अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
208 अपराजितपृच्छा तो पुत्र-पौत्र की वृद्धि होती है। पूर्वे तथोत्तमं विद्यादीशाने मोक्षदायकम् । इतरासु चतुर्दिक्षु सर्वदोषसमुद्भवः ॥ 13 ॥ पूर्व की ओर से सर्वोत्तम जाने और ईशान की ओर गिरे तो मोक्षदायक मानें। इनके अलावा चारों दिशाओं में जो इतर रह जाती है, सभी प्रकार के दोषों को उत्पन्न करने वाली है। कीलकरोपणविचार - आनीय कीलकं सूत्रं रोपयेच्च चतुर्दिशम् । कीलकस्य च सूत्रस्य वर्णभेदांश्च लक्षये ॥ 14 ॥ अब कीलक के वर्ण भेद बताते हैं— पहले कीलक को लाकर स्थापित करें और उस पर चारों ओर सूत्र लपेटें। इससे कीलक और सूत्र के वर्ण भेद देखे जाते हैं। प्रशस्यन्ते ब्राह्मणानां कीला आश्वत्थकीलकाः । उदाहृता क्षत्रियाणां खादिरा रक्तचन्दनाः ॥ 15 ॥ ब्राह्मणों के लिए अश्वत्थ का कीलक प्रशस्त है और क्षत्रियों के लिए खदिर और रक्त चन्दन के कीलक शुभ हैं। शिरीषशालतालानां वैश्यजातेः प्रकीर्तिताः । सर्जकार्जुनयोस्त्वेवं शूद्राणां च सुखावहाः ॥ 16 ॥ वेश्यजनों के लिए शिरीष, शाल और ताड़ के कीलक शुभ कहे गए हैं और शूद्र समुदाय के लिए सर्जक और अर्जुन वृक्ष के कीलक सुखदायक होते हैं। कीलकस्य आयामप्रमाणं - द्वात्रिंशदङ्गुलो₃₂ विप्रे चाष्टाविंशतिः₂₈ क्षत्रिये । चतुर्विंशाङ्गुलो₂₄ वैश्ये शूद्रे विंशाङ्गुलो₂₀ भवेत् ॥ 17 ॥ अब कीलकों की लम्बाई के बारे में कहते हैं— ब्राह्मणों के लिए 32 अङ्गुल लम्बे कीकल, क्षत्रियों के लिए 28 अङ्गुल लम्बे, वैश्यों के लिए 24 अङ्गुल लम्बे और शूद्रों के लिए 20 अङ्गुल के कीलक प्रशस्त कहे गए हैं। चतुरश्रो भवेद् विप्रे चाष्टाश्रः क्षत्रिये मतः । षोडशाश्रस्तु वैश्ये स्याद् वृत्तं शूद्रे प्रकीर्तितः ॥ 18 ॥ इसी तरह ब्राह्मणों के कीलक चतुरस्र (चौकोर) हो, क्षत्रियों के कीलक अष्टाश्र (अष्टकोणीय), वेश्यों के कीलक षोडशास्र (सोलहकोणीय) हो और शूद्रों के लिए कीलक गोलाकार होने चाहिए।
२६९ सूत्र-५१ सूत्रलक्षणं — विप्रस्य दर्भजं सूत्रं मौञ्जं तु क्षत्रियस्य च। कासजं तु भवेद् वैश्ये शाणं शूद्रस्य कीर्तितम्॥ १९॥ अब सूत्र के बारे में कहते हैं— यदि ब्राह्मण हो तो उसको दर्भ या दाभ का सूत्र काम में लेना चाहिए, क्षत्रिय हो तो मूँज का, वैश्य हो तो कास अर्थात् कपास का बना हुआ तथा शूद्र हो तो शण का बना हुआ सूत्र काम में लिया जाना चाहिए। न काष्ठलोहाङ्गारैश्च नखपादैरुद्घाटनम्। शस्त्रे शस्त्रभयं विन्द्यात् सूत्रच्छेदे तु मृत्युदम्॥ २०॥ कभी भी केवल काष्ठ, केवल लोह, अङ्गारों, नखों, पाँवों, शस्त्रों और सूत्रच्छेद से भी भूमि का उद्घाटन अर्थात् खुदाई कार्य उचित नहीं है क्योंकि शस्त्र से शस्त्र भय और सूत्रच्छेद से मृत्यु की आशङ्का रहती है।¹ सूत्रपातनमाह — आलिख्य होमशालायां धर्मकामार्थसाधकम्। कृत्वा पुष्पाक्षतं पात्रे जलेरेखां समुद्धरेत्॥ २१॥ इसके बाद, नक्शे के अनुसार जहाँ होमशाला बनाने का विधान हो, उस भूभाग पर धर्म-काम आदि की साधक होमशाला के लिए निशानदेही (डाकवेल) डालकर लिख दें और पात्र में पुष्पाक्षतयुक्त जल से उसके चारों ओर जलेरेखा बना दें। बलिं दद्याद्यथान्यायं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा। आफालयेत् ततः कीलं प्रथमं वह्निगोचरम्॥ २२॥ फिर वहाँ शास्त्रीय दृष्टि अनुसार कर्म करके यथान्याय बलि प्रदान करें और प्रथम कील को अग्निकोण में गाड़ना चाहिए। नैर्ऋत्यान्ते द्वितीयं च वायव्यं तदनन्तरम्। ईशान्यां च पुनर्द्दद्यात् सूत्रं यावच्चवह्निगम्॥ २३॥ दूसरी कील को नैर्ऋत्य कोण में गाड़े और उसके बाद की कील वायव्य कोण में गाड़े और बाद में ईशान कोण में गाड़े। इस प्रकार अग्निकोण की कील से बाँधा
- इस सम्बन्ध में कई शास्त्रीय प्रमाण है। यथा— नखान् खादयेच्छिन्द्यान्न तृणं न महीं लिखेत्॥ न श्मश्रु भक्षयेल्लोष्टं न मृद्रीयाविचक्षणः। (विष्णुपुराण तृतीयांश, 12, 10-11) तुलनीय : लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः। स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च॥ (मनुस्मृति 4, 71) तथा : लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः। नित्योच्छिष्टः शङ्कुशुको नेहायुर्विन्दते महत्॥ (महाभारत शान्तिपर्व 193; अनु. 104, 15)
गया सूत्र इन सभी कीलों के चारों ओर लिपटता हुआ पुनः अग्रिकोण की कील में ले जाकर बाँध दें। गृहीत्वा मुद्गरं शिल्पी प्रहारांस्त्रीन् प्रदापयेत्। चतुर्थांशे गते कीले सा मही चोत्तमा मता॥ 24 ॥ इसके बाद, शिल्पी अपने हाथ में हथौड़ा (मुद्गर) लेकर तीनों कीलों पर प्रहार करें और परीक्षा करें कि यदि कीलें भूमि में केवल चतुर्थांश तक ही गड़ी हों तो उस भूमि को उत्तम भूमि समझें। मध्यमा स्यात्त्रिभागेन कनिष्ठार्धेन च स्मृता। अत ऊर्ध्वं गते कीले विद्यान्न शिवमालयम्॥ 25 ॥ यदि कीलें तीसरे भाग तक गड़ गई हों, तो उस भूमि को मध्यमा समझें तथा यदि कील आधे तक गड़ गई हो, तो उस भूमि को कनिष्ठा समझें और आधे से ऊपर तक यदि कील भूमि में गड़ जाए तो समझ लें कि वहाँ भूमि शिवालय के निर्माण योग्य नहीं है। हन्यमानो यदा कीलो नमितः कां दिशां प्रति। तन्माहात्म्यमथाख्यास्ये नमिते कीलके फलम्॥ 26 ॥ प्राच्यां स्यादर्थसम्पत्तिः सन्तापो ह्यग्निगोचरे। दक्षिणे विपुला भोगा नैर्ऋत्ये कलहः सदा ॥ 27 ॥ अब हम कील को प्रहार करते समय वह जिस दिशा की ओर झुक जाए तो उसका फल बताते हैं और उसके नमित होने या झुक जाने का माहात्म्य भी बताते हैं। यदि कील पूर्व दिशा की ओर झुक जाय तो अर्थ, धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है परन्तु कील यदि अग्रिकोण की ओर नमित हो जाए तो सन्ताप का कारण बनती है। वही कील यदि दक्षिण की ओर नमित हो जाए तो शुभ है और विपुल भोगों की देने वाली सिद्ध होती है परन्तु, नैर्ऋत्य कोण की ओर नमित कील से तो महान कलह सदा ही बना रहता है। वारुण्यां धनधान्यं च वायव्यां स्त्रीप्रदूषणम्। उत्तरे सर्वभद्राणि हीशाने मरणं ध्रुवम्॥ 28 ॥ इसी प्रकार यदि कील वारुणी (पश्चिम) दिशा की ओर नमित हो जाए तो धन-धान्य का भरपूर लाभ देती है परन्तु यदि कील वायव्य कोण की ओर नमित हो जाए तो समझो कि घर की स्त्रियों में दूषण अर्थात् दुराचार होने का भय उत्पन्न होगा। इसी तरह उत्तर दिशा की ओर यदि कील नमित हो जाए तो सभी ओर से
सूत्र-५२ 271 लाभ और शुभ की ही सम्भावना रहती है और यदि कील ईशान कोण की ओर नमित हो जाए तो निश्चित ही मृत्यु की आशङ्का बन जाएगी। प्राञ्जलः सिद्धिदः प्रोक्तोऽन्यथा चैवमसिद्धिदः । भग्नश्च मृत्युदः प्रोक्तः कीलकस्य महात्म्यकम् ॥ २९ ॥ यदि कील प्रहार के साथ ही सरलता से भूमि में गड़ जाए तो वह सिद्धि देने वाली होती है, अन्यथा वह सिद्धि देने वाली नहीं कही जाती। इसी तरह यदि कील हथौड़े से प्रहार के समय भूमि में गड़ने के समय टूट जाए तो उसको अवश्य ही मृत्युदायक कष्टपूर्ण समझें। इस तरह यहाँ मैंने कीलक के माहात्म्य को बताया है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां भूपरिग्रहकीलकारोपणाधिकारो नामैकपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५१ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भू परिग्रह, कीलक आरोपण अधिकार नामक इकावनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥ कूर्मप्रमाणपदप्रतिष्ठा नाम द्विपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५२ ॥ विश्वकर्मोवाच – शस्ते मासे सिते पक्षे ह्यतीते चोत्तरायणे। ताराचन्द्रबले चैव योगे चामृतसम्भवे ॥ १ ॥ सूत्रपातस्तु कर्त्तव्यः प्राची साध्या ततो भवेत्। विश्वकर्मा ने कहा कि शुभ माह में, शुक्ल पक्ष हों और उत्तरायण का अतीत हो चुका हो, उस समय ताराबल और चन्द्रबल देखकर और अमृतयोग आने पर कार्य का सूत्रपात करना चाहिए। ऐसा करते समय प्राची-दिक्साधन का अवश्य ध्यान रखना चाहिए। दिग्मूढनिषेधमाह – चतुरश्रं समं कृत्वा दिग्मूढं परिवर्जयेत् ॥ २ ॥ पूर्वपश्चिमदिग्मूढं वास्तु स्त्रीनाशकं स्मृतम्। दक्षिणोत्तरदिग्मूढं सर्वनाशकरं भवेत् ॥ ३ ॥ भूमि के चतुरस्र बनाते समय कभी दिग्मूढ़, दिशाओं में भूल न आने देना चाहिए। जो वास्तु पूर्व-पश्चिम दिशा में दिग्मूढ़ होता है अर्थात् गलत दिक्साधनयुक्त होता है, उसका फल स्त्रीजन के नाश का कारण बनता है। इसी तरह दक्षिण-उत्तर में जो वास्तु दिग्मूढ़ हो, वह भी सर्व नाशकारक होता है।
272 अपराजितपृच्छा विसूत्रं च भवेत्तच्चेत् सूत्रसन्तापकारकम्। प्रासादस्य प्रमाणेन सूत्रैः क्षेत्रं प्रसाधयेत् ॥ ४ ॥ प्रासादे भित्तिसंयुक्तो गृहे भित्तिस्तु बाह्यतः। कर्त्तव्यो मण्डपैर्युक्तो जगत्यायाम एव च ॥ ५ ॥ और जो वास्तु विसूत्र हो, सीधवत सूत्र में न होकर टेढ़ा-मेढ़ा हो, वह सूत्रधार को सन्तापकारक होता है। अतः प्रासाद, मन्दिर के प्रमाणानुसार ही सूत्रधारों को उस भूमि क्षेत्र की ठीक-ठीक साधना चाहिए। यह ध्यान रहे कि प्रासाद, मन्दिरों में भित्ति से संयत अर्थात् भित्ति के नाप के साथ ही मण्डप का नाप और जगती, पीठिका का नाप होता है, परन्तु मकानों, भवनों में भित्ति के नाप के बाहर मण्डप का नाप और जगती पीठ का नाप होता है। अथ जीर्णप्रासादलक्षणं — अथाख्यास्ये पुनश्चान्यद् जीर्णप्रासादलक्षणम्। भग्नं द्रव्यादिकं वापि उद्धारेऽष्टगुणं फलम् ॥ ६ ॥ अब हम पुनः दूसरे जीर्ण प्रासादों के लक्षण कहते हैं जिनके द्रव्यादिक अङ्ग- उपाङ्ग भग्न हो गए हो, उनका पुनः उद्धार करने अर्थात् जीर्णोद्धार करके पुनः नवीन करने का फल नवीन निर्माण किए गए से आठ गुणा अधिक पुण्य होता है। पूर्वमानप्रमाणं च कारयेत्तद्विचक्षणः। तद्रूपं तत्प्रमाणं च पूर्वसूत्रं च चालयेत् ॥ ७ ॥ जिन-जिन भग्न वस्तुओं का जीर्णोद्धार किया जाए, उनमें विचक्षण सूत्रधार या गजधर को चाहिए कि उन वास्तुओं का पहले का मान-प्रमाण नींव-सीम से वैसा ही सही रखें, उन्हे तद्रूप और तत्प्रमाण रखते हुए पूर्व के सूत्र में, सूत-सावल में अन्तर नहीं आने दें। चलिते चालिते वापि दिङ्मूढे स्थानवास्तुषु। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूर्वसूत्रं च चालयेत् ॥ ८ ॥ चलिते चालिते चैव सूत्रस्थाने च विग्रहम्। हीने हानिं प्रकुर्वीत चाधिके स्वजनक्षयम् ॥ ९ ॥ क्योंकि, सूत्र प्रमाण में न्यूनाधिकता, हेर-फेर से उस सूत्रस्थान में विग्रह खड़े हो जाते हैं, जैसे कम रखने पर हानि होती है और वेशी रखने पर अपने ही परिवार जनों का क्षय होता है।
