अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६४ 339 पुर के बाहर के जितने भी देव मन्दिरादि हों, वे नगराभिमुख ही शुभ होते हैं। देव प्रतिमा की आय ही दिशापाल कही गई है, ऐसा जानें। वसवः प्रतिदेवाश्च शिवयोगसमुद्भवाः। यावत्तु शिवदेवत्वं यावच्चन्द्रार्कमेदिनी। तावच्च वास्तुशास्त्रोक्ता आयाश्च समुदाहृताः॥ ३९॥ प्रत्येक देवता का आवास स्थान मन्दिरादि शिव के योग से ही समुद्भूत है। अस्तु, इस जगत में जब तक सूर्य और चन्द्र रहेंगे और जब तक शिव का देवत्व रहेगा तब तक ये वास्तुशास्त्रोक्त आय गण भी स्थिरता से विद्यमान रहेंगे। साध्यक्षेत्रगुणाकारैरायाश्चैव प्रतिष्ठिताः। यावत्तु क्षेत्रभक्तिश्च तावदायः प्रपालयेत् ॥ ४० ॥ आय जानने के सरल उपाय में है, साध्यक्षेत्र के गुणाकार ले आने के बाद आयों से भाग देकर यवादि की सूक्ष्मता तक आयों को शुद्ध करके ग्रहण करना चाहिए। खण्डितं स्फुटितं जीर्णं विशीर्णं स्फुटस्फोटितम्। त्यक्त्वा च वास्तुदेवाद्यमायास्तेषु विवर्जिताः ॥ ४१ ॥ परन्तु, जो वास्तु खण्डित हो गया हो, फूट गया हो, फट गया हो, जीर्ण हो चुका हो, विशीर्ण या विकृत हो गया हो, फूटकर बिखर गया हो और जिसको वास्तु देवता भी छोड़कर चले गए हो- ऐसे भवनों, मन्दिरों या प्रासादों के (पुनर्स्कार) प्रसङ्ग में आय निकालना स्पष्टतः वर्जित है।¹ अपदं तस्य संस्थानं मासान्ते सन्धिशोधितम्। दिनाष्टके प्रलिप्ताङ्गं वर्जयन्ति च नित्यशः ॥ ४२ ॥ ऐसे जीर्ण संस्थानों को (वैसे ही या गिरे जानकर) मासान्त में सन्धियों को शोधित करके जोड़कर ठीक करके आठवें दिन लीपते-पोतते रहें, प्रतिदिन नहीं। भानूदये मण्डलं च पुष्पप्रकरसङ्कुलम्। उदुम्बरोत्तरङ्गाढ्यं जलकुम्भादिपूजनम् ॥ ४३ ॥ ऐसे जीर्णोद्धार वाले भवन में सूर्योदय के समय प्रातःकाल ही मण्डल बनाकर एक समूह में आकर तथा हाथों में पुष्पों के भार लिए हुए मन्दिर द्वार के उदुम्बर से लेकर उत्तरङ्ग तक जल कुम्भादि से पूजन (प्रक्षालादि) करें।
- इस सम्बन्ध में विशेष जानकारी सूत्रधार गोविन्दकृत 'वास्तु उद्धारधोरणी' (सम्पादक : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', चौखम्बा, बनारस, 2008 ई.) नामक ग्रन्थ का अवलोकन करना चाहिए।