भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-४९ 245 नित्यं स्फुरति दर्पणे मनःस्था महतामपि न विसाद्भूताः ? ॥ 30 ॥ यह एक महत्वपूर्ण नियम है कि महात्मा लोगों में बड़े ही अद्भुत ढङ्ग से शास्त्रगणित के मूर्धन्य जानकारों और दूसरे स्वस्थ बुद्धि शोभन महानुभावों के सभी गुण नित्य नए-नए स्फुरित होते रहते है, मानो ये सभी विचार उनके मन रूपी दर्पण में उन्हें दिखाई पड़ते हैं। तेनेदं सिद्धयते सर्व वास्तुस्थानपरिग्रहम्। पूजादानैश्च सूत्रश्च संयोगैः प्रभूरभूत्तयोः ? ॥ 31 ॥ इन्हीं स्फुरित विचारों से समस्त वास्तुशास्त्र के परिग्रह, काम-काज सिद्ध होते हैं। पूजा, दान, सूत्रादि तो इस संयोग में प्रभुतापूर्वक विशेष लाभदायक हैं। सर्वार्थे पोषयेद् भृत्यो ये केचित् कर्मदायकाः। कर्मकरांस्ततो वत्स सर्वार्थे नित्यं पोषयेत् ॥ 32 ॥ अन्त में, कार्य सिद्धि का मूल मन्त्र देते हुए श्रीविश्वकर्मा भगवान् अपराजित को कहते हैं कि हे पुत्र ! जो भी कोई भृत्य कैसे भी काम में लगाया गया है, उसे सभी तरह से पोषण देना, अच्छा भर-पूर वेतन देना और समस्त कर्मकारों, कारीगरों को भी पूरा-पूरा वेतन देकर उनके पोषण हेतु उनके सभी अर्थों की नित्य पूर्ति करते रहना सदा ही लाभप्रद रहता है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां भूपरीक्षाग्रहपूजाधिकारो नामाष्टचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ 48 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भूपरीक्षाग्रह पूजा अधिकार नामक अड़तालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 48 ॥ सूत्रधारपरीक्षा नामैकोनपञ्चाशं सूत्रम् ॥ 49 ॥ विश्वकर्मोवाच — कर्माधिपस्य कर्तव्या परीक्षा शिष्यवत्तथा। त्रिभावे निःस्पृहो दक्षः कर्तव्यः कर्मनायकः ॥ 1 ॥ विश्वकर्मा बोले कि जिस व्यक्ति को कर्माधिप नियुक्त किया जाता है अर्थात् वास्तुकर्म के लिए गजधर बनाया जाता है, उसकी परीक्षा उसके शास्त्रज्ञान, कर्म, कर्तव्य, ईमानदारी, दक्षता आदि के बारे में एक शिष्य की परीक्षा की भाँति ही तीन भावों से की जानी आवश्यक है।