भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 535 में से

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३३८ अपराजितपृच्छा हमेशा दक्षिण उत्तर की दिशा की सूचक है। उस शङ्कु मण्डल के घेरों पर दोनों ओर एक मध्य में तीन दीपक रखें। एकसूत्रे यदा त्रीणि दीपशिखाग्रकाणि च। पूर्वसंस्थं ध्रुवसाध्यमपरस्थं च दोषकृत् ? ॥ ३१ ॥ जब तीनों दीपकों का शिखाग्र एक सूत्र में आ जाए, तो पूर्व की तरह की ध्रुव साध्य हो जाता है। इसमें अन्य अन्तर रह जाए तो दोषपूर्ण माना जाता है। शस्तं तु मीनपातैश्च पूर्वापरादिसाधनम्। विकर्णकर्णगा साध्या ध्रुवशङ्कुप्राच्युद्भवः ॥ ३२ ॥ (अब यह सिद्ध हो गया है कि ध्रुवार्थ चुम्बक विधि से) मत्स्यपातानुसार देखा गया पूर्वा-पर दिक् साधन प्रशस्त है अर्थात् ठीक-ठीक है तथा विकर्ण और कर्ण की ओर जाने वाली दिशा-रेखाएँ इससे साध्य हैं, वैसे ही जैसे ध्रुव शङ्कु से प्राच्युद्भव छाया से साध्य होती है।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गृहारम्भप्रतिष्ठादिनमासनिर्णयाधिकारो नाम त्रिषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गृहारम्भ, प्रतिष्ठा दिन मास निर्णय अधिकार नामक तिरसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥ आयाधिकारो नाम चतुःषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६४ ॥ विश्वकर्मोवाच — आयव्यांशका ऋक्षं ताराचन्द्रबलं गृहे। जीवितं मरणं ज्ञेयं वास्तुविज्ञानपूर्वकम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा ने कहा कि गृहों के आय-व्यय, अंशक, नक्षत्र, ताराबल, चन्द्रबल,

  1. ग्रन्थकार यहाँ दिक्सूचकयन्त्र की प्रशंसा करता ही प्रतीत होता है। वैसे दिक्सूचकयन्त्र बहुत पहले ही प्रयोग में आ चुका था। ज्योतिषियों ने भी इसकी प्रशंसा में कहा है कि शिल्पीगण चुम्बकीय यन्त्र से भी दिशा का ज्ञान करते हैं, पूर्वा-पर का जो ज्ञान किया गया, वह सममण्डलीय है, इससे सूर्य के उदयास्त, पूर्वा-पर और अर्ध्यादि उदित और अन्यत्र अल्प अन्तरादि को समझा जा सकता है — सचुम्बकादेव सुशिल्पविज्ञाः कुर्वन्ति दिग्ज्ञानमितोऽन्यथैव । पूर्वापरा याऽत्र कृता प्रकारैर्ज्ञेया बुधैः सा सममण्डलीया ॥ अर्कोदयास्तजे पूर्वापरे तेऽर्ध्यादिपूदिते। अन्यत्राल्पान्तरात् केचिदुदङ्मेरुं ततो जगुः ॥ (सिद्धान्ततत्त्वविवेक : कमलाकर भट्ट, परिष्कर्ता : पं. सुधाकर द्विवेदी व पं. मुरलीधर शर्मा, ब्रजभूषणदास एण्ड कंपनी, बनारस, द्वितीयावृत्ति, 3, त्रिप्रश्नाधिकार 378-379, पृष्ठ 302-303)
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