अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें316 अपराजितपृच्छा भूमिस्थानगेहदानमाचन्द्रार्कं च तत्फलम्। वस्त्रालङ्करणैर्युक्तं गुरुं शिष्यस्तु भक्तितः ॥ ५॥ इति गुरुपूजा। इसी तरह सुन्दर रेशमी और ऊनी वस्त्रों से तथा मोरपह्नों से बने हुए छत्रक, पट्टों से युक्त वाहनों से, गाड़ी, ऐसे उत्तम यान झम्पानक अर्थात् जिन यानों से आसानी से किसी बाधा को छलाङ्ग लगाने में सफलता मिलती है; अश्व, गज, रथ, बावड़ी आदि भूमि सहित देनी चाहिए। ग्राम, देश आदि गुरु पत्नी को भी अलग से देने चाहिए। भूमि स्थान, ग्रह दानों को आचन्द्रार्क देना चाहिए अर्थात् ऐसा दान हो जो सूर्य-चन्द्र जब तक रहें तब तक के लिए देने चाहिए, वे वापस नहीं लिए जाए— तभी उनका पुण्यफल मिलता है। इसी तरह गुरु के शिष्य को भी भक्तिपूर्वक वस्त्रालङ्करण युक्त भेंट करनी चाहिए। सूत्रधारप्रशंसामाह – भूमेस्तले सूत्रधारो विश्वाधिपो द्वितीयकः । वेदवेदाङ्गसम्भूतो हविष्याशी ¹क्षिते द्विजः ॥ ६॥ इस भूमितल पर सूत्रधार एक प्रकार से दूसरा विश्वाधिप है। वह वेद-वेदाङ्ग से सम्भूत हविष्य को भोग करने वाला क्षिति पर रहने वाला द्विज है। सूत्रधारं ततः प्राज्ञः सर्वसूत्रादिबन्धकम् । वास्तुवेदप्रववतारं शास्त्रज्ञं प्रियवादिनम् ॥ ७ ॥ माधुर्यालापनोपेतं संसारमोहमुद्रकम् । यस्य नाशात्परे साध्यं धर्मार्थकाममोक्षकम् ॥ ८ ॥ तं शिल्पिनं पूजयेत आर्यदेशसमुद्भवम् । आर्यालापबालबोध्यं संसारार्णवतारणम् ॥ ९ ॥ वाग्मिनं च तथा हेतुज्ञानातर्कितकौशलम् । सर्वशास्त्रज्ञानवन्तं विज्ञानादिसमन्वितम् ॥ १० ॥ इस तरह सूत्रधार सभी प्रकार के सूत्रादि बन्धयुक्त प्राज्ञ एवं वास्तुवेद का प्रवक्ता तथा शास्त्रज्ञ और प्रियवादी होता है। वह मधुर वाणी में बातचीत करने वाला और संसार के मोह की मुद्रा का नाश करना इसके लिए परम साध्य है जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कारक है। ऐसे ही शिल्पी की पूजा करनी चाहिए
- 'धिते?' इति प्रकाशित पाठः ।