अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६३ 331 द्वादश दशाष्टाभिश्च त्रिभिर्वृत्तं क्षमाङ्कितम्। शङ्कुच्छायास्त्रिगुणतो द्विपर्व¹युक्तिको समा ॥ २६ ॥ उस समतल भूमि पर 12, 10 और 8 शङ्कु के पर्वों की लम्बाई के नाप से क्रमशः तीन वृत्त अङ्कित करें। भूमि में क्षिस अर्थात् खुदाई करके— इस तरह दो-दो पर्व समान युक्ति से शङ्कु की छाया पथ 12 पर्व के वृत्त पर, दूसरा छायापथ 10 पर्व के वृत्त पर और तीसरा छायापथ 8 पर्व के वृत्त पर देखा जा सकेगा। परिधौ बाह्यवृत्तस्य व्यासे शङ्कुतुल्योत्तमा। कूलवंश पूर्वा छाया ²शङ्कुश्शरण आश्रितैः ॥ २७ ॥ यह तो स्पष्ट ही है कि बाह्य वृत्त की परिधि तो शङ्कु के तुल्य 12 पर्वों के व्यास से बनी है। इन के वृत्तों के किनारे की छाया (कूलवंश) पूर्व की ओर से आती है, जो शङ्कु के ऊपर चलने से आती है। छायाग्रे वृत्ततुल्या च छाया पूर्वापरोद्भवा। प्रवेशे निर्गमे छाया याति सूत्रं सदा भवेत् ॥ २८ ॥ यह शङ्कु की छाया पूर्व से पश्चिम की ओर पड़ती हुई उद्भव होती है और छायाग्र वृत्त के तुल्य बनती जाती है अर्थात् बारह पर्व की छाया बड़े वृत्त पर, दश पर्व की छाया मध्यम वृत्त पर और आठ पर्व की छाया कनिष्ठ वृत्त पर होगी। इस तरह छाया का प्रवेश और छाया के निर्गम से वृत्तों पर ध्यान देने से याति सूत्र सदा बनता रहता है। याम्योत्तरं सूत्रपाते मत्स्यमुखं पुच्छाग्रसूत्रे ?। याम्योत्तरोद्गतं सूत्रं विकर्णैः कर्णसाधनम् ॥ २९ ॥ दक्षिण और उत्तर के सूत्रपात से (चुम्बकीय विधि से, कुतुबनुमा की सुई से?) मत्स्य की पुच्छ और मुख सीध में होते हैं। इस दक्षिण उत्तर से बनने वाले सूत्र से ही विकर्ण का कर्ण साधन बनता है। निशाकाले ध्रुवसाधनमाह — अथ रात्रौ ध्रुवमसाध्यं दक्षिणोत्तरम्। मण्डलोभयपक्षे च मध्ये स्थाप्यं त्रिदीपकम् ॥ ३० ॥ अब रात्रि में ध्रुव साधन की विधि कहते हैं। रात्रि में ध्रुव का अक्ष सीधा,
- 'युक्तिकोत्तमा?' इति प्रकाशित पाठः।
- 'शङ्कुशरुणाश्रितैः?' इति प्रकाशित पाठः।