अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६६ 349 का और शृङ्गार-भोग आदि के योग बनते है। अस्तु, ऐसा संयोग भी बल-पुष्टि प्रदायक होता है। विभवो ध्वाङ्क्षसंस्थाने शिल्पिनां हितकामदः। सूत्रशास्त्रार्थसम्पन्ना भोगशृङ्गारनिश्चलाः ॥ 15 ॥ ध्वांक्ष आय के संस्थान में विभव व्यय होने पर शिल्पियों के हित और कामनाओं की पूर्ति होती हैं। इससे वे सूत्रशास्त्रार्थ सम्पन्न होते है और उन्हें भोग- शृङ्गार की उपलब्धि निश्चल बनी रहती है। सर्वेषु शान्त आयेषु प्रशस्तः सर्वकामदः। षट्सु सिंहादिषु शुभः पौरो धूमध्वजौ विना ॥ 16 ॥ सभी आयों में शान्त व्यय प्रशस्त और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। सिंहादि से छह आयों में पौर व्यय शुभ है, इनमें धूम, ध्वज ये दो आय नहीं होनी चाहिए। ध्वजे धूमे तथा सिंहे प्रद्योतादीन् विवर्जयेत्। शेषाणां सुप्रशस्ताश्च तथा स्थानेषु पञ्चसु ॥ 17 ॥ ध्वज आय में धूम आय में तथा सिंह आय में प्रद्योतादि व्यय विवर्जित है, शेष पाँच स्थानों में ये सुप्रशस्त हैं। खरे वृषे श्रियानन्दो गजे ध्वाङ्क्षे च शोभनः। मनोहरं त्यजेत्सोऽथ खरे ध्वाङ्क्षे गजे शुभः ॥ 18 ॥ खर आय और वृष आय स्थान पर श्रियानन्द व्यय, इसी तरह से गज आय और ध्वांक्ष आय के साथ भी श्रियानन्द व्यय शोभन, लाभप्रद है परन्तु खर आय, ध्वांक्ष आय और गज आय— तीनों में मनोहर व्यय को त्यागना ही शुभ है। श्रीवत्सश्च गजे ध्वाङ्क्षे विभवो ध्वाङ्क्षके शुभः। व्ययो न्यूनतरः श्रेष्ठो ह्यधिकश्चैव राक्षसः ॥ 19 ॥ गज आय, ध्वांक्ष आय के स्थान पर श्रीवत्स व्यय शुभ है। ध्वांक्ष आय के स्थान पर विभव व्यय भी शुभ है। अस्तु, व्यय सदा न्यूनतम रहना ही श्रेष्ठ है। अधिक व्यय तो राक्षसों का होता है। चिन्तात्मकं व्ययं चापि आयेष्वष्टसु वर्जयेत्। पिशाचकमायसमं न कुर्याच्छुभकर्मसु ॥ 20 ॥ इति व्ययाधिकारः। इसी प्रकार आठों आयों के स्थान पर कभी भूल से भी चिन्तात्मक व्यय नहीं