अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६४ 335 विप्रादिजातिपरत्वेन ग्राह्यायाः - कल्याणं कुरुते सिंहो नृपाणां च विशेषतः। ध्वजः प्रशस्यते विप्रे वृषो वैश्ये उदाहृतः ॥ 13 ॥ सिंह आय विशेषकर राजा लोगों का कल्याण करती है जबकि ध्वजाय विप्रों के लिए लाभकारी शुभ है और वृष आय वैश्यों के लिए उचित कही है। उत्तरोत्तरमाख्याताश्चतुर्वर्णफलप्रदाः । ध्वजे चैवार्थलाभः स्याद् धूमे सन्ताप एव च ॥ 14 ॥ इस तरह ये आय चारों वर्णों के लिए उत्तरोत्तर कही गई है, जो उनके लिए शुभ फलदात्री है। (अब इन के लाभ हानि भी देखें) ध्वज आय आने पर धन की प्राप्ति होती है, अर्थ लाभ होता है परन्तु धूमाय आने पर सन्ताप का कारण बनता है। सिंहे च विपुला भोगाः कलिः श्वाने सदा भवेत्। धनधान्यं वृषे चैव स्त्रीदूषणं च रासभे ॥ 15 ॥ गजे भद्राणि पश्यन्ति ध्वाङ्क्षे च मरणं ध्रुवम्। इसी तरह सिंह आय आने पर विपुल भोग उपलब्ध होते हैं परन्तु श्वान आय आने पर सदा कलह होता रहता है। वृष आय आने पर धन-धान्य की प्राप्ति होती है परन्तु खर आय आने पर स्त्रीवर्ग में दूषण फैलने की आशङ्का होती है। गज आय से भला, सुन्दर होता है परन्तु ध्वांक्ष आय से निश्चित मरणान्तद कष्ट होता है। अथ प्रशस्तऽऽयोच्यते - प्रासादप्रतिमालिङ्गे जगतीपीठमण्डपे ॥ 16 ॥ वेदीकुण्डशुचिष्वेवं पताकाछत्रचामरे। वापीकूपतडागानां कुण्डानां च जलाशये ॥ 17 ॥ ध्वजोच्छ्रयस्य संस्थाने ध्वजं तत्र निवेशयेत्। (अब प्रशस्त आय कहाँ, कैसी हो उसके बारे में कहता हूँ) प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ, मण्डप, वेदी-कुण्ड, शुचि, पताका, छत्र, चामर, वापी, कूप, तड़ाग, कुण्ड, जलाशय और ध्वजा की ऊँचाई के स्थापन पर हमेशा ध्वज आय का प्रयोग करना चाहिए। आसने देवपीठेषु वस्त्रालङ्कारयोजने ॥ 18 ॥ केयूरमुकुटाद्ये च वेशयेच्च ध्वजं शुभम्। इसी तरह आसन, देवपीठ, वस्त्रालङ्कार के नियोजन में, केयूर, मुकुट आदि वेशों में भी ध्वज आय शुभ होती है।