भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

338 अपराजितपृच्छा खरो गर्दभरूपाढ्यो ध्वाङ्क्षः काकस्वरूपकः। (अब आयों के स्वरूप के विषय में कहा जा रहा है) ध्वज आय का पुरुष रूप है। सिंह आय का सिंहरूप, वृष आय वृषभरूप है और गज आय हाथी का रूप है। धूम आय मार्जार या बिलाव रूप और श्वान आय श्वान रूप है। खर आय गर्दभ रूप है और ध्वांक्ष आय काकस्वरूपी है। सर्वे च वृषभारूढाः ¹'पुरुषाकारमुदराः॥ ३३॥ तद्रूपकाश्च हस्ताभ्यां पादाभ्यां विहगानुगाः। ग्रीवया सिंहरूपाश्च प्रबलाश्च महोत्कटाः॥ ३४॥ इन सभी आयों का आकार पुरुष जैसा, पेट भी वैसा ही होता है, वे वृषभारूढ़ हैं। उनके हाथ भी पुरुष के हाथों जैसे है परन्तु उनके पाँवों का आकार पक्षियों के पंजों जैसा होता है। उनकी ग्रीवा बड़ी प्रबल, महोत्कट और सिंह की गर्दन के आकार की होती है। महागणेश्वराः प्रोक्ता अष्टदिक्क्षेत्रपालकाः। वास्तुकर्मसु सर्वेषु आया दिक्पतयोऽष्ट हि॥ ३५॥ इन आयों को ही महागणेश्वर और अष्टदिक्-क्षेत्रपाल कहा गया है अस्तु, सभी वास्तुकर्मों में ये आय आठों दिक्-क्षेत्रपाल ही है। पूजिताः पूजयन्त्येव निघ्नन्ति चापदस्थिताः।² साध्यक्षेत्र च त्रिपुटं प्रभिन्नं च नवांशकः॥ ३६॥ इनकी पूजा करते रहने से, ये अपने पद पर स्थित रहते हुए निर्विघ्न कार्य करवाते हैं। इनके साध्य क्षेत्र त्रिपुट वाले है और इनके भाग नवांशक होते हैं। अष्टौ तथाऽऽयस्थानानि मध्ये स्यात्कुलदेवता। गृहस्याऽभिमुखाः शस्ताः मध्यमाश्च पराङ्मुखाः॥ ३७॥ इन आठों आय स्थानों के मध्य में कुल देवता का वास है। अस्तु, सभी आय गृहों के सम्मुख शुभ होती है और विपरीत मुख वाली मध्यम होती है। नगरभिमुखाः शस्ताः पुरबाह्ये तु देवताः। देवानां प्रतिमा आया दिशापाला इति स्मृताः॥ ३८॥

  1. 'पुरुषाकारमुद्गला?' इति प्रकाशित पाठः। तुलनीय— मुखैः स्वनामसदृशा नराकारकरोदराः। हस्ताभ्यां तद्रूपाढ्याः पादाभ्यां विहगाकृतिः॥ सर्वेषां सिंहवद्ग्रीवा प्रबलाश्च महोत्कटाः। (ज्ञानप्रकाशदीपार्णव 1, 35-36)
  2. तुलनीय— महागणेश्वराः प्रोक्ताः क्षेत्रपाश्च दिशाष्टसु॥ वास्तुकर्मसु सर्वेषु आयादिक्पतयोऽष्ट हि। पूजिताः पूजयन्त्येव निघ्नन्ति च पदे स्थिताः॥ (दीपार्णव 1, 36-37)