भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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334 अपराजितपृच्छा इसी तरह राजाओं के महल, पुर आदि तथा कूपादिक और प्रासाद, देवमन्दिरों तथा देवों के लिए केवल शास्त्रविहित हाथ (गज) ही मान्य है। अथायनयनमाह — दैर्घ्यं हन्यात्पृथुत्वेन हरेद्भागं ततोऽष्टभिः । शेषमायं चैव विद्याच्छास्त्रदृष्टं ध्वजादिकम् ॥ 8 ॥ लम्बाई से चौड़ाई के माप को गुणा करके प्राप्त गुणनफल में 8 का भाग दें, जो शेष आएगा, उसे ध्वजादिक आय को शास्त्रीय दृष्टि से समझना चाहिए। विधि — लम्बाई × चौड़ाई / 8 = क्रमशः 1 से 8 तक ध्वजादि आय। आयनामानि — ध्वजो धूम्रश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरौ गजः । ध्वाङ्क्षश्चेति समुद्दिष्टाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः ॥ 9 ॥ इन आयों के नाम हैं- 1. ध्वज, 2. धूम, 3. सिंह, 4. श्वान, 5. वृष, 6. खर, 7. गज और 8. ध्वांक्ष। इनको सदा प्राच्यादि, प्रदक्षिणतः क्रम में लेना चाहिए। अन्योऽन्याभिमुख्रास्ते च क्रमच्छन्दानुसारतः । पूर्वं च ये समुद्दिष्टाः आयुर्वृद्धिविधायकाः ॥ 10 ॥ ये परस्पर आमने-सामने हो सकते हैं, छन्द-क्रमानुसार हो सकते हैं, ऐसा पूर्व में (मनीषियों द्वारा) कहा गया है। गृह में ये आयु की वृद्धि के विधायक अर्थात् लाभदायक व अनुकूल होते हैं। आय प्रयोजनमाह — ध्वजः सिंहो वृषगजौ शस्यन्ते सुरवेश्मनि । अधमानां खरध्वजाङ्क्षधूम्रश्वानः सुखावहाः ॥ 11 ॥ देववेश्म अर्थात् मन्दिरादि में ध्वज, सिंह, वृष और गजाय प्रशस्त मानी गई है। इनको ही उचित मान कर ग्रहण किया गया है, परन्तु इन से कम के लिए खर, ध्वांक्ष, धूम और श्वानाय सुखप्रद होती है। युगादिपरत्वेन ग्राह्यायाः — ध्वजः प्रायः कृतयुगे त्रेतायां सिंह एव च । द्वापरे वृषबाहुल्यं गज एव कलौ युगे ॥ 12 ॥ ध्वज आय प्रायः सतयुग में तथा सिंह आय त्रेतायुग में और वृष बाहुल्य से वृष आय द्वापर युग में तथा गज आय कलियुग में मान्य कही गई है।