॥
338 अपराजितपृच्छा खरो गर्दभरूपाढ्यो ध्वाङ्क्षः काकस्वरूपकः। (अब आयों के स्वरूप के विषय में कहा जा रहा है) ध्वज आय का पुरुष रूप है। सिंह आय का सिंहरूप, वृष आय वृषभरूप है और गज आय हाथी का रूप है। धूम आय मार्जार या बिलाव रूप और श्वान आय श्वान रूप है। खर आय गर्दभ रूप है और ध्वांक्ष आय काकस्वरूपी है। सर्वे च वृषभारूढाः ¹'पुरुषाकारमुदराः॥ ३३॥ तद्रूपकाश्च हस्ताभ्यां पादाभ्यां विहगानुगाः। ग्रीवया सिंहरूपाश्च प्रबलाश्च महोत्कटाः॥ ३४॥ इन सभी आयों का आकार पुरुष जैसा, पेट भी वैसा ही होता है, वे वृषभारूढ़ हैं। उनके हाथ भी पुरुष के हाथों जैसे है परन्तु उनके पाँवों का आकार पक्षियों के पंजों जैसा होता है। उनकी ग्रीवा बड़ी प्रबल, महोत्कट और सिंह की गर्दन के आकार की होती है। महागणेश्वराः प्रोक्ता अष्टदिक्क्षेत्रपालकाः। वास्तुकर्मसु सर्वेषु आया दिक्पतयोऽष्ट हि॥ ३५॥ इन आयों को ही महागणेश्वर और अष्टदिक्-क्षेत्रपाल कहा गया है अस्तु, सभी वास्तुकर्मों में ये आय आठों दिक्-क्षेत्रपाल ही है। पूजिताः पूजयन्त्येव निघ्नन्ति चापदस्थिताः।² साध्यक्षेत्र च त्रिपुटं प्रभिन्नं च नवांशकः॥ ३६॥ इनकी पूजा करते रहने से, ये अपने पद पर स्थित रहते हुए निर्विघ्न कार्य करवाते हैं। इनके साध्य क्षेत्र त्रिपुट वाले है और इनके भाग नवांशक होते हैं। अष्टौ तथाऽऽयस्थानानि मध्ये स्यात्कुलदेवता। गृहस्याऽभिमुखाः शस्ताः मध्यमाश्च पराङ्मुखाः॥ ३७॥ इन आठों आय स्थानों के मध्य में कुल देवता का वास है। अस्तु, सभी आय गृहों के सम्मुख शुभ होती है और विपरीत मुख वाली मध्यम होती है। नगरभिमुखाः शस्ताः पुरबाह्ये तु देवताः। देवानां प्रतिमा आया दिशापाला इति स्मृताः॥ ३८॥
- 'पुरुषाकारमुद्गला?' इति प्रकाशित पाठः। तुलनीय— मुखैः स्वनामसदृशा नराकारकरोदराः। हस्ताभ्यां तद्रूपाढ्याः पादाभ्यां विहगाकृतिः॥ सर्वेषां सिंहवद्ग्रीवा प्रबलाश्च महोत्कटाः। (ज्ञानप्रकाशदीपार्णव 1, 35-36)
- तुलनीय— महागणेश्वराः प्रोक्ताः क्षेत्रपाश्च दिशाष्टसु॥ वास्तुकर्मसु सर्वेषु आयादिक्पतयोऽष्ट हि। पूजिताः पूजयन्त्येव निघ्नन्ति च पदे स्थिताः॥ (दीपार्णव 1, 36-37)
