अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६५ ३४३ वास्तुचक्रादिचक्रेषु ग्रहवेधविशोधनैः। अष्टाविंशतिरेवं च साभिजित् कृत्तिकादयः ॥ 12 ॥ वास्तु चक्रादि चक्रों को और ग्रह वेध के शोधन के लिए अभिजित् नक्षत्र के साथ कृत्तिकादि अट्ठाईस नक्षत्र इस प्रकार लाने चाहिए। वर्णानुसार प्रशस्तराशयः — चातुर्वर्ण्यप्रशस्तांश्च राशीनथ वदाम्यहम्। तत्र त्रयस्त्रयः प्रोक्ता विप्रशूद्रान्तमार्गतः ॥ 13 ॥ वृश्चिकः कर्कटो मीनो ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः। धनुर्मेषस्तथा सिंहो राजन्याश्च शुभाः स्मृताः ॥ 14 ॥ वृषः कन्या च मकर एते वैश्या उदाहृताः। मिथुनं च तुला कुम्भस्त्रयः शूद्राः प्रकीर्तिताः ॥ 15 ॥ अब मैं चारों वर्णों के लिए जो-जो प्रशस्त राशियाँ हैं, उनके बारे में कहता हूँ। ये तीन-तीन कही गई है जो कि विप्र से शूद्र वर्ण तक है। ब्राह्मण की राशियाँ वृश्चिक, कर्क और मीन को कही है। क्षत्रिय या राजन्य की धनु, मेष तथा सिंह राशि कही गई है। वैश्य के लिए वृष, मकर और कन्या राशि शुभ है और शूद्र वर्ण के लिए मिथुन, तुला और कुम्भ राशियाँ शुभ कही गई हैं। भवेद् द्वादशभिर्विप्रः क्षत्रियो नवभिस्तथा। षड्राशिभ्यो भवेद् वैश्यस्त्रिभिः शूद्रः प्रशस्यते ॥ 16 ॥ इनमें 12 राशियाँ ब्राह्मण के लिए, 9 राशियाँ क्षत्रिय के लिए, 6 राशियाँ वैश्य और 3 राशियाँ शूद्र के लिए प्रशस्त जाननी चाहिए। चातुर्वर्णान्तरभेद एवमुक्तोऽपराजित। प्रीत्यर्थं च पुनर्भेदं कथये तव साम्प्रतम् ॥ 17 ॥ हे अपराजित ! तुम्हें यह चातुर्वर्णान्तर भेद इस प्रकार से कहा गया। अब मैं पुनः तुम्हारे स्नेह के कारण इनके भेद पूरी तरह कहता हूँ। अथ षडष्टकादीनां — षडष्टके ध्रुवं मृत्युः प्रीतिः स्यात् समसप्तमे। अनिष्टं पञ्चनवमे पुष्टिर्दशचतुर्थके ॥ 18 ॥ इन राशियों में षडाष्टक (छठे-आठवें) होने पर निश्चय ही मरणान्तक पीड़ा होती है परन्तु एक दूसरे के सम-सप्तम राशि होने पर प्रीति भी गाढ़ होती है।