भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

322 अपराजितपृच्छा कन्यादि संक्रान्ति योगों में प्राच्यादि दिशा क्रम से वास्तु का सिर नहीं करना चाहिए और उस सिर की ओर गृह का मुख भी नहीं रखना चाहिए। क्षपाकरेणैव गृहं पुरस्तात् कुर्यान्न वास्तु न च यातु कर्ता। पतन्ति खन्या न च दृष्टिसंस्थिता तस्मात्प्रयत्नेन त्विदं विचिन्त्यताम् ॥ 15 ॥ इति वास्तुदिशामुक्तिमानम्। पिशाचों (प्रवृत्तिवालों या चन्द्रमा) के अनुसार गृह नहीं बनवाएँ क्योंकि उनके बनाए गए गृह, वास्तु तथा वे पिशाच वास्तुकर्त्ता¹ सभी खड्डे में पड़ते हैं परन्तु जिनके सही-सही शास्त्र बुद्धि की आँखें हैं, वे खड्डे में नहीं पड़ते। अतएव इस बात पर पूरे प्रयत्न के साथ ध्यान देना और इनको हमेशा मनन करते रहना चाहिए। अथ दिक्‍विदिक् वास्तुवेधमाह — दिशायां विदिशायां च वास्तुवेधविशोधनम्। जीर्णे नवतरे वापि वेधदोषं विवर्जयेत्॥ 16 ॥ दिशाओं और विदिशाओं में जो वास्तुवेध पड़ते हों, उनका विशोधन अवश्य करना चाहिए परन्तु जीर्ण वास्तु को पुनः उद्धार करके नवीन बनाया जाता हो तो कोई वेध दोष का चिन्तन नहीं करें। वेधा नः कथिता पूर्व दोषांश्चैव ततः श्रृणु। एकपादादिकं वास्तु पर्यन्तं सहस्रान्तिकम्॥ 17 ॥ अब तक मैंने वेधों के बारे में नहीं कहा है। अस्तु, अब वेधों के दोषों को सुनो जो एक पादादिक वास्तु से सहस्र पादादिक वास्तु पर्यन्त पाए जाते हैं। सुरस्थानं यदा शून्यं पदं पूजां विना यदा। विघ्नोत्कटं महाघोरं कुरुते दारुणं भयम्॥ 18 ॥ जिस वास्तु में यदि सुरस्थान बिना पूजा के और बिना पद के शून्य ही रह जाए तो ऐसे वास्तु को 'विघ्नोत्कटवास्तु' कहते है जो महाघोर दारुण भय कारक बनता है। वीथिकान्तरबाह्येषु पदमेकं सुरैर्विना। विरोधं गोत्रकलहं मुक्तकोणस्य तत्फलम्॥ 19 ॥


  1. पिशाच से आशय सम्भवतः पिशाचपद भी हो सकता है। मयमतं में पैशाचपद का वर्णन हुआ है। नारदसंहिता में भी पिशाचांश का वर्णन है। इक्यासीपद वास्तुचक्र में मध्य के नौ कोष्ठकं ब्रह्मस्थान के होने से त्याज्य हैं, चक्र के चारों ही ओर 32 कोष्ठकों को छोड़कर समीप के 24 कोष्ठक पिशाचांश कहे जाते हैं। इसमें यदि गृहारम्भ, शिलान्यासादि किया जाता है तो दुःख, शोक तथा भयप्रद होता है— मध्ये नवपदं ब्रह्मस्थानं तदतिनिन्दितम्। द्वात्रिंशदंशाः प्राकाराः समीपांशाः समन्ततः॥ पिशाचांशा गृहारम्भे दुःखशोकभयप्रदाः। शेपास्युर्गृहनिर्माणे पुत्रपौत्र धनप्रदाः॥ (नारद. 31, 20-21)