भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

320 अपराजितपृच्छा वास्तुदिशामुक्तिमानं रव्यानुसारेण वास्तुमुखस्थितिं — ज्योतिःशास्त्रप्रणेतारं सर्वकामफलप्रदम्। प्रणम्यं तं च पुरुषं राशिमध्ये तथा स्थितम् ॥ २ ॥ रवौकन्यातुलालौच पूर्वे शिरः समाश्रितः। धनोश्च मकरे कुम्भे दक्षिणे तु व्यवस्थितः ॥ ३ ॥ मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमे तु समाश्रितः। मिथुने सिंहकर्क च ह्युत्तरेण व्यवस्थितः ॥ ४ ॥ सर्वकालक्रमोऽयं च राशिमध्ये ह्यतः शृणु॥ देवताश्च क्रमयोगेन स वास्तुः सरते महीम् ॥ ५ ॥ यह ज्ञान ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के लिए सर्वकाम फल प्रदान करने वाला है। अतः राशियों के मध्य स्थित रहने वाले पुरुष को प्रणाम करें। वृश्चिक, कन्या, तुला (के सूर्य में) पूर्व की ओर सिर रखे हुए; धनु, मकर कुम्भ को दक्षिण की ओर सिर किए हुए; मीन, मेष और वृष को पश्चिम की ओर सिर किए हुए; मिथुन, सिंह और कर्क का उत्तर दिशा की ओर सिर किए हुए— इस समस्त काल क्रम को राशियों के मध्य चलता हुआ समझें। अतः इसके बारे में सुनें कि देवता भी अपने क्रमानुसार ही इस भूमि पर वास्तु में आते हैं। यत्र भानुस्तत्र शिरं लक्षितव्यं रविक्रमात्। अन्यथा कुरुते दुःखं शिरो वास्तावलङ्कृतम् ॥ ६ ॥ उक्त विधि से जहाँ सूर्य की स्थिति हो वहीं वास्तु का सिर लक्षित करके सूर्य के ही क्रम से वास्तु का अलङ्करण करना चाहिए, यदि वास्तु के सिर का इसके अतिरिक्त अलङ्करण किया जाएगा तो दुःख का कारण बनेगा। देवागारं गृहं यत्र न कुर्याच्छिरः सम्मुखम्। मृत्युरोगभया नित्यं शस्तं च कुक्षिसन्मुखम् ॥ ७ ॥ वहाँ देवागार, देवता के मन्दिर तथा घर वास्तुपुरुष के सिर के सम्मुख कभी भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर नित्य ही रोग और मृत्यु का भय बना रहता है अस्तु, वास्तुदेव की कुक्षि के सन्मुख ही देवागार, गृहादिक बनाने चाहिए, यही प्रशस्त माना गया है। इत्यमनन्तर एषां फलमाह — कन्यातुलावृश्चिके च भास्करो यदि संस्थितः। पूर्वे मुखं न कर्तव्यं गृहं भवति निष्फलम् ॥ ८ ॥