सूत्र-६४ 339 पुर के बाहर के जितने भी देव मन्दिरादि हों, वे नगराभिमुख ही शुभ होते हैं। देव प्रतिमा की आय ही दिशापाल कही गई है, ऐसा जानें। वसवः प्रतिदेवाश्च शिवयोगसमुद्भवाः। यावत्तु शिवदेवत्वं यावच्चन्द्रार्कमेदिनी। तावच्च वास्तुशास्त्रोक्ता आयाश्च समुदाहृताः॥ ३९॥ प्रत्येक देवता का आवास स्थान मन्दिरादि शिव के योग से ही समुद्भूत है। अस्तु, इस जगत में जब तक सूर्य और चन्द्र रहेंगे और जब तक शिव का देवत्व रहेगा तब तक ये वास्तुशास्त्रोक्त आय गण भी स्थिरता से विद्यमान रहेंगे। साध्यक्षेत्रगुणाकारैरायाश्चैव प्रतिष्ठिताः। यावत्तु क्षेत्रभक्तिश्च तावदायः प्रपालयेत् ॥ ४० ॥ आय जानने के सरल उपाय में है, साध्यक्षेत्र के गुणाकार ले आने के बाद आयों से भाग देकर यवादि की सूक्ष्मता तक आयों को शुद्ध करके ग्रहण करना चाहिए। खण्डितं स्फुटितं जीर्णं विशीर्णं स्फुटस्फोटितम्। त्यक्त्वा च वास्तुदेवाद्यमायास्तेषु विवर्जिताः ॥ ४१ ॥ परन्तु, जो वास्तु खण्डित हो गया हो, फूट गया हो, फट गया हो, जीर्ण हो चुका हो, विशीर्ण या विकृत हो गया हो, फूटकर बिखर गया हो और जिसको वास्तु देवता भी छोड़कर चले गए हो- ऐसे भवनों, मन्दिरों या प्रासादों के (पुनर्स्कार) प्रसङ्ग में आय निकालना स्पष्टतः वर्जित है।¹ अपदं तस्य संस्थानं मासान्ते सन्धिशोधितम्। दिनाष्टके प्रलिप्ताङ्गं वर्जयन्ति च नित्यशः ॥ ४२ ॥ ऐसे जीर्ण संस्थानों को (वैसे ही या गिरे जानकर) मासान्त में सन्धियों को शोधित करके जोड़कर ठीक करके आठवें दिन लीपते-पोतते रहें, प्रतिदिन नहीं। भानूदये मण्डलं च पुष्पप्रकरसङ्कुलम्। उदुम्बरोत्तरङ्गाढ्यं जलकुम्भादिपूजनम् ॥ ४३ ॥ ऐसे जीर्णोद्धार वाले भवन में सूर्योदय के समय प्रातःकाल ही मण्डल बनाकर एक समूह में आकर तथा हाथों में पुष्पों के भार लिए हुए मन्दिर द्वार के उदुम्बर से लेकर उत्तरङ्ग तक जल कुम्भादि से पूजन (प्रक्षालादि) करें।
- इस सम्बन्ध में विशेष जानकारी सूत्रधार गोविन्दकृत 'वास्तु उद्धारधोरणी' (सम्पादक : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा, बनारस, 2008 ई.) नामक ग्रन्थ का अवलोकन करना चाहिए।
340 अपराजितपृच्छा गृह्णाति ¹हुताशनं स्वस्तिकैश्च महोत्सवैः । एवं वास्तावायाद्यं च श्रियं चिन्तति नित्यशः ॥ 44 ॥ इसी प्रकार अन्नादि से हवनादि करें जिससे अग्निदेव उस पूजा को ग्रहण करें। स्वस्तिवाचन पूर्वक महोत्सव मनाते हुए उस जीर्ण भवन को पुनः निर्मित करें जिससे सदा कल्याण बना रहे, श्रिय की प्राप्ति नित्य होती रहे। अन्यदप्याह - शिवस्य पुष्पैश्चरणौ सुपूजितौ वराङ्गनासेवनमल्पभोजनम्। अनग्नशायित्वमपर्वमैथुनं चिरप्रनष्टां श्रियमानयन्ति ॥ 45 ॥ शिव के चरणों की पुष्पों से पूजा करें, वराङ्गना का सेवन नहीं करें, अल्पभोजन करें, अनग्न रहकर ही सोएँ, अपर्व में ही स्त्रीसङ्ग करें, पर्वों² में करे तो पहले के प्रनष्ट हुए जीर्ण भवनों में भी जीर्णोद्धार के बाद लक्ष्मी का आगमन हो जाता है, श्री वृद्धि होती है और वे घर पुनः श्री सम्पन्न हो जाते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छाया-मायाधिकारो नाम चतुःषष्टितमं सूत्रम् ॥ 