भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 535 में से

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318 अपराजितपृच्छा युक्त हो देनी चाहिए। इसी प्रकार गृह, भुवन दिव्यस्वरूप के, यहाँ तक कि पाँच तलों तक के भवनों, गृहों को ध्वजा-कलश से युक्त सजावट के साथ शिल्पियों के लिए प्रदान करने की व्यवस्था होनी चाहिए। पादापत्यददे तस्या प्रेक्षनादिक्ष सन्तताः ?। तेन तत् ह्रियते चैव गृहचिन्तादि बाह्यतः ॥ 17 ॥ एकचित्ते समाधिष्ठे प्रासादकर्मकौशलम्। परब्रह्मानुष्ठानवत् लीयमानो यथा भवेत्॥ 18 ॥ तस्याहाय्यं वृद्धिहेतु प्रारब्धकृतनिश्चयम्। तेनासौ लभते सिद्धिमिहलोके परत्र च॥ 19 ॥ इसी प्रकार उनके लिए (आपदाओं का निवारण करने वाले निरीक्षक पदादि की व्यवस्था करें) ताकि वे गृह विषयक चिन्ताओं को बाहर ही त्याग दें और एकचित से अर्थात् एकाग्र मन से प्रासाद कर्म कौशल दिखाने में समाधिष्ठ हो सकें। उनकी सांसारिक चिन्ताओं को दूर करने पर वे अपने कर्म-कौशल में इतने लीन हो जाएँ मानों वे परब्रह्मानुष्ठान में ही लीयमान हो गए हों। यह स्मरणीय है कि उन शिल्पियों के कर्म-कौशल दिखलाने में उनकी सहायता में वृद्धि हेतु ही उपर्युक्त तरीकों के प्रारब्ध के उपायों का कृतनिश्चय अर्थात् पूरी व्यवस्था की गई है, जिससे कि ये इस लोक और परलोक में भी सिद्धि का लाभ पा सके। सूत्रधारसम्मुखे प्रार्थनानिवेदनम् — सूत्रधारं तथाचार्यं बद्धहस्तः क्षमापयेत्। पिता च मम त्वष्टा च इह लोके भवान् मतः ॥ 20 ॥ यजमान को चाहिए कि इस सब भेंट-पूजा-सम्मान के बाद वह सूत्रधार तथा आचार्य से हाथ जोड़कर क्षमा याचना करें और कहे कि 'आप ही हे त्वष्टा! मेरे द्वितीय शती के नासिक गुहाभिलेख में यह माप पहली बार देखने में आया है। (सेलेक्टेड इन्सक्रिप्शंस फ्रॉम महाराष्ट्र : एम. जी. दीक्षितार, पूना 1947 ई., भाग 1, पृष्ठ 208) ऐसी भूमि करमुक्त होती थी। कृष्णा-गुण्टूर (आन्ध्रप्रदेश) से प्राप्त तीसरी व चौथी शताब्द के एक अभिलेख से हलवाहा द्वारा हल से जोते जाने योग्य कर-मुक्त भूमि भिक्षुओं को पुण्यवृद्धि के प्रयोजन से दान में दिए जाने का उल्लेख मिलता है— ...हल सतस पदायिस...। (तत्रैव पृष्ठ 238) इतिहासकारों के अनुसार हल का वास्तविक भू-माप क्षेत्र निर्धारित करना कठिन है किन्तु अभिलेखों के अनुसार यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि योग्य भूमि की, एक हल द्वारा वर्ष पर्यन्त जोती गई सारी भूमि का माप 'एक हल भूमि' से लगाया जा सकता है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा का मत है कि मेवाड़ में भूमि का माप बीघा व हल से होता आया है जो छोटे और बड़े नाप थे। एक हल में 50 बीघा का प्रमाण होता था। बीघा साधारणतः 25 से 40 बाँस तक आंका जाता था। (राजस्थान के इतिहास के स्रोत, जयपुर 1982 ई. पृष्ठ 237)