सूत्र-५२ 273 भूपरिग्रहणे चैव वास्तुविद्याविशारदैः। वास्तुस्थानं पुरा ज्ञात्वा खनेच्चैवं प्रदक्षिणम्॥ 10 ॥ भूमि का परिग्रहण करते समय भी सभी वास्तुविद्या विशारद सूत्रधार, गजधरों को चाहिए कि वे उस वास्तु-स्थान की पहले की पुरानी जानकारी अच्छी तरह कर लें, उसके बाद ही उसकी प्रदक्षिणा करके खुदाई आरम्भ करें। मर्मवेधविचार – पिता माता च पुत्राश्च नाशं गच्छन्ति मस्तकै। पृष्ठे चात्मविनाशश्च देशत्यागश्च जायते॥ 11 ॥ क्योंकि, यदि पुरानी जानकारी न की जाए और उस वास्तु-स्थान में मर्मवेध रह जाए तो बड़ा अनर्थ हो जाता है। जैसे— मस्तक की ओर मर्मवेध रह जाए तो उस गृहपति के माता-पिता व पुत्रों का नाश हो जाता है तथा यदि पीठ की ओर मर्मवेध रह जाए तो स्वयं गृहस्वामी का ही नाश हो जाता है अथवा उसे देश त्याग करके जाना पड़ सकता है। स्त्रीस्वगोत्रविनाशश्च चतुःपादेषु वै क्रमात्। जायते धननाशश्च मर्मवेधे कृते सति॥ 12 ॥ और, इसी क्रम में स्त्री, स्वगोत्र बन्धुजन, चौपायों और धन का भी विनाश हो जाता है— यदि मर्म वेध बने रहे तो ऐसा फल जाने। शुभं पुत्रो धनं धान्यं ज्ञात्वा कुक्षिं यदा खनेत्। कृत्वा प्रदक्षिणं कुम्भं गृहीत्वा स्थापितं ततः॥ 13 ॥ कुक्षिं चातोदकैर्भृत्वा शान्तिमुच्चार्यशोभनाम्। तथोदकैर्वन्दनीयं वास्तुदेवं विसर्जयेत्॥ 14 ॥ इसलिए यदि पुत्र, धन, धान्यादि के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाकर शुभ, मङ्गल जान लिया जाए तभी नींव-कुक्षी को खोदना चाहिए। इसके लिए हाथ में कुम्भ लेकर उस स्थान की प्रदक्षिणा करके उस कुम्भ को उस स्थान पर स्थापित करें। तदोपरान्त नींव की खुदाई को कुम्भ के जल से भरकर, बड़े प्रेम से शान्तिपाठ का उच्चारण करें और इस प्रकार जल को वन्दन करके वास्तुदेव का विसर्जन करें। विदिक्षु दिक्षु खातानि प्राच्यादिषु प्रदक्षिणम्। तथा घटोदकैर्भृत्वा वन्दयेच्छान्तिपाठकैः॥ 15 ॥ इत्यन्तं तु समुद्दिष्टं वास्तुस्थानविसर्जनम्। इसी तरह विदिशाओं और दिशाओं के नींवों के खात को भी पूर्व दिशा से
274 अपराजितपृच्छा प्रारम्भ करते हुए प्रदक्षिण क्रम से आगे करते जाए और घड़ों में जल भर-भरकर शान्ति पाठ के साथ वन्दन करते जाए। इस प्रकार वास्तुस्थान का विसर्जन बताया गया है। खात्पूर्वकशल्यादीनोद्धारनिर्देशं — शिलान्तं वा जलान्तं वा खात्वा शल्यं समुद्धरेत् ॥ 16 ॥ नींव की खुदाई करते समय ध्यान रखें कि उसकी खुदाई करते-करते या तो नीचे नींव में कठोर शिला आ जाए अथवा खुदाई करते भूमि में जल का स्रोत आ जाए, वहाँ तक उसे खोदते जाए। खोदते समय जो भी शल्य (अस्थि, केश, कोयला आदि) मिलते जाएँ उन्हें भी निकालते जाना चाहिए। जलान्तेषु यदा खातो गोविप्रौदक ? पालनम्। वास्तु पूजां ततः कृत्वा मध्ये कूर्मं तु स्थापयेत् ॥ 17 ॥ अब नींव के खात की भराई के बारे में कहा जा रहा है। जो नींव की खुदाई जलान्त अर्थात जल आ जाने तक की गई हो, वह उत्तम होती है और गो, ब्राह्मण को पालने वाली कही गई है। अस्तु, वास्तुपूजा करके उसके मध्य में कूर्म की स्थापना करनी चाहिए। तत्र कूर्मलक्षणं — हिरण्मयो भवेत्कूर्मो वास्तुविस्तारधारणः। उरोरत्नैर्नेत्ररत्नैः पृष्ठरत्नैश्च शोभितः ॥ 18 ॥ समुपेतैः सर्वगात्रै रौप्यपादोपशोभितः। एवं वै सूत्रितं सर्व रत्नकाञ्चनरूप्यकम् ॥ 19 ॥ तत्रैव स्थापिताः सूत्र पर्वता द्वीपसागराः। शिलाभिरिष्टिकाभिश्च ततः खातं प्रपूरयेत् ॥ 20 ॥ वह कूर्म सोने का बना हो। वह वास्तु के पूरे विस्तार को धारण करने वाला होता है। उस कूर्म की छाती पर, नेत्र पर, पीठ पर रत्न जड़े हुए शोभायुक्त हों। इसी तरह वे बताए गए सभी रत्नों से, सोने से और चाँदी से बने हुए पर्वत, सागर द्वीपादि भी वहाँ सूत्रधार, गजधर के द्वारा ठीक तरह से स्थापित किए जाने चाहिए। इस सबके बाद ही शिलाओं से और ईंटों से उस खात की भराई आरम्भ की जानी चाहिए। इष्टकाचयनं कृत्वा पूरयेच्च स्तरं स्तरम्। कपिशीर्षे च पाषाणे मृगश्श्राष्टाङ्गुला दहेत् ॥ 21 ॥
सूत्र-५२ 275 इस तरह नींव के खात मुहूर्त की समारोह पूर्वक भराई हो जाने पर जब नींव की ईंटों से चुनाई की जाए तो ध्यान रखें कि भित्ति की चुनाई की पूर्ति स्तरवार हो अर्थात् पूरी नींव की एक स्तर चुनाई हो जाए। उसके बाद ही उसके ऊपर के दूसरे स्तर की चुनाई करनी चाहिए। इस चुनाई कार्य में काम आने वाले पाषाणों का आकार कपिशीर्ष के समान (बन्दर के कपाल के बराबर) टुकड़ों में होना चाहिए और इनकी चुनाई करते समय जिस मिट्टी में इनकी चुनाई की जाए, उसका स्तर भी लगभग आठ अङ्गुल का हो और उस मिट्टी में ये पाषाण पूरी तरह से गच्छ करके चुने जाएँ ताकि कहीं से भी खाली स्थान नहीं रहे और वे पाषाण हिले-डुले नहीं। जलेन प्लावितास्ताश्च मुहूरस्या हनेत्ततः। पालाशस्वस्थसम्भूतैर्हनेत्ताः सुदृढं ततः ॥ २२ ॥ फिर, चुनी गई दीवार पर किनारी बनाकर उस पर जल भर दें ताकि दीवार पूरी तरह से तर रहे और बाद में उसे ठोस रूप देने के लिए मोहरी, घूँसे से कूटते जाए और इसके उपरान्त उस दीवार को पलाश (खाखरे) की स्वस्थ, हरी-भरी शाखाओं कामड़ियों से तड़ा-तड़ पीट-पीटकर सुदृढ़ बनाएँ। पादोनं पूरयेत्प्रान्तं तत्घनं च प्रदायिकम् ?। ह्रस्वं ह्रस्वं तु कर्तव्यं प्रासादस्य तलं तथा ॥ २३ ॥ प्रासाद के नींव के प्रान्त भाग को एक चतुर्थांश पूरा हो जाने पर उसे घन के द्वारा धीरे-धीरे कूटते जाना चाहिए जिससे प्रासाद का तल भाग पक्का, दृढ हो जाए। इत्यमनन्तर प्रासादस्य कूर्मलक्षणं — एक हस्ते तु प्रासादे कूर्मः स्याच्चतुरङ्गुलः। अर्धाङ्गुला भवेद्वृद्धिः प्रतिहस्तं दशावधि ॥ २४ ॥ (अब प्रासाद की नींव रचना के समय रखे जाने वाले कूर्म के बारे में पूरी जानकारी दी जा रही है) इस नियम को सदा ही ध्यान में रखें कि यदि प्रासाद की ऊँचाई 1 हाथ की अर्थात् एक गज (चौबीस अङ्गुल) हो, तो उसके प्रमाणानुसार कूर्म का आकार 4 अङ्गुल का होना चाहिए। इसके उपरान्त ज्यों-ज्यों प्रासाद की ऊँचाई की वृद्धि होती जाए, तो दश हाथ (दस गज) की वृद्धि तक प्रति हाथ (प्रति गज) के प्रमाण में कूर्म का प्रमाण भी आधा अङ्गुल बढ़ाते जाएँ। इस तरह एक हाथ से दस हाथ तक बढ़ते कूर्म का प्रमाण 4 अङ्गुल के बाद और साढ़े चार अङ्गुल बढ़ जाएगा अर्थात् दस हाथ के प्रासाद का कूर्म साढ़े आठ अङ्गुल का हो जाएगा।
276 अपराजितपृच्छा पादवृद्धिः पुनः कुर्याद्विंशतिहस्ततः करे। ऊर्ध्वं वै त्रिंशद्धस्तान्तं वसुहस्तैकमङ्गुलम् ॥ २५ ॥ इसके बाद, प्रासाद की ऊँचाई 11 से 20 हाथ (गज) तक बढ़ती जाए तो कूर्म का प्रमाण प्रति गज चतुर्थांश अङ्गुल की वृद्धि पाता जाए अर्थात् अगले दस हाथ, गज की ऊँचाई प्रासाद की बढ़ने पर कूर्म के प्रमाण में ढाई अङ्गुल और जुड़ जाएँगे और कूर्म का प्रमाण साढ़े आठ से बढ़कर 11 अङ्गुल हो जाएगा और 20 हाथ (गज) से 30 हाथ (गज) तक प्रासाद के बढ़ने तक हर आठवें गज पर एक अङ्गुल प्रमाण कूर्म में वृद्धि होगी। ततः परं शतार्द्धान्तं सूर्यहस्तैकमङ्गुलम्। अनेन क्रमयोगेन मन्वङ्गुलं₁₄ शतार्धके ॥ २६ ॥ इससे भी ऊपर, यदि प्रासाद 31 हाथ से 50 हाथ (गज) की ऊँचाई तक बढ़े तो कूर्म का प्रमाण प्रति 12 हाथ (गज) पर मात्र एक अङ्गुल प्रमाण ही बढ़ेगा। एक तरह से इस क्रम योग से 50 हाथ तक के प्रासाद के लिए कूर्म का प्रमाण 14 अङ्गुल का होगा। कनिष्ठादित्रिविधकूर्मप्रमाणं — कनिष्ठं पादहीनं च ज्येष्ठं पादाधिकं तथा। साधारणमिदं मानं त्रिविधं कूर्ममानतः ॥ २७ ॥ इस तरह कूर्म के मान-प्रमाण को देखें तो 14 अङ्गुल में चतुर्थांश अङ्गुल की कमी वाला कूर्म कनिष्ठ माना जाएगा, 14 अङ्गुल से एक चतुर्थांश अङ्गुल अधिक वाला कूर्म ज्येष्ठ माना जाएगा और 14 अङ्गुलमान का कूर्म प्रमाण साधारण माना जाएगा। इस तरह कूर्म का यह तीन तरह का मान प्रमाण बताया गया है। धात्वानुसारेंणकूर्मफलं — हैमो रौप्यश्च कर्त्तव्यः सर्वपापप्रणाशनः। इत्थं कूर्म यः करोति सर्वयज्ञफलं भजेत् ॥ २८ ॥ अब विविध धातुओं से बनने वाले कूर्मों के फल बताते है। सोने और चाँदी से बने हुए कूर्म सभी प्रकार के कोपों का शमन करते हैं। जो व्यक्ति ऐसे सोने-चाँदी के कूर्म बनवाते हैं, उनको सभी प्रकार के यज्ञों का फल मिल जाता है। स्नानं पञ्चामृतैः कार्यं कूर्मस्य च यथाविधि। अर्चयित्वा प्रयत्नेन धूपयित्वा सुगन्धिना ॥ २९ ॥
सूत्र-५३ 277 तिलैर्यवैस्तथा होमं कुर्यात् पूर्णाहूतिं तथा। निवेशयेदिमं कूर्मं वेद-वादित्र-मङ्गलैः ॥ ३० ॥ ऐसे बने हुए कूर्म को यथाविधि पञ्चामृतादि से स्नान कराएँ और प्रयत्नपूर्वक अर्चना करके सुगन्धित द्रव्यों से धूप दें। फिर, तिलों से, यवों से होम करके बाजे- गाजे के साथ वेदपाठ (स्वस्तिवाचन¹), मङ्गलगान करते हुए पूर्णाहूति देने के साथ ही कूर्म को भी वहाँ निवेश करवाना चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां कूर्मप्रमाणपदप्रतिष्ठाधिकारो नाम द्विपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५२ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में कूर्मप्रमाण पद प्रतिष्ठा अधिकार नामक बावनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥ देवासुरसङ्ग्रामादिवास्तूद्भवो नाम त्रिपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५३ ॥ अथ पुराख्यानं कथ्यते — गन्धमादनपृष्ठेऽथ शैलराजमहोत्सवे । सुरविद्याधरै रम्भे ऋषिसङ्घसमाकुले ॥ १ ॥ सिद्धचारणसङ्गीते ह्यप्सरोगणसेविते । दिग्विदिग्वासिभीरम्ये सरिताद्वयसङ्गमे ॥ २ ॥ पूर्वकाल में गन्धमादन पर्वत पर देवताओं, विद्याधरों तथा ऋषि सङ्घों की भीड़-भाड़ में आयोजित होने वाले सुन्दर 'शैलराज महोत्सव' में सिद्ध चारणों के सङ्गीत और अप्सराओं के नृत्य-गान से सेवित दिग्दिगन्त के निवासी वहाँ प्रवहमान
- मयादि शास्त्रों में भी भूपरिग्रहावसर पर वेदपाठ या स्वस्तिवाचन करते हुए मङ्गल स्वरोच्चार करने पर जोर दिया है। भूमिपूजन के लिए शास्त्रों में निम्न मन्त्र आता है— समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पुण्यकर्म समारभे ॥ स्वस्तिवाचन वैदिक परम्परा है। अनेकत्र स्वस्त्ययन का निर्देश मिलता है। यह पाठ इस प्रकार किया जाना चाहिए— 'ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्ताक्ष्यों अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः। अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निहः ॥ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायूः ॥ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्। पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥ अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वे देवा अदितिः पञ्च जना अदितर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षꣳ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्ति। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्ति सर्वꣳ शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥ यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु। नं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥' सुशान्तिर्भवतु ॥ (यजु. वाजसनेयी. 25,6-12)