64 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में आयाधिकार नामक चौसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 64 ॥ नक्षत्रराशिश्चन्द्रमैत्र्यनुक्रमो नाम पञ्चषष्टितमं सूत्रम् ॥ 65 ॥ विश्वकर्मोवाच- आयानां यत्तुक्षेत्रं च गुणितव्यं प्रतिष्ठयेत्। तत्क्षेत्रस्य फलं साध्यं गुणितं दैर्घ्यविस्तरैः ॥ 1 ॥ फले चाष्टगुणे तस्मिन् सप्तविंशतिभाजिते । यच्छेषं लभ्यते तत्र नक्षत्रं तद्गृहस्य च ॥ 2 ॥ विश्वकर्मा बोले कि जो भी क्षेत्र हो उनकी गुणित कर करके प्रतिष्ठा कर दें। उस क्षेत्र का फल साधने के लिए उसके दैर्घ्य-लम्बाई और विस्तार-चौड़ाई को
- 'हुताशनं ?' इति प्रकाशि पाठः।
- अनग्नशयन व स्नान का धर्मशास्त्रों में निर्देश है— 'स्वस्त्वयं नैव नग्नेन' (महाभारत अनु. 104, 67); न कदाचिद्रात्रौ नग्नः स्वपेत् (गौतमधर्मसूत्र 1, 9, 60); पर्वतिथियाँ क्रमशः 14, 8, 15, 30 व संक्रान्ति मानी गई हैं— चतुर्दश्यष्टमी चैव ह्यमावस्या च पूर्णिमा। पर्वाण्येतानि राजेन्द्र रविसङ्क्रान्तिरेव च॥ तैलस्त्रीमांससम्भोगी × × (विष्णुपुराण 3. 11. 119-120)
सूत्र-६५ ३४१ गुणा करें। इससे क्षेत्रफल (लम्बाई x चौड़ाई = क्षेत्रफल) निकल जाता है। उस फल को 8 से गुणा करके जो राशि आए उसमें 27 का भाग दें और उस भागफल में जो शेष बचे, उसे गृह की नक्षत्र संख्या समझनी चाहिए।¹ त्रिविध नक्षत्रगणमाह — देवनृराक्षसानां च नक्षत्राणां त्रिधा गणः। यस्य यस्याऽनुगा मैत्री वैरं स्याच्च परस्परम् ॥ ३॥ स्वगणे परमा प्रीतिर्मध्यमा दैवमानुषे। मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देवरक्षसोः ॥ ४ ॥ गणानुसार नक्षत्रों के तीन प्रकार के गण होते हैं— देवगण, मनुष्यगण और राक्षसगण। जो नक्षत्र एक से गण वाले है, उनमें आपस में मैत्री होती है जबकि अन्य में साथ होने पर वैर होता है। स्वगण के साथ तो परम प्रीति होती है, देव और मानुष गण में मध्यम प्रीति होती है और मनुष्य और राक्षस गण में तो मृत्यु ही समझें जबकि देव और राक्षस गण में सदा कलह रहता है। नव देवगणाः प्रोक्ता मानुषा नव कीर्तिताः । नव रक्षोगणाश्चैव नक्षत्राणां त्रिधा गणः ॥ ५ ॥ (कुल 27 नक्षत्रों में) नौ देवगण, नौ राक्षसगण और नौ ही मनुष्यगण कहे गए हैं, इस तरह नक्षत्रों के तीन प्रकार के गण होते हैं। कृत्तिका मघा विशाखा आश्लेषा शततारका। चित्रायुक्ता धनिष्ठा च ज्येष्ठा मूलं च राक्षसाः ॥ ६ ॥ मृगोऽश्विनी रेवती च हस्तः स्वातिः पुनर्वसू । पुष्यानुराधाश्रवणमेते देवगणः स्मृतः ॥ ७॥ तिस्रः पूर्वाश्च भरणी आर्द्रा वै रोहिणी तथा । उत्तरात्रयसंयुक्तः कीर्तितो मानुषो गणः ॥ ८ ॥² इति नक्षत्राधिकारः ।
