अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६२ 319 पिता है इस लोक में — ऐसा मेरा मत है। परत्र च स्वयं स्रष्टा तथा मम भवान् गुरुः । त्वं माता च पिता चैव त्वं च पितृपितामहः ॥ २१ ॥ संसारपाशच्छेदं च त्वं कुर्या मम योगतः । भूषणार्थैः पूजनीया वस्त्रैश्च खातकारकाः ॥ २२ ॥ आप ही स्वयं सृष्टा है तथा आप ही मेरे गुरु है; आप ही माता और आप ही पिता तथा आप मेरे पितृ, पितामह ही हैं। सुयोग से कृपा करके आपने मेरे संसार पाश रूपी फँदे को काट दिया है और मुझ से बन पड़ी, उतनी मैंने भूषण से, अर्थ और वस्त्र से हे खातकारकगणो ! मैंने आपकी पूजा की। विश्रामस्तद् दिने वास्तो सर्वविघ्नोपशामकः । दीनान्धयाचकेभ्यस्तु तुलादानं समर्पयेत् ॥ २३ ॥ अस्तु, आज के दिन अब आप विश्राम करें; आज के दिन को विश्राम का दिवस समझें जिससे वास्तु सर्व विघ्नों को शमन करने वाला सिद्ध हो सके।' इसके बाद यजमान दीनों को, अन्धों, याचकों को तुलादान¹ की सामग्री को समर्पित कर दें। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छा- यामाचार्यसूत्रधारपूजानिर्णयाधिकारो नामैकषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६१ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में आचार्य- सूत्रधार पूजा निर्णय अधिकार नामक इकसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६१ ॥ वास्तुपरिभ्रमण॥दिग्गुणदोषनिर्णयो नाम द्वाषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६२ ॥ विश्वकर्मोवाच — अतः परं प्रवक्ष्यामि ज्ञानं च धर्मदुर्लभम् । वास्तुविद्यापूर्वकं च सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ १ ॥ विश्वकर्मा बोले कि इसके आगे मैं वास्तुविद्यापूर्वक सर्व सिद्धि देने वाले धर्म हेतु परम दुर्लभ ज्ञान के विषय में कहता हूँ।
- तुलादान की सामग्री का वर्णन मत्स्यपुराण, लिङ्गपुराण व अग्निपुराण में आया है। मत्स्यपुराण में तुलापुरुषदान की विधि आई है। आरोहणकाल में राजा खड्ग, ढाल, कवच एवं अन्य समस्त आभरणों से भूषित रहे एवं स्वर्ण निर्मित सूर्य सहित धर्मराज को बँधी मुट्ठी वाले दोनों हाथों से पकड़कर विष्णु के मुख की ओर देखता हुए स्थिर रहे— सखड्गचर्मकवचः सर्वाभरणभूषितः ॥ धर्मराजमथादाय हैमं सूर्येण संयुतम्। कराभ्यां बद्धमुष्टिभ्यामास्ते पश्यन् हरेर्मुखम् ॥ (मत्स्य. 274, 65-66)