अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें340 अपराजितपृच्छा गृह्णाति ¹हुताशनं स्वस्तिकैश्च महोत्सवैः । एवं वास्तावायाद्यं च श्रियं चिन्तति नित्यशः ॥ 44 ॥ इसी प्रकार अन्नादि से हवनादि करें जिससे अग्निदेव उस पूजा को ग्रहण करें। स्वस्तिवाचन पूर्वक महोत्सव मनाते हुए उस जीर्ण भवन को पुनः निर्मित करें जिससे सदा कल्याण बना रहे, श्रिय की प्राप्ति नित्य होती रहे। अन्यदप्याह - शिवस्य पुष्पैश्चरणौ सुपूजितौ वराङ्गनासेवनमल्पभोजनम्। अनग्नशायित्वमपर्वमैथुनं चिरप्रनष्टां श्रियमानयन्ति ॥ 45 ॥ शिव के चरणों की पुष्पों से पूजा करें, वराङ्गना का सेवन नहीं करें, अल्पभोजन करें, अनग्न रहकर ही सोएँ, अपर्व में ही स्त्रीसङ्ग करें, पर्वों² में करे तो पहले के प्रनष्ट हुए जीर्ण भवनों में भी जीर्णोद्धार के बाद लक्ष्मी का आगमन हो जाता है, श्री वृद्धि होती है और वे घर पुनः श्री सम्पन्न हो जाते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छाया-मायाधिकारो नाम चतुःषष्टितमं सूत्रम् ॥ 64 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में आयाधिकार नामक चौसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 64 ॥ नक्षत्रराशिश्चन्द्रमैत्र्यनुक्रमो नाम पञ्चषष्टितमं सूत्रम् ॥ 65 ॥ विश्वकर्मोवाच- आयानां यत्तुक्षेत्रं च गुणितव्यं प्रतिष्ठयेत्। तत्क्षेत्रस्य फलं साध्यं गुणितं दैर्घ्यविस्तरैः ॥ 1 ॥ फले चाष्टगुणे तस्मिन् सप्तविंशतिभाजिते । यच्छेषं लभ्यते तत्र नक्षत्रं तद्गृहस्य च ॥ 2 ॥ विश्वकर्मा बोले कि जो भी क्षेत्र हो उनकी गुणित कर करके प्रतिष्ठा कर दें। उस क्षेत्र का फल साधने के लिए उसके दैर्घ्य-लम्बाई और विस्तार-चौड़ाई को
- 'हुताशनं ?' इति प्रकाशि पाठः।
- अनग्नशयन व स्नान का धर्मशास्त्रों में निर्देश है— 'स्वस्त्वयं नैव नग्नेन' (महाभारत अनु. 104, 67); न कदाचिद्रात्रौ नग्नः स्वपेत् (गौतमधर्मसूत्र 1, 9, 60); पर्वतिथियाँ क्रमशः 14, 8, 15, 30 व संक्रान्ति मानी गई हैं— चतुर्दश्यष्टमी चैव ह्यमावस्या च पूर्णिमा। पर्वाण्येतानि राजेन्द्र रविसङ्क्रान्तिरेव च॥ तैलस्त्रीमांससम्भोगी × × (विष्णुपुराण 3. 11. 119-120)