अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 382, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६४ 337 डेरों (शिविर) में, गजमुद्रा की चौकी पर, अन्तःपुर में, पिण्ड आवास आदि गृहों में, अन्य उपकरणों में भी, मदनागार अर्थात् रतिगृहों में, शीशमहल में गज आय प्रशस्त होती है। तथाऽरहट्टयन्त्रेषु जिनशालादिकेषु च ॥ २६ ॥ ध्वाङ्क्षः कल्याणकृच्चैव शिल्पकर्मोपजीविनाम् । अरहट्ट यन्त्रों अर्थात् जलोत्थान के लिए प्रयोक्तव्य रहटों में और जिनालयों में ध्वांक्ष आय देना शिल्प कर्मोपजीवियों के लिए कल्याणकारक है। स्वके स्वके वै स्थाने च सर्वे कल्याणकारकाः ॥ २७ ॥ मित्रस्नेहानुगाश्चैव ते सर्वे हितकामदाः । इस प्रकार जिस-जिस स्थान के लिए जो-जो आय कही गई है, उन आयों को अपने-अपने स्थान पर देना कल्याणकारक है। जो मित्रों के स्नेह के अनुसार चलती है, वे भी सभी हितकारी व कामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है। परस्परदेय आयानि — वृषस्थाने गजं दद्यात् सिंहं वृषभहस्तिनोः ॥ २८ ॥ वृष के स्थान पर गज आय दी जा सकती है और सिंह के स्थान पर वृष आय और गज आय दी जा सकती है। ध्वजः सर्वेषुदातव्यो वृषो नाऽन्यत्रदीयते । गजाभिदृष्टिः सिंहः स्याद् वारुणाभिमुखो ध्वजः ॥ २९ ॥ वृषभः प्राच्याभिमुखो गजो वाम्यमुखस्तथा । सन्मुखा याम्योत्तराश्च अशस्ताः पृष्ठातोमुखाः ॥ ३० ॥ स्वके स्वके वै स्थाने च प्रशस्ताश्च त्रिदिक्षु च । ध्वज आय सभी स्थानों पर दी जा सकती है, परन्तु वृष आय को अन्यत्र कहीं भी नहीं देना चाहिए। गज के सम्मुख सिंह आय हो, वारुणाभिमुख ध्वज आय हो, वृषभ आय पूर्वाभिमुख हो, गज आय दक्षिणमुखी हो और ये सभी सम्मुख, दक्षिण- उत्तर की ओर की तथा पृष्ठतोमुखी आए तो ठीक नहीं, अशस्त कही गई है। अपने- अपने स्थान पर तो ये तीनों दिशाओं से प्रशस्त ही होती है। अथाऽऽयस्वरूपाणि — ध्वजः पुरुषरूपश्च सिंहः सिंहस्वरूपकः ॥ ३१ ॥ वृषो वृषभरूपाढ्यो गजो हस्तिस्वरूपकः । धूमो मार्जाररूपश्च श्वानः श्वानाधिरूपकः ॥ ३२ ॥