278 अपराजितपृच्छा सुन्दर, दोनों सरिताओं के सङ्गम स्थान में एकत्र हुए थे। तत्रस्थं च सुखासीनं विश्वकर्ममहीजसम्। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ ३ ॥ शिरसा प्रणिपत्याथ जानुभ्यां धरणीगतः । दण्डवच्चाग्रतो भूत्वा पप्रच्छ त्वपराजितः ॥ ४ ॥ उसी काल में वहाँ पर वेद वेदाङ्ग के तत्त्व को जानने वाले और सभी शास्त्रों के विशारद महान् तेजस्वी भगवान् विश्वकर्मा सुख से विराजमान थे। उनको अपराजित ने दण्डवत प्रणाम किया, धरती पर अपने घुटने टेककर प्राणपत्य होकर, सिर झुकाकर प्रणिपात् होकर प्रश्न किया। अपराजित उवाच – कथं वास्तु समुत्पन्नं निर्मितं वा कुतः कदा। वास्तोरुत्पत्तिस्तात देवादेश्च निघण्डुकम् ॥ ५ ॥ एकपादादिकं वास्तु यावत्पदसहस्रगम्। मर्मोपमर्मवंशांश्च रेखासन्धिसुरादिकम् ॥ ६ ॥ अपराजित बोले— हे तात! यह वास्तु कैसे समुत्पन्न हुआ, कब और कहाँ निर्मित हुआ, वास्तु की उत्पत्ति, उसके सम्बन्धित निघण्टु (कोश) आदि के बारे में हे देव! आदि से बताएँ। एकपद से आरम्भ होकर जब तक एकसहस्र पद तक जाएँ उतने वास्तु के पद, मर्म, वंश, रेखा, सन्धि और सुरादिकों के विषय में भी कहें। बलिकर्मविधिं चैव वास्तुपादनिवासिनाम्। एतत्सर्वं प्रयत्नेन कथयस्व जगत्पते ॥ ७ ॥ हे जगत्पते ! इसी प्रकार बलिकर्म विधि, वास्तु पदानुसार विन्यसित होने वाले सभी दैवतगणों के बारे में भी प्रयत्नपूर्वक मुझ पर कृपा करके कहिए। देवासुरमहाघोरसङ्ग्रामवर्णनं विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स महाप्राज्ञ यत्त्वया परिपृच्छितम्। कथयामि न सन्देहो वास्तोरुत्पत्तिलक्षणम् ॥ ८ ॥ विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! महाप्राज्ञ जो कुछ तुमने पूछा है उसे कहता हूँ जिसे सुनो जिससे वास्तु की उत्पत्ति के लक्षणों के बारे में कोई सन्देह न रहे। पूर्वं देवासुरे युद्धे महाघोरे सुदारुणे। सङ्घट्टे नरसङ्कीर्णे श्रोणीगात्रेः परस्परम् ॥ ९ ॥
सूत्र-५३ 279 पूर्वकाल की बात है। महाघोर व सुदारुण रूप देव और असुरों में युद्ध छिड़ा। वहाँ मनुष्यों के बड़े-बड़े सङ्घट्टों की भीड़-भाड़ हुई जिसमें सभी परस्पर युद्ध में रत होने से अपने शरीरों को रक्त से लथपथ किए हुए थे। महारौद्रैः कटाक्षैश्च शस्त्रघातैः परस्परम्। महाबलोत्कटा वीराः सङ्ग्रामे हेतिकाङ्क्षिणः ॥ 10 ॥ वे महान् रौद्र रूप में, कटाक्षपूर्वक एक दूसरे पर बारम्बार शस्त्राघात कर रहे थे। वे महान् उत्कट वीर थे और संग्राम में एक दूसरे को जीतने की आकांक्षा लिए हुए थे। निर्जिताश्च ततो देवा दैत्येन्द्राः प्रबलाः स्थिताः। तथा किलकिलायन्ति पूर्वदेवात्मसम्भवाः ॥ 11 ॥ उस युद्ध में दैत्येन्द्रगण प्रबल पड़ते थे और देवतागण हार गये थे। पूर्वदेवा अर्थात् दैत्यगण अपनी जीत की खुशी में किल-किली मारते हुए उछल रहे थे। भूमिकम्पं प्रकुर्वन्ति ह्यचाल्याः पर्वता इव। अनन्तरं सुरा इन्द्रो मन्त्रयित्वा परस्परम् ॥ 12 ॥ इससे इतना भूमिकम्प हुआ कि मानो पर्वत ही चलायमान हो गए हैं। इसके बाद, देवराज इन्द्र ने देवताओं को आमन्त्रित किया और परस्पर विचार-विनिमय किया। ततः स्मृत्वात्मशक्तीश्च ज्ञानदेहसमुद्भवाः। त्रयस्त्रिंशत्कोटयश्च सुरास्ते च महोत्कटाः ॥ 13 ॥ इन्द्र ने यह कहकर उन सभी देवताओं में बड़े उत्साह से उनमें अपनी ज्ञान देह से समुद्भव होने वाली आत्मशक्ति की स्मृति जगाई कि 'हे देवगणो! यह न भूलो कि तुम तैंतीस कोटि संख्या के महोत्कट योद्धा हो जिस पर सुरों को गर्व है। पुनरायेज्यसङ्ग्रामं दैत्येन्द्रैश्च परस्परम्। सकोपाश्चैव सङ्ग्रामे सुरासुरमहोत्कटाः ॥ 14 ॥ इसलिए निराश मत हो वो और पुनः संग्राम का आयोजन करें।' और, दैत्येन्द्रों से परस्पर सकोप संग्राम करके सभी सुर-असुर इस महोत्कट युद्ध में कूद पड़े। निर्जिता असुरा युद्धे देवाश्च प्रबलाः स्थिताः। तदाव्याप धरास्वेवं सुरराज्यं महोत्सवम् ॥ 15 ॥ इस तरह उत्साहवर्धन से देवताओं की स्थिति प्रबलतर हो गई और असुरगण उस युद्ध में हार गए। तभी से इस धरा पर यह 'सुरराज्य महोत्सव' गन्धमादन पर्वत पर मनाया जाता रहा है।
