भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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336 अपराजितपृच्छा अग्निकर्मसु सर्वेषु होमशालामहानसे ॥ १९ ॥ धूमोऽग्निकुण्डसंस्थाने होमकर्मगृहेऽपि वा । सभी प्रकार के अग्नि सम्बन्धी कार्यों में, यज्ञ-होमशाला, रसोईघर, अग्निकुण्ड संस्थान में, होम करने के गृह में धूम आय देनी चाहिए। आयुधानां समस्तानां नृपाणां भवनेषु च ॥ २० ॥ नृपासने सिंहद्वारे सिंहं तत्र निवेशयेत् । समस्त आयुधों के निर्माण, राजाओं के महलों में, राजा के सिंहासन तथा राजप्रासाद के सिंहद्वार पर सिंह आय देनी चाहिए। श्वानश्च म्लेच्छजातौ च गेहे श्वानोपजीविनाम् ॥ २१ ॥ तथा चाऽशुद्धसंस्थाने प्रशस्तः श्वानको मतः । म्लेच्छ जाति के लोगों के घरों में, श्वान पालने वाले लोगों के घरों में तथा सभी अशुद्ध संस्थानों में श्वान आय ही प्रशस्त कही गई है। वणिकर्मसु सर्वेषु भोज्यपात्रेषु मण्डपे ॥ २२ ॥ वृषस्तुरङ्गशालायां गोशालायां च गोकुले । सभी वणिक कर्मों (व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, शोरूम, दुकानादि के कलम, फर्नीचर) में, खाने-पीने के पात्रों में, मण्डपों में, घुड़साल में, गोशाला में, गोकुलों में वृष आय प्रशस्त कही गई है। ततविततादिस्वरे वादित्रे विविधे तथा ॥ २३ ॥ कुलालरजकादीनां खरो गर्दभजीविनाम् । तत् वाद्य में, वितत् वाद्य में, अन्य तरह-तरह के वाद्यों (सुषिर, घनादि¹) में, कुलाल-कुम्भकारों के यहाँ, रजकों (धोबी) और गधों द्वारा जीविका चलाने वालों (ओड्रादि) के यहाँ खर आय प्रशस्त कही गई है। गजश्च गजशालायां यानझम्पानयो रथे ॥ २४ ॥ शय्यायां शिविकायां च गजमुद्रा चतुष्कतः । अन्तःपुरे गृहे प्रोक्तः पिण्डांवास्यादिकोद्भवः ? ॥ २५ ॥ अन्योपस्करकादौ च मदनागारके गजः । इसी प्रकार गजशाला में, यान, झम्पान में, रथों में, शय्या में, शिबिका, तम्बू-

  1. वाद्यों का वर्णन अपराजित. में 237वें सूत्र में आया है। नाट्यशास्त्र, सङ्गीतरत्नाकर आदि ग्रन्थों में भी यह वर्णन हुआ है। यथा— वाद्यतन्त्रीततं वाद्यं सुषिरं मतम् ॥ चर्मावनद्धवदनमवनद्धं तु वाद्यते घनो मूर्तिः साभिघाताद् वाद्यते यत्र तद्धनम् ॥ (सङ्गीतरत्नाकर 6, 5-6)