भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 361

सूत्र-६१ 315 तथा पातालदेवाश्च अमृतवृक्षदेवताः । तथा प्रासाददेवाश्च गृहदेवास्तथैव च ॥ ३९ ॥ बृहद्देवाः क्षेत्रदेवा दद्यादेभ्यो बलिं बुधः । क्षमापयेन्नमस्कृत्य तथैव सर्वदेवताः ॥ ४० ॥ (इसके अनन्तर इसी क्रम में) स्थानदेव, जलदेव, स्थलदेव, अन्तरिक्षदेव, भूमिदेव, पातालदेव, अमृतवृक्षदेवता, प्रासाददेव, गृहदेव, बृहद्देव, क्षेत्रदेव आदि समस्त देवताओं को समझदार लोगों को बलि प्रदान करते हुए नमस्कार और क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां दिक्पालादिवास्तुदेवपूजाबलिकर्मयुक्त्यधिकारो नाम षष्टितमं सूत्रम् ॥ ६० ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में दिक्पालादिवास्तुदेव पूजा-बलिकर्मयुक्त अधिकार नामक साठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६० ॥ आचार्यसूत्रधारपूजानिर्णयो नामैकषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६१ ॥ विश्वकर्मोवाच — आचार्य पूजयेत्तत्र वस्त्रालङ्कारभूषणैः । स्वर्णपट्टैः कुण्डलाभ्यां कण्ठाभरणकङ्कणैः ॥ १ ॥ रत्नयुक्तमुद्रिकाभिः कटिसूत्रादिकैस्तथा । पादाभरणकैश्चैव हवेन्द्र ¹साङ्गमालिकाः ॥ २ ॥ विश्वकर्मा बोले कि वास्तुपूजावसर पर आचार्य की वस्त्र, अलङ्कार, आभूषण, स्वर्णपट्ट, कानों के कुण्डलों, गले के आभरण और हाथों के स्वर्ण कङ्कणों, रत्नयुक्त अङ्गूठी, कमरबन्द करधनी, पाँवों के गहने, हवि वस्तु और समस्त अङ्गों में धारण हो सके—ऐसी मालाओं को प्रदान कर पूजन करना चाहिए। परीपट्टैरूर्णवस्त्रैः ²शिखिरोमाश्र्व छत्रकैः । वाहनैर्युक्तमेवाथ यानझम्पानकोत्तमैः ॥ ३ ॥ अश्वो गजो रथो वापि दातव्या भूमिसंयुताः । ग्रामो देशाः पृथगुक्तं गुरुपत्नीं विशेषतः ॥ ४ ॥

  1. 'साङ्गमात्रिकाः' इति प्रकाशित पाठः।
  2. 'शिखरो मात्र ? छत्रकैः' इति प्रकाशित पाठः।