अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६५ ३४१ गुणा करें। इससे क्षेत्रफल (लम्बाई x चौड़ाई = क्षेत्रफल) निकल जाता है। उस फल को 8 से गुणा करके जो राशि आए उसमें 27 का भाग दें और उस भागफल में जो शेष बचे, उसे गृह की नक्षत्र संख्या समझनी चाहिए।¹ त्रिविध नक्षत्रगणमाह — देवनृराक्षसानां च नक्षत्राणां त्रिधा गणः। यस्य यस्याऽनुगा मैत्री वैरं स्याच्च परस्परम् ॥ ३॥ स्वगणे परमा प्रीतिर्मध्यमा दैवमानुषे। मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देवरक्षसोः ॥ ४ ॥ गणानुसार नक्षत्रों के तीन प्रकार के गण होते हैं— देवगण, मनुष्यगण और राक्षसगण। जो नक्षत्र एक से गण वाले है, उनमें आपस में मैत्री होती है जबकि अन्य में साथ होने पर वैर होता है। स्वगण के साथ तो परम प्रीति होती है, देव और मानुष गण में मध्यम प्रीति होती है और मनुष्य और राक्षस गण में तो मृत्यु ही समझें जबकि देव और राक्षस गण में सदा कलह रहता है। नव देवगणाः प्रोक्ता मानुषा नव कीर्तिताः । नव रक्षोगणाश्चैव नक्षत्राणां त्रिधा गणः ॥ ५ ॥ (कुल 27 नक्षत्रों में) नौ देवगण, नौ राक्षसगण और नौ ही मनुष्यगण कहे गए हैं, इस तरह नक्षत्रों के तीन प्रकार के गण होते हैं। कृत्तिका मघा विशाखा आश्लेषा शततारका। चित्रायुक्ता धनिष्ठा च ज्येष्ठा मूलं च राक्षसाः ॥ ६ ॥ मृगोऽश्विनी रेवती च हस्तः स्वातिः पुनर्वसू । पुष्यानुराधाश्रवणमेते देवगणः स्मृतः ॥ ७॥ तिस्रः पूर्वाश्च भरणी आर्द्रा वै रोहिणी तथा । उत्तरात्रयसंयुक्तः कीर्तितो मानुषो गणः ॥ ८ ॥² इति नक्षत्राधिकारः ।
- उदाहरण — क्षेत्र की लम्बाई 6 गज 1 अङ्गुल; क्षेत्र की चौड़ाई 6 गज 1 अङ्गुल। इनके अङ्गुल बनाए— 145 × 145 = 21025 अङ्गुल फल। इस फल को 8 से गुणा करके उसमें 27 का भाग देने पर, गणितानुसार 21025 × 8 / 27 शेष रहे 17 जो अश्विनी नक्षत्र से गिनने पर 17वाँ अनुराधा नक्षत्र आया जो कि उस गृह का नक्षत्र समझना चाहिए।
- समराङ्गण. के श्लोक तुलनीय है— मृगाश्विरेवतीस्वात्यौ मैत्रं पुष्यपुनर्वसू ॥ हस्तः श्रवण इत्येष देवाख्यो नवको गणः। विशाखा कृत्तिकाश्लेषा नैर्ऋतं वारुणं मघा ॥ चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठेति नवको राक्षसो गणः ॥ आर्द्राभरण्यौ रोहिण्या तिस्रः पूर्वास्तथोत्तराः ॥ इति नक्षत्र नवकं विज्ञेयं मानुषे गणे। (समराङ्गण. 26, 45-48)