280 अपराजितपृच्छा शैलेन्द्रात् दैत्येन्द्रागमनं — अनन्तरं महाभूता दैत्याश्चैव महोत्कटाः । (अ)वतरिताः शैलेन्द्रेषु दैत्येन्द्राश्च महोत्कटाः ॥ 16 ॥ इसके अनन्तर, महाभूता विशालकाय प्राणियों के रूप में महान्, उत्कट विकराल दैत्यगण उस पर्वतराज शैलेन्द्र से अवतरित होकर महोत्कट दैत्येन्द्र आए। शैलरूपैश्च सम्भूय सपक्षाः क्रोधपर्वताः । तथा पतन्त्युत्पतन्ति यत्र भूर्जनसङ्कुला ॥ 17 ॥ वह सभी पहाड़ों के रूप धारण किए हुए थे और उनके पङ्ख थे जिनसे ये पर्वत क्रोध करके उड़ते रहते और जहाँ कहीं भी भूमि पर लोगों की भीड़ या समूह होता उन पर बार-बार घड़ाघड़ गिर पड़ते। निर्दहन्ति धराधार्य खेटग्रामपुरादिकम्। नरोरगसुरेन्द्राश्च पर्वतैर्भस्मसात्कृताः ॥ 18 ॥ और, इस तरह भूमि का आधार ही आग से जला देते जिससे खेट, ग्राम, पुर आदि सभी आ जाते और उन स्थानों में रहने वाले नर, उरग और सुरेन्द्र आदि उन पर्वतों से चकनाचूर हो जाते और भस्मसात् हो जाते। ततो देवादिकाः सर्वे मरुत्वत्पुरमाश्रिताः । व्यज्ञापयन् सहस्त्राक्षं धराधरविनाशिनम् ॥ 19 ॥ इससे समस्त देवादिकों ने मरुतवत पुरमाश्रित होकर अर्थात् हवा की-सी शीघ्रता का आश्रय लेकर हजार आँखों वाले इन्द्रदेव को जाकर निवेदन किया कि ये धराधर अर्थात् पहाड़ विनाश करने पर उतारु हो गए हैं, उनसे हमें प्राण दिलाएँ। क्रोधादिन्द्रेण वज्रेण स्थापिता भुवि पर्वताः । छेदिताश्च ततः पक्षा अचला यत्र संस्थिताः ॥ 20 ॥ इन्द्र ने क्रोधावेश में आकर इन पर्वतों पर वज्र से प्रहार किया और उनके पङ्खों को काट गिराया जिससे वे इधर-उधर उड़कर उत्पात नहीं मचा सके और उन्हें जहाँ के तहाँ अचल होकर रहना पड़ा।¹ गङ्गायमुनयोर्मध्ये प्रारब्धो यज्ञ उत्तमः । निर्जिताश्च सुरैर्यज्ञरक्षा वज्रायुधैः कृता ॥ 21 ॥
- इन्द्र द्वारा पर्वतों का संहार करने का वर्णन ऋग्वेद और श्रीमद्भागवतपुराण में आया है। देवराज इन्द्र का नाम शक्र इसलिए पड़ा।
सूत्र-५३ 281 पर्वतों के पङ्ख काटकर उन्हें अचल करने का यह यज्ञ गङ्गा-यमुना नदियों के मध्य के भूभाग में आरम्भ हुआ था¹ जिसमें वज्रायुध के प्रयोग से सुरों ने यज्ञ की रक्षा की और दैत्यों को जीता। असुराश्च ततः सर्वे चिन्तातुरतया स्थिताः । नैर्ऋत्ये कुण्डसम्भूतं ²भार्गवोरुशक्त्यात्मकम् ॥ २२ ॥ दैत्यों और असुरगण भी सभी चिन्तातुर होकर नैर्ऋत्य कुण्ड से सम्भूत होने वाले उशना पुत्र भार्गव की शरण में गए। दुर्जयं दुर्निरीक्ष्यं च महोघोरं सुदारुणम्। स्फुरन्तं विद्रुमाकारं लोचनैरग्निसन्निभैः ॥ २३ ॥ उन असुरों की पुकार और दुर्जय दुर्निरीक्षा अर्थात् देवताओं को जीतना कठिन देखकर भार्गव को महाघोर क्रोधावेश हुआ। वह महादारूण, भयानक रूप में फुफकारने लगे और अपनी आँखों में क्रोधाग्नि से मानो लाल चिनगारियाँ-सी निकालने में लगे। हुताशनगर्भसम्भूतं प्रलयान्तसमप्रभम् । स्फुरत्स्फुलिङ्गं ज्वलन्तं दुर्निरीक्ष्यं भयप्रदम् ॥ २४ ॥ उस समय उनका यह भयप्रद रूप ऐसा लग रहा था मानो अग्नि के गर्भ से ही प्रलयाग्नि के समान प्रभावाली जलती मशाल से उठती हुई स्फुलिंगों, चिनगारियाँ को देखना भयभीत होने का कारण बनता है। त्रिनेत्रं विकृतं रौद्रं जटिलं वाललोहितम्। दंष्ट्राकरालमत्युग्रं मुखे दावाग्निसन्निभम् ॥ २५ ॥ उस समय भार्गव का विकराल रूप, त्रिनेत्र, संहारक शिव के त्रिनेत्रों के समान रौद्र और जटिल तेज लाल वर्ण वाला होकर अति उग्र कराल दाँतों-दाढ़ों वाला था और मुख से दावाग्नि की ज्वालाएँ निकलती थीं। कृतान्ततुल्यं दशनैश्चण्डोष्ठकपुटान्तरे। भूतलान्ते तलं तस्य आलोके बाहुपञ्जरम् ॥ २६ ॥ उनके दाँत यमराज की दाढ़ों की भाँति भयानक थे जो होठों की विशालता में और भी भयानक लग रहे थे। उनकी काया इतनी विशाल हो गई थी कि उनके पाँव
- गङ्गा-यमुना के मध्य में यज्ञ होने की अवधारणा शतपथ ब्राह्मण सम्मत है। कभी इस क्षेत्र में बहुत-से पेड़ थे जिनका संहारकर भूमि को यज्ञकर्म योग्य बनाया गया था।
- 'भार्गवा रूशनात्मकं' पाठ स्यात्। 'भागीवेषु शक्त्यात्मकम्' मिति 'न' पाठः।
८७८ अपराजितपृच्छा के तलवे भूमि के पाताल तक और उनके हाथों और शरीर का पञ्जर आसमान को स्पर्श करता-सा लग रहा था, जो तीनों लोकों तक फैल गया। स्कन्धग्रीवाकरा व्योम्नि ब्रह्माण्डे च गतं शिरः । तेजोरूपं स्फुरन्तं च प्रलये भैरवं यथा ॥ २७ ॥ उनका कन्धा, ग्रीवा और हाथ आसमान को छू रहे थे और उनका सिर ब्रह्माण्ड की ऊँचाई तक जा लगा था और उनका तेजोमय रूप ऐसा विकराल चमक रहा था जैसे प्रलयकाल में भैरव का विकराल तेजोमय रूप हो। निनदन्तं महाभीमं मन्ये कल्पान्तगर्जितम् । त्रस्तास्तु देवताः सर्वा रूपं दृष्ट्वा सुदारुणम् ॥ २८ ॥ उनकी आवाज इतनी घोर निनादयुक्त थी मानो महाभीम कल्पान्त की गर्जना हो रही हो। इस तरह का बहुत दारुण रूप देखकर भार्गव से सभी देवता त्रस्त या भयभीत हो गए थे। ध्यानयुक्ताश्च चलिताः भयभीता महोरगाः । दिक्पाला लोकपालाश्च प्रणश्यन्ति महासुराः ॥ २९ ॥ जो सदा ध्यान युक्त रहते थे, वे भी इस भय से विचलित हो गए थे और जो महान् उरग थे वे भी भयभीत थे। दिक्पालगण, लोकपालगण आदि समस्त महान् सुर देवता भय से मरणासन्न थे। ब्रह्मराक्षसवैताला आश्रयन्ति महेश्वरम् । आदित्याद्या ग्रहाः सर्वे आश्रयन्ति जनार्दनम् ॥ ३० ॥ इस बीच, ब्रह्मराक्षस और वैतालादि भय के मारे भगवान शिव के आश्रय में जा बैठे और आदित्यादि सभी ग्रह भी भयातुर होकर जनार्दन भगवान् विष्णु की शरण में चले गए। देवराजः सुरैर्युक्तः समुपास्ते जगत्पतिम् । दुर्निरीक्ष्यं दुराराध्यं कालानलसमप्रभम् ॥ ३१ ॥ तं दृष्ट्वादूतरूपं च विरञ्चिरपि विस्मितः । इसी प्रकार देवराज इन्द्र भी सभी देवताओं के साथ जगत्पिता ब्रह्मा की पर्युपासना में लग गए। ऐसे दुर्निरीक्ष्य भयानक और दुराराध्य महाकालाग्नि के समान, अद्भुत रूप को देखकर विरञ्चि भगवान् ब्रह्मा भी विस्मित हो गए थे। दुर्जयं दुर्निरीक्ष्यं च महोघोरं सुदारुणम् ॥ ३२ ॥ स्फुरन्तं विद्युदाकारं लोचनैरपि सन्निभः ।
