अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवास्तुक्षेत्रात्मकं सप्तपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 57 ॥ अथैकादशवास्तुपदानि । विश्वकर्मोवाच — स्वस्तिकं पुष्पकं नन्दं षोडशाक्षं चतुर्थकम्। पञ्चमं कुलतिलकं सुभद्रं षष्ठमेव च ॥ 1 ॥ सप्तमो मरीचिगणो भद्रकं स्यात्तथाष्टमम् । नवमं कामदं प्रोक्तं दशमं भद्रमुच्यते ॥ 2 ॥ सर्वतोभद्रनामाख्यमतऊर्ध्वं न कारयेत्। वास्तून्येकादशैव स्युः प्रोक्तानि परमेश्वरैः ॥ 3 ॥ (अब वास्तुपद के ग्यारह भेदों को कहा जा रहा है) (1.) स्वस्तिक, (2.) पुष्पक, (3.) नन्द, (4.) षोडशाक्ष, (5.) कुलतिलक (6.) सुभद्र, (7.) मरीचिगण, (8.) भद्रक, (9.) कामद, (10.) भद्र और (11.) सर्वतोभद्र। इन ग्यारह वास्तुपदों से ऊपर कोई पद नहीं करने चाहिए¹ क्योंकि इन्हीं एकादश वास्तुपदों को परमेश्वर द्वारा कहा गया है। पदमेकं स्वस्तिकं स्यात्पुष्पकं पञ्चतुष्टयम्। नन्दं नवपदं प्रोक्तं षोडशं षोडशपदैः ॥ 4 ॥ इनमें से स्वस्तिक एक पद का होता है। पुष्पक पाँच पद तथा नन्द नव पद का कहा है और षोडश पदवास्तु सोलह पदों का होता है।
- वास्तुशास्त्रों में मय ने बत्तीस वास्तुपदों का उल्लेख किया है। वास्तु उपयोगी पदों में क्रमशः 1. सकल पद विन्यास, 2. पेचक, 3. पीठ, 4. महापीठ, 5. उपपीठ, 6. उग्रपीठ, 7. चण्डित (स्थण्डिल का नाम), 8. मण्डूक, 9. परमशायिक, 10. आसन, 11. स्थानीय, 12. देशीय, 13. उभयचण्डित, 14. भद्र महासन, 15. पद्मगर्भ, 16. त्रियुत, 17. व्रतभोग, 18. कर्णाष्टक, 19. गणित, 20. सूर्य विशालक, 21. सुसंहित, 22. सुप्रतिकान्त, 23. विशाल, 24. विप्रगर्भ, 25. विश्वेश, 26. विपुलभोग, 27. विप्रतिकान्त,
- विशालाक्ष, 29. विप्रभक्ति, 30. विश्वेशसार, 31. ईश्वरकान्त और 32. इन्द्रकान्त पद विन्यास कहा गया है—सकलं पेचकं पीठं महापीठमतः परम्॥ उपपीठमुग्रपीठं स्थण्डिलं नाम चण्डितम्। मण्डूकपदकं चैव पदं परमशायिकम्॥ तथासनं च स्थानीयं देशीयोभयचण्डितम्। भद्रं महासनं पद्मगर्भं च त्रियुतं पदम्॥ व्रतभोगपदं चैव कर्णाष्टकपदं तथा। गणितं पादमित्युक्तं पदं सूर्यविशालकम्॥ सुसंहितपदं चैव सुप्रतीकान्तमेव च। विशालं विप्रगर्भं च विश्वेशं च ततः परम्॥ तथा विपुलभोगं च पदं विप्रतिकान्तकम्। विशालाक्षपदं चैव विप्रभक्तिकसञ्ज्ञकम्॥ पदं विश्वेशसारं च तथैवेश्वरकान्तकम्। इन्द्रकान्तपदं चैव द्वात्रिंशत् 32 कथितानि वै॥ (मयमतम् 7, 1-7) मानसार (7, 1-25), शिल्परत्न (पूर्वभाग 6, 1-7) में भी इतनी ही संख्या है। समराङ्गणसूत्रधार में 81 पद, 100 एवं 64 पदीय वास्तु का वर्णन है जो कि प्रधानभेद कहा गया है— एकाशीतिपदो यः स्यात्तथा शतपदश्च यः। चतुःषष्टिपदो यश्च वास्तुरत्नः त्रिधोदितः ॥ (समराङ्गण. 13, 1)