भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 390

सूत्र-६५ 345 ग्रहराश्यादि मैत्रीविचारः — वेश्मपत्योर्भवेच्चैव गृहमैत्री परस्परम्। द्वादशङ्गोक्ता राशयश्च नवैव च ग्रहास्तथा ॥ २४ ॥ गृह और गृहस्वामी की परस्पर ग्रह मैत्री हो, इन बारह राशियों और नवग्रहों की भी ग्रह मैत्री होनी चाहिए। तथैकराशिकाः केचित् केचिच्चैव द्विराशिकाः। तदनुक्रमकं वक्ष्ये यदुक्तं परमेश्वरैः ॥ २५ ॥ कोई ग्रह एक राशि के स्वामी होते है और कोई ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी होते हैं, मैं यहाँ उनका अनुक्रम कहता हूँ, जैसा परमेश्वर ने पहले बताया था। भौमस्य वृश्चिको मेषो भार्गवस्य तुला वृषौ। बुधस्य कन्यामिथुने सोमस्यैवं तु कर्कटः ॥ २६ ॥ सिंहः सूर्यस्य क्षेत्रं स्याद् धनुर्मीनौ तथा गुरोः। शनेश्च कुम्भमकरौ गृहक्षेत्राधिपा इति ॥ २७ ॥ मङ्गल की वृश्चिक और मेष राशि, शुक्र की तुला और वृष राशि, बुध की कन्या व मिथुन राशि, चन्द्रमा की कर्क राशि, सूर्य की सिंह राशि, गुरु की धनु व मीन राशि, शनि की कुम्भ और मकर राशि है— इसे ही गृह व गृहस्वामी के प्रसङ्ग में भी समझें। न पीडयन्त्यात्मक्षेत्रं स्नेहिनः क्षेत्रपालकाः। रिपुगृहं पीडयन्ति भस्मीकुर्वन्ति विग्रहे ॥ २८ ॥ ये सभी क्षेत्रपाल राशिपति अपने स्वक्षेत्र को कभी हानि नहीं पहुँचाते और अपने स्नेही मित्रों के क्षेत्र में होने पर भी हानि नहीं पहुँचाते परन्तु शत्रु के क्षेत्र में आने पर ये ग्रह पीड़ाकारी हो जाते हैं और विग्रह कराते हैं। स्यात्सूर्यमन्दयोर्वैरं तथा च कुजमन्दयोः। गुरुशुक्रयोः स्याद्वैरं चन्द्रेण च बुधस्य तु ॥ २९ ॥ ग्रह से वेध हो तो केवल चरण वेध ही त्याज्य होता है। ऐसा नारदीय सूत्र का वचन है- 'पदभेवशुभैर्विद्ध अशुभैर्नैव कृत्स्नजः ।' मुहूर्त्ततत्त्वं में इसकी विधि आई है—सात रेखाएँ तिर्यक् और सात ही रेखाएँ ऊर्ध्व रूप से खींचने पर सप्तशालाका चक्र बनता है। इसमें रुद्र अथवा ईशान की रेखा पर कृत्तिका नक्षत्र लिखें और बाद में शेष नक्षत्रों का क्रमशः न्यास करें। यह न्यास अन्तिम सिरे तक किया जाएगा और प्रत्येक रेखा के आमने-सामने नक्षत्र न्यास होगा। इन नक्षत्रों पर जो कोई ग्रह होगा तो उसका सामने वाले नक्षत्र से वेध जानना चाहिए। यह वेध विवाहादि माङ्गलिक कार्यों के अतिरिक्त अन्यत्र स्वीकार्य है। (मुहूर्त्त. 1, 5)