- उदाहरण — क्षेत्र की लम्बाई 6 गज 1 अङ्गुल; क्षेत्र की चौड़ाई 6 गज 1 अङ्गुल। इनके अङ्गुल बनाए— 145 × 145 = 21025 अङ्गुल फल। इस फल को 8 से गुणा करके उसमें 27 का भाग देने पर, गणितानुसार 21025 × 8 / 27 शेष रहे 17 जो अश्विनी नक्षत्र से गिनने पर 17वाँ अनुराधा नक्षत्र आया जो कि उस गृह का नक्षत्र समझना चाहिए।
- समराङ्गण. के श्लोक तुलनीय है— मृगाश्विरेवतीस्वात्यौ मैत्रं पुष्यपुनर्वसू ॥ हस्तः श्रवण इत्येष देवाख्यो नवको गणः। विशाखा कृत्तिकाश्लेषा नैर्ऋतं वारुणं मघा ॥ चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठेति नवको राक्षसो गणः ॥ आर्द्राभरण्यौ रोहिण्या तिस्रः पूर्वास्तथोत्तराः ॥ इति नक्षत्र नवकं विज्ञेयं मानुषे गणे। (समराङ्गण. 26, 45-48)
342 अपराजितपृच्छा राक्षसगण के अन्तर्गत— कृत्तिका, मघा, विशाखा, आश्लेषा, शतभिषा, चित्रा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र परिगणित है। देवगणान्तर्गत— मृगशिरा, अश्विनी, रेवती, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा व श्रवण ये नौ नक्षत्र होते हैं। इसी प्रकार मनुष्यगण में— तीनों पूर्वा (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद), भरणी आर्द्रा, रोहिणी और तीनों उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र आते हैं। अथ नक्षत्रान्राश्यानयनमाह — अथ राशीः प्रवक्ष्यामि लब्ध्वा क्षेत्रफलेषु च। तदनुक्रमयुक्तींश्च कथये तव साम्प्रतम्॥ ९॥ अब प्राप्त क्षेत्रफल के आधार पर राशि जानने की विधि कहता हूँ। उस विधि को पूरे अनुक्रम के साथ बता रहा हूँ। गृहक्षेत्रेषु यदृक्षं पञ्चत्रिंशशताहतम्। षष्टिभिश्च हरेद्भागं भुक्तघट्यस्तु शेषतः॥ १०॥ ऋक्षभुक्तिक्रमयुक्ता स्वस्वराशिकसंज्ञिताः ?। स्युर्मेषाद्या राशयश्च अश्विन्यादिक्रमेषु च॥ ११॥¹ गृहक्षेत्र का जो नक्षत्र आए, उसकी संख्या को 135 से गुणा करके जो फल आए, उसको 60 से भाजित करे और जो शेष बचे वह क्रमयुक्त नक्षत्रभुक्ति होगी, उनकी अपनी राशि बनेगी जो मेषादि राशि होगी जबकि अश्विन्यादि नक्षत्र क्रम होगा।
