अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६१ 317 जो आर्यदेश (भारत) में उत्पन्न हुआ हो क्योंकि आर्यों की बोली में बातचीत बालक भी सरलता से समझ सकते है, वह बोली बड़ी सरल एवं संसार सागर से तारने वाली है। ऐसे आर्य देशोत्पन्न शिल्पी वाग्मिन या बृहस्पति के समान वाक्पटु, बुद्धिमान और हेतुज्ञान से तार्किकता के कौशल को जानने वाले, सभी शास्त्रों में ज्ञानवान्, विज्ञानादि से समन्वित होते हैं। शिल्पिनसम्मानह — पूजयेद् दिव्यवस्त्रैश्च दिव्यालङ्कारभूषितैः । पृष्ठपट्टैर्नेत्रपट्टैः सुवर्णैर्दशाङ्ग¹मालिकाः ॥ ११ ॥ पुत्रकलत्रसंयुक्तं भ्रातृयुक्तं तथोत्तमम्। सभृत्यं बलयुक्तं च शैलकर्माधिकारकम् ॥ १२ ॥ ऐसे योग्य शिल्पी को दिव्य वस्त्रों, दिव्य अलङ्कारों और आभूषणों से भूषित करें। पीठ वाला पट्ट, महीन रेशमी कपड़ा (नेत्रपट्ट), सुवर्ण की बनी हुई दशाङ्ग मालाएँ आदि उनके पुत्र-पत्नी तक और भाइयों तक को तथा उनके उत्तम भृत्यबलों तक भी और पाषाण कर्माधिकारी, सलाट, तक्षक गणों को भी भेंट-पूजा करें। कुटुम्बगृहचिन्ताश्च खाद्यपेयादिकोद्भवाः । वस्त्रताम्बूलादि चिन्ता गृहेषु या भवन्ति च ॥ १३ ॥ ताश्चापहारणीया वै कर्मचिन्ता यथा भवेत्। ग्रामं वा भोगभूमिं वा कर्मकारोचितं यथा ॥ १४ ॥ बलीवर्दाश्च वाहिनीयानझम्पानकादिकम्। हलं सकूपं क्षेत्र च पुष्पोद्यानं फलैर्युतम् ॥ १५ ॥ गृहं दिव्यं च भुवनं पञ्चभूम्यादिकं गृहम्। ध्वजाकलशसंयुक्तं कर्त्तव्यं शिल्पिने तथा ॥ १६ ॥ इसी प्रकार खाद्य, पेय आदि के कारण होने वाली कुटुम्ब-गृहचिन्ता, घरों में आवश्यक वस्त्र ताम्बूलादि की चिन्ता जो प्रायः घर-घर होती है, उन सब चिन्ताओं का जो कर्मकारों में भी होती है— उन चिन्ताओं के निवारण हेतु उन कर्मकारों के लिए उचित ग्राम या भोगभूमि, खेती के लिए वलीवर्द अर्थात् बैल, गाड़ी, वाहन, यानादि झम्पादि से युक्त तथा हल² प्रमाण वाली ऐसी भूमि जो कूप, फल-पुष्पोद्यान
- 'मात्रिका: ?' इति प्रकाशित पाठः।
- यहाँ हल से आशय हल के प्रमाण की भूमि से प्रतीत होता है। हल भू-माप की इकाई के रूप में स्वीकृत है। एक हल से जोती गई भूमि के माप को हल-माप कहा जाता है। वासिष्ठीपुत्र पुलुमवि के