अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 393, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें348 अपराजितपृच्छा ज्ञातव्य है कि ध्वज आय के साथ शान्त व्यय दिया जाना शुभ और नित्य कल्याणकारक होता है तथा इससे भोज्य पदार्थ, पूजा के फल, शान्तिक नृत्य, गीतादि मन्दिरों में बने रहते हैं। धूमस्थाने यदा शान्तो हेमरत्नादिसम्भवः । अग्न्युपजीवकानां च धातुद्रव्यफलप्रदः ॥ 9 ॥ धूम आय के साथ यदि शान्त व्यय हो तो सोना-चाँदी रत्नादि सम्भव हो जाते हैं जो अग्नि से उपजीविका चलाने वालों के लिए और धातु-द्रव्यों में फलप्रद है। सिंहस्थाने च पौरश्चेत् सिंहवच्च पराक्रमैः । निहन्ति रिपुसैन्यानि ह्यात्मस्थाने महोत्सवाः ॥ 10 ॥ सिंह आय के स्थान पर पौर व्यय सिंह के समान ही पराक्रमी होता है, ऐसे योग के फलस्वरूप रिपुओं के सैन्य दल स्वयं अपने स्थानों में मारे जाते हैं और महोत्सव होते हैं। प्रद्योतः श्वानसंस्थाने नित्यं भोगसुखावहः । शय्यासु वेश्मनि तथानेकभोगादिकामदः ॥ 11 ॥ श्वान आय के स्थान में प्रद्योत व्यय दिए जाने से नित्य भोग और सुख देने वाला होता है। इससे गृह में विविध शय्या-सुख और ऐसे ही अनेक भोगादि से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। श्रियानन्दो वृषस्थाने नित्यं श्रीसुखशान्तिदम्। व्यवहारोपस्करं च गुरुदेवार्चने रतिम् ॥ 12 ॥ वृष आय के स्थान में श्रियानन्द व्यय होने पर नित्य ही सुख और शान्ति बनी रहती है। इससे व्यवहार में आने वाले सभी उपस्कर अर्थात् साधन सुलभ होते हैं और गुरुदेव के पूजन-अर्चन में भी रुचि और प्रेम बना रहता है। मनोहरः खरे युक्तः सर्वमनोरथप्रदः । समस्तभोगयुक्तानां तीर्थयात्राप्रकाशकः ॥ 13 ॥ खर आय के साथ मनोहर व्यय होने पर सब प्रकार के मनोरथ सिद्ध होते रहते हैं। इससे समस्त भोगयुक्त साधन सुलभ होते हैं और तीर्थयात्रा का सौभाग्य भी प्रकट होता है। श्रीवत्सो गजसंस्थाने स्त्रीणां क्रीडात्मनः स्मृताः । शृङ्गारभोगयुक्तानां बलपुष्टिप्रदायकः ॥ 14 ॥ गज आय के संस्थान पर श्रीवत्स व्यय होने पर स्त्रियों में क्रीड़ा, आमोद-प्रमोद