- पाठ शङ्कास्पद है, स्पष्ट न होने से इसे अन्य ग्रन्थों में देखना चाहिए। नक्षत्र से राशि जानने की विधि 'शिल्परत्नाकर' में इस प्रकार कही है— गृहक्षेत्रेषु यदृक्षं षष्टिघ्नं खशरोनितम्। पञ्चत्रिंशतशतैर्भक्ते शेषं वै मेषकादयः ॥ (शिल्प. 1,125) उदाहरण— माना कि क्षेत्र का नक्षत्राङ्क 5 (मृगशिरा है), उसको 60 से गुणा करने पर 60×5 = 300 आया। इस 300 से 50 घटाने पर 300-50 = 250 आया शेष। इस शेष को 135 से भाग देने पर 250/135 = 1 और शेष बचे 115 इस राशि को अङ्क 1 माने। उसे लब्धाङ्क 1 में जोड़े 1+1 = 2 तो अङ्क 2 आया। यह 2 अङ्क या वृष राशि को बताता है। अस्तु, गृह की राशि वृष है। यही बात ज्ञानप्रकाशदीपार्णव में इस प्रकार दी है— गृह क्षेत्रस्य यदृक्षं षष्टिभिर्गुणितं तथा। पञ्चत्रिंशच्छतं भक्तं शेष मुक्तिरजादयः ॥ (दीपार्णव 1, 54) उदाहरण—गृह के नक्षत्र (5) को 60 से गुणा करें (5 × 60 = 300) फिर उसे 135 से भाग दें जो लब्धि आए उसे गत राशि और शेष रहे उसे चालू राशि जाननी चाहिए, 300 / 135 = 2, 30 / 135 अर्थात् लब्धि 2 से वृष राशि पूरी व शेष 30 से चालू राशि आई। मिथुन (शेष को 1 मानकर लब्ध 2 में जोड़ें तो 2+1 = 3) मिथुन राशि। लगता है दीपार्णवकार ने 300 से 50 नहीं घटाया, इसी से यह अन्तर आया है। यथा 300-50 = 250 / 135 गत राशि लब्धि 1 आती है शेष वृष हुई।
सूत्र-६५ ३४३ वास्तुचक्रादिचक्रेषु ग्रहवेधविशोधनैः। अष्टाविंशतिरेवं च साभिजित् कृत्तिकादयः ॥ 12 ॥ वास्तु चक्रादि चक्रों को और ग्रह वेध के शोधन के लिए अभिजित् नक्षत्र के साथ कृत्तिकादि अट्ठाईस नक्षत्र इस प्रकार लाने चाहिए। वर्णानुसार प्रशस्तराशयः — चातुर्वर्ण्यप्रशस्तांश्च राशीनथ वदाम्यहम्। तत्र त्रयस्त्रयः प्रोक्ता विप्रशूद्रान्तमार्गतः ॥ 13 ॥ वृश्चिकः कर्कटो मीनो ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः। धनुर्मेषस्तथा सिंहो राजन्याश्च शुभाः स्मृताः ॥ 14 ॥ वृषः कन्या च मकर एते वैश्या उदाहृताः। मिथुनं च तुला कुम्भस्त्रयः शूद्राः प्रकीर्तिताः ॥ 15 ॥ अब मैं चारों वर्णों के लिए जो-जो प्रशस्त राशियाँ हैं, उनके बारे में कहता हूँ। ये तीन-तीन कही गई है जो कि विप्र से शूद्र वर्ण तक है। ब्राह्मण की राशियाँ वृश्चिक, कर्क और मीन को कही है। क्षत्रिय या राजन्य की धनु, मेष तथा सिंह राशि कही गई है। वैश्य के लिए वृष, मकर और कन्या राशि शुभ है और शूद्र वर्ण के लिए मिथुन, तुला और कुम्भ राशियाँ शुभ कही गई हैं। भवेद् द्वादशभिर्विप्रः क्षत्रियो नवभिस्तथा। षड्राशिभ्यो भवेद् वैश्यस्त्रिभिः शूद्रः प्रशस्यते ॥ 16 ॥ इनमें 12 राशियाँ ब्राह्मण के लिए, 9 राशियाँ क्षत्रिय के लिए, 6 राशियाँ वैश्य और 3 राशियाँ शूद्र के लिए प्रशस्त जाननी चाहिए। चातुर्वर्णान्तरभेद एवमुक्तोऽपराजित। प्रीत्यर्थं च पुनर्भेदं कथये तव साम्प्रतम् ॥ 17 ॥ हे अपराजित ! तुम्हें यह चातुर्वर्णान्तर भेद इस प्रकार से कहा गया। अब मैं पुनः तुम्हारे स्नेह के कारण इनके भेद पूरी तरह कहता हूँ। अथ षडष्टकादीनां — षडष्टके ध्रुवं मृत्युः प्रीतिः स्यात् समसप्तमे। अनिष्टं पञ्चनवमे पुष्टिर्दशचतुर्थके ॥ 18 ॥ इन राशियों में षडाष्टक (छठे-आठवें) होने पर निश्चय ही मरणान्तक पीड़ा होती है परन्तु एक दूसरे के सम-सप्तम राशि होने पर प्रीति भी गाढ़ होती है।
344 अपराजितपृच्छा राशिक नवपञ्चक होना अनिष्ट का सूचक है और चतुर्थ-दशम होना पुष्टिकारक होता है। तृतीयेकादशे मैत्री ¹द्वितीयद्वादशे रिपुः । राशयः षड्विधा एवमन्योन्यं पतिवेश्मनोः ॥ १९ ॥ राशि का तृतीय-एकादश होना मैत्रीकारक है परन्तु द्वितीय-द्वादश होना शत्रुता का कारक है। इस तरह छह प्रकार से राशियों व गृहस्वामियों का अन्योन्य सम्बन्ध बताया गया है। चन्द्रस्थितिफलमाह — गृहाग्रे च यदा चन्द्रो क्षयं वेश्म करोति हि। राष्ट्रचौराग्निभयं घोरं चन्द्रे वै पृष्ठमागते ॥ २० ॥ धनधान्यक्षमारोग्यं कुरुते दक्षिणस्थिते । श्रीस्त्रीपुत्रा उत्तमाश्च चन्द्रे वै उत्तरे स्थिते ॥ २१ ॥ अब चन्द्र की स्थिति अनुसार फल देखते हैं। यदि गृह के आगे चन्द्र रहता है तो गृह की क्षति करता है और चन्द्र पीछे रहता है तो रात्रि में चोरादि और अग्निभय घोर होता है। चन्द्रमा यदि दायें हो तो धन-धान्य भूमि, आरोग्य प्रदाता होता है और यदि चन्द्रमा उत्तर दिशा में स्थित हो तो स्त्री-पुत्रादि के लिए सर्वोत्तम होता है। इत्यमनन्तर सप्तशलाक्यचक्रमाह — सप्तोर्ध्वे स्थापयेद्रेखाः पुनर्भिन्नाश्च सप्तभिः । रेखाः प्रोक्तानि साभिजिन्नक्षत्राण्यष्टविंशतिः ॥ २२ ॥ कृत्तिकादीनीशान्यां शेषर्क्षाणि प्रदक्षिणे । हक्षेत्रोक्तमृक्षं च तत्र चन्द्रमुदीरयेत् ॥ २३ ॥ (सप्तशलाका चक्र के लिए) सात ऊर्ध्व रेखाएँ बनाएँ और सात ही इनको काटती हुई आड़ी रेखाएँ बनाएँ। इस तरह अभिजित् सहित 28 नक्षत्रों की ये रेखाएँ बनती हैं। कृत्तिकादि को ईशानकोण से आरम्भ करते हुए प्रदक्षिण क्रम में एक- एक रेखाग्र पर नक्षत्रों के नाम लिखते जाएँ। इस क्षेत्र के इन नक्षत्रों पर चन्द्रमा की स्थिति देखनी चाहिए।²
- मुद्रितपुस्तके 'तृतीयद्वादशे' इति पाठः। ज्योतिष की मान्यताओं में दो-बारह या बीया-बारहवाँ होना वैरभाव का सूचक माना जाता है।
