भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 535 में से

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पृष्ठ 391

रवेरङ्गारकस्यैव मैत्री च गुरुचन्द्रयोः । एषां त्रयाणां वै मैत्री अन्येषां तु न विद्यते ॥ 30 ॥ सूर्य और शनि ग्रह में परस्पर वैर है। इसी तरह मङ्गल और शनि में भी वैर है। गुरु व शुक्र का वैर है और चन्द्र व बुध का भी वैर है। सूर्य और मङ्गल की मैत्री है। गुरु और चन्द्र की मैत्री है। इनकी तीनों में भी मैत्री है। अन्यों में यह मैत्री नहीं है। स्पष्टार्थचक्र

राशिग्रहमित्रभावशत्रुभावसमभाव
सिंहसूर्यचन्द्र गुरु मङ्गलशुक्र शनिबुध
कर्कचन्द्रसूर्य बुध-गुरु शुक्र मङ्गल शनि
मेष, वृश्चिकमङ्गलसूर्य चन्द्र गुरुबुधशुक्र शनि
मिथुन, कन्याबुधसूर्य शुक्रचन्द्रमङ्गल गुरु शनि
धन, मीनगुरुसूर्य चन्द्र मङ्गलबुध शुक्रशनि
वृषभ, तुलाशुक्रबुध शनिसूर्य मङ्गलचन्द्र गुरु
मकर, कुम्भशनिबुध शुक्रसूर्य चन्द्र मङ्गलगुरु
ग्रहाश्चत्वार एकत्र त्रय एकत्रसंस्थिताः ।
उभयोरन्तरं घोरं कालानल इवाऽपरः ॥ 31 ॥
यदि चार ग्रह एकस्थान पर एकत्र हो जाए या तीन ग्रह एक स्थान पर स्थित
हो जाए अथवा इन दोनों के अन्तर की स्थितियाँ हो तो घोर विपत्ति (काल-अग्नि
जैसी परिस्थितियाँ) होती है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
नक्षत्रराशिचन्द्रमैत्र्यनुक्रमो नाम पञ्चषष्टितमं सूत्रम् ॥ 65 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में नक्षत्र-
राशि-चन्द्र-मैत्री अनुक्रम नामक पैंसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 65 ॥
व्ययांशकताराग्रहजीवमृत्युसर्वबलं षट्षष्टितमं सूत्रम् ॥ 66 ॥
अथ व्ययानयनं विश्वकर्मोवाच —
नक्षत्रे वसुभि₈ भक्ते यच्छेषं व्ययमादिशेत् ।
अष्टौ व्ययास्तथाप्रोक्ता आयेष्वष्टसु योजिताः ॥ 1 ॥
विश्वकर्मा ने कहा कि नक्षत्र को 8 से भाजित करें, जो शेष रहे उसे 'व्यय'
कहा जाता है। व्यय भी आठ कही गई है, जो आठ आयों के साथ योजित होती है।
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