सूत्र-५३ 283 भूः क्रान्ता पादतलतो ब्रह्मलोकं गतं शिरः ॥ ३३ ॥ वे सोचने लगे कि यह दुर्जय और दुर्निरीक्ष्य, महाघोर दारुण भयानक रूप, जो बिजली के समान चमकते व कड़कते नेत्रों वाला है और इसका पदतल भूमि से भी क्रान्त, अतिक्रमण कर रहा है और सिर ब्रह्मलोक तक जा पहुँचा है। तस्य रूपभयाद्भीताः त्रिदशासुरराक्षसाः । नष्टाश्च ऋत्विजो ब्रह्मा शक्राद्या द्वारपालकाः ॥ ३४ ॥ उसके ऐसे रूप से सभी देवता, राक्षस और असुरगण भी भयभीत है और सभी ऋत्विजगण, ब्रह्मा, इन्द्रादि सभी द्वारपाल नष्ट प्रायः हो गए। तत्र देवा द्विजा राजा आश्रयन्ति महेश्वरम् । 'रक्ष रक्ष महादेव-भयभीतान् जगत्प्रभो ॥ ३५ ॥ यह सब विचित्रता देखकर सभी द्विज और राजा भी भगवान् महेश्वर के आश्रय में जा पहुँचे और पुकार करने लगे कि हे महादेव ! जगत्प्रभो ! ! हम भयभीत लोगों की रक्षा कीजिए। महद्भूतं मर्त्यलोके यज्ञे च रिपुक्रोधजम् । सुरराजद्विजानां च भूमौ रक्षाकरो भवान् ॥ ३६ ॥ (सभी ने कहा कि) हे प्रभु ! मृत्युलोक में यज्ञों में महान् क्रोध से रिपु द्वारा महान् सङ्कट उत्पन्न कर दिया गया है। अस्तु, सुरराज इन्द्र और ब्राह्मणों की तथा इस भूमि की आप रक्षा कीजिए। प्रत्यक्षं भव ईशान सुरार्थे द्विजभूपते । महद्भूतं महादेवं दैत्यानां दहनं परम् ॥ ३७ ॥ हे ईशान ! महादेव शिव !! कृपा करके आप देवताओं, ब्राह्मणों और भूपति राजाओं के लिए प्रत्यक्ष प्रकट होकर हे महद्भूत महादेव ! आप दैत्यों का पूर्ण दहन कर दीजिएगा। ललाटनेत्रसङ्क्रुद्धं कालरूपमिवापरम् । वलोकितो भवो भद्रे असाध्ये वृद्धताङ्गतः ॥ ३८ ॥ आपके ललाट के तीसरे नेत्र के संक्रुद्ध होने पर तो महाकालरूप से भी परम भयानक दृष्टि के सामने असाध्य भी भद्र होकर वृद्धि को प्राप्त करने लगते हैं। मूलकल्पोद्भवं यत्र निग्राह्यमस्तकोभवम् ।' वलोकितं तदा चक्रं त्रिषु लोकेषु मध्यतः । लीयते शिवदेहे तु यत्र स्यात्सुरसम्भवः ॥ ३९ ॥
284 अपराजितपृच्छा
मूलकल्प से उत्पन्न इस आपत्ति को निग्रह करके उसको अस्तगत कर दीजिए। तब तीनों लोकों के मध्य में इस चक्र को देखकर भगवान् शिव ने अपनी शिवदेह में लीनकर लिया और तब से देवताओं का जीवन पुनः सम्भव हो सका।¹ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां देवासुरसंग्रामादिवास्तूद्भवाधिकारो नाम त्रिपञ्चाशं सूत्रम् ॥ ५३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में देवासुरसंग्रामादि वास्तु उद्भव अधिकार नामक तिरपनवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥
वास्तूत्पत्तिर्नाम चतुःपञ्चाशत्तमं सूत्रम् ॥ ५४ ॥ रुद्र उवाच — भो भार्गव महावीर कस्मात्स्थानादुपागतः । कृतं त्वया त्वद्भुतं हि धराधर्मविनाशनम् ॥ १ ॥ (पूर्व सूत्रानुसार) रुद्र बोले कि हे भार्गव महावीर! आप कहाँ से आए हैं और आपके द्वारा किया गया यह धराधर्म का विनाश कार्य भी बहुत ही अद्भुत है।
- एष वास्तुपुरुषकथावस्तुसङ्क्षेपः— पुरा किल देवासुरे युद्धे विष्णुसाह्येन पराजितानां स्वशिष्याणां विजयाय सलक्षणम् छागमभिचारविधानेन जुह्वतः शुक्रस्य स्वेदाम्भःकणिकायामग्नौ पतितायां तत एको महासुरोऽतिभीषणाकारः समुदभूत्। छागाननत्वाच्छागासुर इति प्रख्यातः स चासुरसम्राट स्वपितुः शुक्रस्याज्ञया देवान् भुजबलेन विद्राव्य तदाश्रयाणां लोकानामपि महत् कदनमुपजनयन्नवर्तत। अथ शुक्रतपःप्रभावात् क्षणे-क्षणे वर्धिष्णुनामुना वीर्योत्सिक्तेन महासुरेण बहु कदर्शिता देवाः कालपर्यायात् किञ्चिदपि प्रतिकर्तुमपारयन्तो दुष्टदमनदीक्षितं भगवन्तं त्रिपुरान्तकं शरणमापुः। ततः स्वभक्तेभ्यो द्रुह्यतेऽस्मै क्रूराय क्रुध्यन् कृपानिधिर्महादेवोऽस्य प्रशमनाय स्वतृतीयनेत्रात् सर्वसंहारक्षमं प्रलयानलमुत्थाप्य तमभि प्राहिणोत्। ज्वालामालया व्याप्तदिगन्तराले तस्मिंश्च कालानले त्रिलोकीं भ्रमन्तमपि तमभिद्रुत्य दग्धुमुपस्थिते स छागासुरो भीतभीतः प्रशान्तमनाः शरणकामनया तनीयसीं तनुमाश्रित्य महेश्वरस्योदरं प्रविवेश। तेन तुष्टो भगवानप्यस्मै अभयं प्रदाय शुक्लरूपेण स्वोदरात् तं निर्गन्तुमाज्ञापयत्। तथा निर्गतत्वात् तदाप्रभृति शुक्र इति प्रथितः स भगवन्तं दण्डवत् प्रणत एव सन् क्षोणीतले वस्तुं, स्वशरीरे ब्रह्मादिका नवस्थापयितुं च वरमयाचत। तदनुसारेण भगवानपि— 'वस्तुं वरं त्वया। वृतोऽहं यत् ततो नाम्ना वास्तुकोऽसि तथास्तु ते। वसन्तु च त्वयि प्रीताः शतानन्दादिदेवताः ॥ अद्यप्रभृति भूलोके दैवं वान्यच्च मानुषम्। कुर्वते वास्तु वासार्थं प्रथमं त्वां यजन्तु ते॥ पुष्पैश्च धूपदीपैश्च बलिभिश्च विलक्षणैः। त्वं च त्वद्देहसंस्थाश्च पूज्याः स्युर्देवताः क्रमात्॥ एवं मयैव विहितं कुर्वतां वास्तुपूजनम्। तदायतनवेश्मादौ वसतां सन्तु सम्पदः ॥ अकृत्वा वास्तुयजनं प्रासादभवनादिकम्। कृतं तदासुरं सर्वं भूयात् तत्र च यत् कृतम् ॥' (ईशानशिवगुरुदेवपद्धति क्रियापाद, उत्तरार्ध 26, 117-123) इति तस्मै वरं दत्तवान्। तच्छरीरे वस्तुं देवान् न्ययोजयच्च। तेन स महेशं प्रणत एवाद्यापि क्षोणीतले शेत इति। एषा च कथा शैवसम्प्रदायप्रवृत्तानां गुरुदेवादीनां मतमनुसृत्य विवृता।