- यह सप्तशलाका चक्र नक्षत्रों का वेध जानने हेतु बनाया गया है। आमने-सामने के नक्षत्रों का सप्तशलाका वेध होता है। इनमें भी पाप ग्रह से वेध हो तो सम्पूर्ण नक्षत्र को त्यागना चाहिए और शुभ
सूत्र-६५ 345 ग्रहराश्यादि मैत्रीविचारः — वेश्मपत्योर्भवेच्चैव गृहमैत्री परस्परम्। द्वादशङ्गोक्ता राशयश्च नवैव च ग्रहास्तथा ॥ २४ ॥ गृह और गृहस्वामी की परस्पर ग्रह मैत्री हो, इन बारह राशियों और नवग्रहों की भी ग्रह मैत्री होनी चाहिए। तथैकराशिकाः केचित् केचिच्चैव द्विराशिकाः। तदनुक्रमकं वक्ष्ये यदुक्तं परमेश्वरैः ॥ २५ ॥ कोई ग्रह एक राशि के स्वामी होते है और कोई ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी होते हैं, मैं यहाँ उनका अनुक्रम कहता हूँ, जैसा परमेश्वर ने पहले बताया था। भौमस्य वृश्चिको मेषो भार्गवस्य तुला वृषौ। बुधस्य कन्यामिथुने सोमस्यैवं तु कर्कटः ॥ २६ ॥ सिंहः सूर्यस्य क्षेत्रं स्याद् धनुर्मीनौ तथा गुरोः। शनेश्च कुम्भमकरौ गृहक्षेत्राधिपा इति ॥ २७ ॥ मङ्गल की वृश्चिक और मेष राशि, शुक्र की तुला और वृष राशि, बुध की कन्या व मिथुन राशि, चन्द्रमा की कर्क राशि, सूर्य की सिंह राशि, गुरु की धनु व मीन राशि, शनि की कुम्भ और मकर राशि है— इसे ही गृह व गृहस्वामी के प्रसङ्ग में भी समझें। न पीडयन्त्यात्मक्षेत्रं स्नेहिनः क्षेत्रपालकाः। रिपुगृहं पीडयन्ति भस्मीकुर्वन्ति विग्रहे ॥ २८ ॥ ये सभी क्षेत्रपाल राशिपति अपने स्वक्षेत्र को कभी हानि नहीं पहुँचाते और अपने स्नेही मित्रों के क्षेत्र में होने पर भी हानि नहीं पहुँचाते परन्तु शत्रु के क्षेत्र में आने पर ये ग्रह पीड़ाकारी हो जाते हैं और विग्रह कराते हैं। स्यात्सूर्यमन्दयोर्वैरं तथा च कुजमन्दयोः। गुरुशुक्रयोः स्याद्वैरं चन्द्रेण च बुधस्य तु ॥ २९ ॥ ग्रह से वेध हो तो केवल चरण वेध ही त्याज्य होता है। ऐसा नारदीय सूत्र का वचन है- 'पदभेवशुभैर्विद्ध अशुभैर्नैव कृत्स्नजः ।' मुहूर्त्ततत्त्वं में इसकी विधि आई है—सात रेखाएँ तिर्यक् और सात ही रेखाएँ ऊर्ध्व रूप से खींचने पर सप्तशालाका चक्र बनता है। इसमें रुद्र अथवा ईशान की रेखा पर कृत्तिका नक्षत्र लिखें और बाद में शेष नक्षत्रों का क्रमशः न्यास करें। यह न्यास अन्तिम सिरे तक किया जाएगा और प्रत्येक रेखा के आमने-सामने नक्षत्र न्यास होगा। इन नक्षत्रों पर जो कोई ग्रह होगा तो उसका सामने वाले नक्षत्र से वेध जानना चाहिए। यह वेध विवाहादि माङ्गलिक कार्यों के अतिरिक्त अन्यत्र स्वीकार्य है। (मुहूर्त्त. 1, 5)