अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६४ 333 उनका जीवन और मरण वास्तुविज्ञान के अनुसार ठीक-ठीक से जानना चाहिए।¹ वास्तुदण्डाह — नगरे वा पुरे चैव मानं दण्डैर्विधीयते। वास्तुदण्ड इति प्रोक्तः सोऽत्र वै हस्तसङ्ख्यया ॥ २॥ चतुर्हस्तं च यत्क्षेत्रमङ्गुलैश्च फलप्रदम्। वस्वङ्गुलैश्च क्षेत्रं तु पादैर्वा प्रतिशोधयेत् ॥ ३॥ नगर और पुर आवासों का लम्बाई-चौड़ाई के माप के मान को दण्ड विधि से करना चाहिए। इसे 'वास्तुदण्ड' कहते है। उसकी हस्त संख्या (गज की संख्या) लम्बाई हेतु इस प्रकार समझें— चार हाथ के गज का जो क्षेत्र हो उसका उतने ही अङ्गुल माप का फल होता है। आठ अङ्गुल का क्षेत्र होने पर उसमें एक पाद से शोधन करना चाहिए। तत्क्षेत्रं तु यथाकारमश्मकार्ये विशोधयेत्। यत्र हस्तमितिः क्षेत्रे तद्गृहं हस्तसङ्ख्यया ॥ ४॥ क्षेत्रलाभे तु तत्रैव स्यात्स्वदेहाङ्गुलैर्गृहम्। अङ्गुलैः क्षेत्रमाने च अङ्गुलैस्तदलाभतः ॥ ५॥ उस क्षेत्र के आकार के ही पाषाण कार्य का शोधन करना चाहिए। जहाँ हस्त (गज) के नाप में क्षेत्र आते हों उन गृहों में हस्त-गज की संख्यानुसार क्षेत्रलाभ में वहाँ अपनी ही देह के अङ्गुल प्रमाण का गृह होता है तथा अङ्गुलों के क्षेत्रमान के अनुसार अङ्गुलों को उसका लाभ माने। पादैर्वापि यवैर्वापि गृहक्षेत्रानुसारतः। तृणच्छन्दे स्वामिहस्तैर्हर्म्यादौ कर्मिहस्ततः ॥ ६॥ (इसके अभाव में या वैसा सम्भव नहीं हो तो) गृहक्षेत्रानुसार पादमान से या यवमान लें। तृणच्छन्दों में तो गृहस्वामी के हाथ (गज) के अनुसार और हवेलियों आदि में कर्मिहस्त अर्थात् शिल्पी के हस्त (गज) अनुसार माप का मान लेना चाहिए। राजवेश्मपुरादीनां वापीकूपादिकस्य च। प्रासादेषु च देवानां शास्त्रहस्तेन केवलम् ॥ ७॥
- आचार्य श्रीपति का मत है— आयव्याक्षांशचन्द्रतारबलानि शास्त्रादवलोक्य सम्यक्। आयुर्धनाऽऽरोग्ययशोभिवृद्ध्यै गृहं गृहस्थो हि निधापयीत्॥ (ज्योतिषरत्नमाला 17, 1)