भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

सूत्र-५७ 297 पञ्चविंशतिभिः कुलं षट्त्रिंशद्भिः सुभद्रकम्। एकोनपञ्चाशत्पादैर्मरीचिगण उच्यते॥ ५॥ कुलतिलक पच्चीस पदों का और सुभद्रक छत्तीस पदों का तथा मरीचिगण उनचास पद का कहा गया है। भद्रकं तु चतुः षष्टिरेकाशीतिश्च कामदम्। शतपदैस्तु भद्राख्यं सहस्रैः सर्वतोद्भवम् ( सर्वतोभद्रकम् ) ॥ ६ ॥ भद्रक चौसठ पद का और कामद इक्यासी पद तथा सौ पद का भद्र संज्ञक और सर्वतोभद्र पदवास्तु हजार पदों का होता है। इत्यमनन्तर वास्तुस्थानमाह - पदसङ्ख्यास्तु कथिता वास्तुस्थानानि वच्म्यहम्। स्वस्तिकं पदसंस्थाने ध्रुवतः कथ्यते बुधैः ॥ ७॥ इस प्रकार उपर्युक्त प्रकार से इन वास्तुओं की पद संख्या के बारे में बताया गया। अब इन वास्तुओं के स्थानों के बारे में कहता हूँ। स्वस्तिक के पदस्थान को ध्रुवतः विद्वान लोग कहते हैं। श्रीधरं राजगेहानां हर्म्यादीनां ध्रुवं यथा। चतुष्की देवताग्रे या विद्यारम्भे तत्स्वस्तिकम् ॥ ८ ॥ श्रीधर (एक प्रकार के भवन की कोटि या माड) में, राजभवनों में, हर्म्यादि या हवेलियों में भी यही ध्रुव जैसे होता है, वैसे ही देवताओं के आगे रखी जाने वाली चतुष्की बजोट में तथा विद्यारम्भ के समय भी इसी स्वस्तिक को पदस्थान देना चाहिए। दीक्षा विविधयात्रासु कन्यालग्ने च पुष्पकम्। नन्दं प्रपूजयेद्वास्तु वनयात्रादिशोभनम् ॥ ९ ॥ दीक्षा के प्रसङ्ग में, विविध यात्राओं के प्रसङ्ग, कन्या लग्न के प्रसंग में पुष्पक का पदस्थान तथा वनयात्रादि नन्द पदस्थान की वास्तुपूजा शुभ है। लतिने रुचकादीनां मण्डपेषु गृहादिके। जगती वसुधायुक्तं षोडशाख्यं तु पूजयेत् ॥ १०॥ इसी तरह लतिन में, रुचकादि में, मण्डपों और गृहादिकों में जगती वसुधा युक्त में षोडशाख्य अर्थात् षोडश पदवास्तु की पूजा की जानी चाहिए। दक्षिणोत्तरषट्काद्यं 'शक्रध्वजऽब्जोद्भवम्।

  1. 'शक्राद्यं ? कमलोद्भवम्' इति प्रकाशित पाठः।
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक) · पृष्ठ 343, कुल 535 में से · BharatKosha