भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 344

270 अपराजितपृच्छा श्रीमात्रादिषु दीक्षासु तिलकं तु प्रपूजयेत् ॥ 11 ॥ दक्षिणोत्तर तथा षट्काद्य में और शक्रध्वज (इन्द्रध्वजोत्सव) में, कमलोद्भव ब्रह्मा के लिए श्रीमात्रादिकों में और दीक्षा के अवसर पर तिलक वास्तु की पूजा करनी चाहिए। सुकर्मणि च प्रस्थाने सुभद्रगं च प्रशस्यते। समस्तजीर्णोद्धारेषु मरीचिगणमर्चयेत् ॥ 12 ॥ इसी प्रकार से अच्छे कार्यों के लिए, प्रस्थान करते समय भी सुभद्र वास्तु का पूजन प्रशस्त कहा गया है। समस्त जीर्णोद्धार, पुनर्संस्कार के कार्य हो तो मरीचिगण वास्तुपद की अर्चना करनी चाहिए। ग्रामखेटपुरादा च कूपे च कर्वटादिके। तथा राजनिवेशे च भद्रकं पूजयेत्सदा ॥ 13 ॥ इसी तरह जब ग्राम, खेट, पुर, कूप, कर्वट तथा राजभवन का काम हो तो उसमें भद्रक वास्तु का पूजन करना चाहिए। गृहादिषु समस्तेषु तृणपट्टच्छन्दादिषु। पाण्ड्वश्वपूर्णखण्डेषु कामदं वास्तु पूजयेत् ॥ 14 ॥ सभी गृहों के कार्यों में, तृण से, पट्ट से, छादन से पाण्डवाश्व के पूर्ण खण्डों में कामद वास्तु का पूजन करें। प्रासादा विविधाश्चैव विविधश्चात्र मण्डपाः। जगतीलिङ्गपीठे च भद्राख्यं, राजवेश्मनि ॥ 15 ॥ विविध प्रकार के प्रासादों में, मन्दिरों में, विविध प्रकार के मण्डपों तथा जगती, पीठ, लिङ्गादि में भद्र नामक वास्तु का पूजन करना चाहिए। प्रासादाश्च व मेर्वाद्या लिङ्गं षट्करतः परम्। महार्था देशराष्ट्रे च सर्वतोभद्रमर्चयेत् ॥ 16 ॥ इसी प्रकार राजभवनों में, मन्दिरों में, मेरु आदि प्रासादों में तथा छह हाथ से ऊपर तक के लिङ्गों में, महा अर्थों में, देश एवं राष्ट्रों में सर्वतोभद्र वास्तुपद की अर्चना करें। अधस्तात् सर्वतोभद्राद् भद्राख्योपरि वास्तुकम्। मध्ये च द्वाविंशतिभिर्गुणिता पदकल्पना ॥ 17 ॥ सर्वतोभद्र से नीचे के समस्त वास्तुओं में भद्राख्य, वास्तु के ऊपर तक के मध्य में जो भी वास्तु है उनमें 22 से गुणा करके पदों कल्पना की गई है।