अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६२ 321 यदि सूर्य कन्या, तुला और वृश्चिक राशि पर हो तब कभी भी घरों को पूर्व की . ओर मुख किए हुए नहीं बनाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर ये भवन गृह निष्फल हो जाएंगे। मकरे चैव धनुषि कुम्भे वा च दिवाकरे। याम्यादिशि मुखं कुर्याद्राजचौराग्निजं भयम्॥ ९॥ यदि सूर्य धनु, मकर, और कुम्भ राशि पर स्थित हो तो भवनादिक का मुख दक्षिण दिशा की ओर नहीं बनाएँ क्योंकि ऐसा करने पर राज्य की ओर से, चोर- तस्कर तथा अग्नि से होने वाला भय बना रहेगा। मीने मेषे वृषे चैव पश्चिमा दिग् च दूषिता। स्त्रीणां रोगं महाघोरं भवति ह्यतिदारुणम्॥ १०॥ यदि सूर्य मीन, मेष और वृष राशि पर स्थित हो तब भवनादिक का मुख पश्चिम दिशा की और नहीं रखें क्योंकि ऐसा करने पर घर की स्त्रियों में महाघोर रोग अतिदारुण रूप से बढ़ने का भय बना रहता है। मिथुने सिंहकर्कै च वेश्म नैवोत्तराननम्। दोषशोकभयं तत्तु न कुर्याच्च विचक्षणैः॥ ११॥ इसी प्रकार यदि सूर्य मिथुन, सिंह और कर्क राशिस्थ हो तो घरों को उत्तराभिमुखी कभी नहीं बनाएँ। इसे विद्यावान् लोगों ने दोषपूर्ण बताया है और शोक तथा भय का कारक कहा है। तत्र ना सर्पति वास्तु ¹भ्रमतेरग्निमध्यतः। पूर्वदक्षिणतश्चैव पश्चिमोत्तरतो मुखम्॥ १२॥ अग्नि कोण के मध्य से सर्प-वास्तु नहीं चलता है अथवा नहीं फिरता। अस्तु, पूर्व-दक्षिण तथा उत्तर-पश्चिम की ओर मुख से भवन बना सकते हैं। शिरो नेत्रे च बाहू च उदरं कटिजङ्घया। वेध्यन्ते गृहे मर्म पूजाहानिर्महद्भयम्॥ १३॥ यदि वास्तुपुरुष के सिर, नेत्र, बाहू, उदर, कटि, जङ्घा को गृह के मर्म वेधते हों तो पूजा की हानि और महद्भय की उत्पत्ति होगी। कन्यादिसङ्क्रान्तियोगे प्राच्यादिक्रमतो दिशि। न कुर्वीतं शिरो वास्तोर्न कार्यं तन्मुखं गृहम्॥ १४॥
- 'भ्रमणै?' इति प्रकाशित पाठः।