सूत्र-५४ 285 सामर्थ्यतो विसृजता पुरुषं यज्ञध्वंसकम्। इन्द्राद्या असुरपार्श्वे निग्राह्य इति निश्चयात् ॥ २॥ इस यज्ञध्वंश कार्य को पुनः सुधारने में समर्थ जो इन्द्रादि देव और असुरगण हैं, वे भी तुम्हारे पास में निश्चय ही निग्राहावस्था या कैदी तुल्य हो चुके हैं। शुक्र उवाच - पुरा चाऽऽराधितो दिव्यं वर्षसहस्रकम्। तदाज्ञया मया लभ्या विद्यामरत्वदायिनी ॥ ३॥ इन्द्र ने कहा कि पूर्वकाल में जिस देवता की मैंने सहस्र दिव्य वर्ष तक आराधना की थी, उसी की आज्ञा से मुझे अमरत्वदायिनी विद्या का लाभ हुआ है।¹ रुद्र उवाच - दिव्यं वर्षसहस्रं च तपः कृत्वा सुदारुणम्। तोषितोऽहं तथा विष्णुः शुक्रेण मुनिना त्वया ॥ ४॥ रुद्र ने कहा कि हजारों दिव्य वर्षों तक का जो इतना कठोर तप है, शुक्र मुनि आपके द्वारा किया गया है। उससे मैं और भगवान विष्णु भी बहुत ही सन्तुष्ट और प्रसन्न हुए हैं। त्वया लिङ्गोद्भवे² व्योम्नि तुष्टो देवो जगत्पतिः । ध्यानं मन्त्रजपं कृत्वा प्रीणय त्वं परेश्वरम् ॥ ५॥ तुम्हारे द्वारा व्योम तक उद्भव को प्राप्त लिङ्ग स्वरूप जगत्पति देव तुष्ट हुए हैं और ध्यान तथा मन्त्र जाप करके तुमने परमेश्वर की प्रसन्नता प्राप्त की है। प्रासादान्मान्त्रिकी विद्या सप्ताक्षर्यथ संहिता। तुष्टेन कथिता विद्या सर्वकर्मानुसारिणी ॥ ६ ॥ और, उस प्रसन्नता के फलस्वरूप ही तुम्हें यह 'प्रासादमान्त्रिकी विद्या' और 'सप्ताश्चर्य संहिता' मिली है। यह 'सर्वकर्मानुसारिणी विद्या' भी उनकी प्रसन्नता से, तुष्टि मिलने के कारण ही तुम्हें कही गई है। साधयामि यत्कृते च सर्वदेवभयङ्करम्। मन्त्रैः स्तुत्या च युद्धैश्च दायं दास्यन्ति देवताः ॥ ७॥
- इत्यमनन्तर 'सदा च भवतुष्टित वेष्ट्य तदधासुरासुरैध। आज्ञालोपं भव प्रभो तवशास्त्रमयोच्छेद। उदकस्या प्रीतप्रियते अग्रिमध्ये समुत्पन्नां आबाधादेवदानवैः ॥' इत्यादयो... 'न' पाठः ।
- 'जरा ? लिङ्गोद्भवे' इति प्रकाशित पाठः । न पाठे नोपलब्धते ।
286 अपराजितपृच्छा परन्तु, हे सर्वभयङ्कर देव! मैं तुम्हारे द्वारा किए गए विनाश को सुधारने हेतु मन्त्रों द्वारा तुम्हारी स्तुति की साधना करके अथवा तुमसे साक्षात् युद्ध करके देवताओं का दायभाग उन्हें वापस दिलाऊँगा। अहो ये मुनः सर्वे रुद्रेशं पुरुषोत्तमम्। उपाश्रयन्ति देवेशं भयं जयन्ति निर्जराः ॥ 8 ॥ देखो, ये सभी मुनिगण भी भय से परास्त होकर पुरुषोत्तम भगवान् रुद्र देवेश के उपाश्रय में आ गए हैं। पद्मासन शृणु त्वं च विष्णुर्वचनमब्रवीत्। न त्वया वध्यते साधो अस्माभिर्न च दैवतैः ॥ 9 ॥ तब भगवान् शिव की युद्ध से या आराधना से शुक्राचार्य को जीतने की यह प्रतिज्ञा सुनकर भगवान् विष्णु ने इन वचनों को कहा- 'हे पद्मासनस्थ, आप यह ध्यान देकर सुने कि न तो यह साधु शुक्राचार्य तुमसे वध को प्राप्त हो सकते हैं न मुझसे और न ही अन्य देवताओं से इनका वध हो सकता है। मन्त्रमूर्तिरियं वास्तू रुद्रदेहसमुद्भवः। इदं तु वास्तुरूपं च दुर्धरं च पुनः शिवात् ॥ 10 ॥ 'क्योंकि, ये स्वयं मन्त्रमूर्ति रूप में वास्तु है, जो रुद्र भगवान् शिव की देह से समुद्भूत हुए हैं। इसलिए अब तो ये वास्तु रूप होकर स्वयं भगवान् शिव से भी पुनः अधिक दुर्धर, असाध्य और अजेय हो गए हैं। अतः शिव भी इन्हें नहीं जीत सकते।' इदं च वचन श्रुत्वा पद्मभूः पुरुषोत्तमात्। शरणं वद देवानां विष्णुरद्भुतविक्रमः ॥ 11 ॥ भगवान् विष्णु के ये वचन सुनकर पद्मभूः ब्रह्मा ने देवताओं को कहा कि अब तो तुम सब अद्भुत विक्रमी भगवान् विष्णु की ही शरण में जाओ। रुद्रलोके ततो गत्वा ध्यात्वा देवं महेश्वरम्। अद्भुतं भूतमभ्यर्च्य भूतं दृष्ट्वा च भूतले ॥ 12 ॥ तब वे सभी देवगण रुद्रलोक में पहुँचकर भगवान् महेश्वर का ध्यान करने लगे और भूतल पर भूतों को देखकर सब से अद्भुत भूत भगवान् रुद्र की अभ्यर्थना करने लगे। यदा सत्त्वं भवेद् ज्ञानं ¹भवेत्तुष्टिभवोऽवृथा। तदा सुरासुरैर्वन्ध्य आज्ञालोपो भवेत्प्रभोः ॥ 13 ॥
- 'भवेत्तुष्टिर्भवो ? वृथा' प्रकाशित पाठः।
सूत्र-५४ 287 वे कहने लगे कि हे प्रभु! यदि आप हम पर तुष्ट हो गए हो तो कृपा करके आप सत्य रूप में प्रकट होकर हमें ऐसा ज्ञान दें, जो अवृथा हो, अचूक हो। तभी सुर और असुरों के द्वारा वध्य होने की आज्ञा का लोप हो सकता है। शास्त्रच्छेदो न च भवेत् म्रियते न तथोदके। अग्निदेवात्समुत्पन्नो ह्यवन्ध्यो देवदानवैः ॥ 14 ॥ तब न तो कोई शस्त्र से छेदन या मारण होगा न ही जल में डुबोकर मारना सम्भव होगा क्योंकि अग्निदेव से समुत्पन्न होने से देव-दानव सभी से अवध्य ही है। ईश्वर उवाच — शृणु भार्गव दैत्येन्द्र विद्याप्रस्तारनिर्णयम्। त्रिषु स्थानेषु प्रस्तार्य्य गुरुस्थाने नियोजितः ॥ 15 ॥ ईश्वर ने कहा कि हे भार्गव दैत्येन्द्र सुनो ! हमारा विद्या प्रस्तार निर्णय यह है कि तीन स्थानों में प्रस्तार करके हम तुम्हें गुरु स्थान में नियोजित करते हैं। अविद्यागुरुलब्धाऽङ्गदोषपापानुसङ्ग्रहे। ज्ञानोन्मीलनं तद्भक्त्वा विद्यासिद्धिश्च वृद्धतः ॥ 16 ॥ अविद्यागुरु, लोभी-अङ्गदोषी और पाप की कमाई से संग्रह करने वाले इन तीन प्रकार के गुरुओं से ज्ञान उन्मीलन होगा तब तुम्हारी भक्ति से विद्यासिद्धि भी बढ़ेगी।