अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें344 अपराजितपृच्छा राशिक नवपञ्चक होना अनिष्ट का सूचक है और चतुर्थ-दशम होना पुष्टिकारक होता है। तृतीयेकादशे मैत्री ¹द्वितीयद्वादशे रिपुः । राशयः षड्विधा एवमन्योन्यं पतिवेश्मनोः ॥ १९ ॥ राशि का तृतीय-एकादश होना मैत्रीकारक है परन्तु द्वितीय-द्वादश होना शत्रुता का कारक है। इस तरह छह प्रकार से राशियों व गृहस्वामियों का अन्योन्य सम्बन्ध बताया गया है। चन्द्रस्थितिफलमाह — गृहाग्रे च यदा चन्द्रो क्षयं वेश्म करोति हि। राष्ट्रचौराग्निभयं घोरं चन्द्रे वै पृष्ठमागते ॥ २० ॥ धनधान्यक्षमारोग्यं कुरुते दक्षिणस्थिते । श्रीस्त्रीपुत्रा उत्तमाश्च चन्द्रे वै उत्तरे स्थिते ॥ २१ ॥ अब चन्द्र की स्थिति अनुसार फल देखते हैं। यदि गृह के आगे चन्द्र रहता है तो गृह की क्षति करता है और चन्द्र पीछे रहता है तो रात्रि में चोरादि और अग्निभय घोर होता है। चन्द्रमा यदि दायें हो तो धन-धान्य भूमि, आरोग्य प्रदाता होता है और यदि चन्द्रमा उत्तर दिशा में स्थित हो तो स्त्री-पुत्रादि के लिए सर्वोत्तम होता है। इत्यमनन्तर सप्तशलाक्यचक्रमाह — सप्तोर्ध्वे स्थापयेद्रेखाः पुनर्भिन्नाश्च सप्तभिः । रेखाः प्रोक्तानि साभिजिन्नक्षत्राण्यष्टविंशतिः ॥ २२ ॥ कृत्तिकादीनीशान्यां शेषर्क्षाणि प्रदक्षिणे । हक्षेत्रोक्तमृक्षं च तत्र चन्द्रमुदीरयेत् ॥ २३ ॥ (सप्तशलाका चक्र के लिए) सात ऊर्ध्व रेखाएँ बनाएँ और सात ही इनको काटती हुई आड़ी रेखाएँ बनाएँ। इस तरह अभिजित् सहित 28 नक्षत्रों की ये रेखाएँ बनती हैं। कृत्तिकादि को ईशानकोण से आरम्भ करते हुए प्रदक्षिण क्रम में एक- एक रेखाग्र पर नक्षत्रों के नाम लिखते जाएँ। इस क्षेत्र के इन नक्षत्रों पर चन्द्रमा की स्थिति देखनी चाहिए।²
- मुद्रितपुस्तके 'तृतीयद्वादशे' इति पाठः। ज्योतिष की मान्यताओं में दो-बारह या बीया-बारहवाँ होना वैरभाव का सूचक माना जाता है।
- यह सप्तशलाका चक्र नक्षत्रों का वेध जानने हेतु बनाया गया है। आमने-सामने के नक्षत्रों का सप्तशलाका वेध होता है। इनमें भी पाप ग्रह से वेध हो तो सम्पूर्ण नक्षत्र को त्यागना चाहिए और शुभ