भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-६६ 347 आयाश्च कथिताः पूर्वं व्ययानां लक्षणं शृणु। एकैका यस्य संस्थाने व्ययाश्च त्रिविधाः स्मृताः ॥ २ ॥ आयों के बारे में तो पहले कहा जा चुका है। अब तुम इन व्यय के लक्षणों के बारे में सुनो। एक-एक व्यय अपने संस्थान में तीन (पिशाच, राक्षस व यक्ष) प्रकार की होती है। समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसस्तु व्ययोऽधिकः। व्ययो न्यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥ ३ ॥ पिशाचों का व्यय समान होता है; राक्षसों का व्यय अधिक होता है और यक्षों का व्यय न्यून होता है। इसलिए इनका व्यय धन-धान्यकर कहलाता है। अनायव्यये कर्तरि आयहीने व्यये तथा। व्ययाधिक विनश्यन्ति अचिरेणै सर्वदा ॥ ४ ॥ अनाय से व्यय छुरी या कैंची (कर्तरीदोष) का काम करता है। आय हीन से भी व्यय होता है और व्यय अधिक होने पर तो शीघ्र और सदा-सर्वदा के लिए विनाश हो जाता है। ध्वजादिष्वष्टस्वायेषु अष्टौ शान्तादिका व्ययाः। प्रत्येकव्ययसंस्थाने आयो न्यूनेत्तरः स्मृतः ॥ ५ ॥ ध्वजादि आठों आयों में आठों ही शान्तिकादिक व्यय हैं। अस्तु, प्रत्येक व्यय के संस्थानों में आय बहुत ही कम होती है। व्ययनामानि - शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः। श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः ॥ ६ ॥

  1. शान्त, 2. पौर, 3. प्रद्योत, 4. श्रियानन्द, 5. मनोहर, 6. श्रीवत्स, 7. विभव और 8. चिन्तात्मा— ये आठ व्यय कही गई हैं। प्रशस्ताप्रशस्त व्ययमाह — आयस्थाने व्ययो योज्यो ह्यप्रशस्तो व्ययोऽधिकः। व्ययो न्यूनस्तथा श्रेष्ठो धनधान्यकरः स्मृतः ॥ ७ ॥ आय स्थान में व्यय को लगाना अप्रशस्त अर्थात् ठीक नहीं है, क्योंकि व्यय अधिक है। व्यय तो न्यून ही श्रेष्ठ होता है जो धन-धान्यकारक माना जाता है। स्मृतो ध्वजे शुभः शान्तः नित्यं कल्याणकारकः। भोज्यं पूजाफलं शान्तिर्नृत्यं गीतं सुरालये ॥ ८ ॥