भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 291

244 अपराजितपृच्छा सूत्रों¹ के जानकार सूत्रधार, गजधर कर्मान्त्रि का पूजन करना चाहिए और उनके प्रयोग में आने वाले गज (हस्त) का भी पूजन करना चाहिए। भूमिदानं ततो दद्याद् गोमहिष्यश्वसंयुतम्। हिरण्यवस्त्रछत्राद्यैर्महादानैः क्षमापयेत् ॥ 25 ॥ इस अवसर पर सूत्रधार को भूमिदान, गो-महिष-अश्वयुक्त स्वर्णाभूषण, वस्त्र- पेरावणी, छत्रादि महादान श्रद्धापूर्वक देना चाहिए। वन्दितान् पूजयेद्वत्स सुभक्त्या क्षितिपालकैः । कृपा च सर्वजन्तूनां कर्त्तव्या सिद्धिमिष्यतैः ॥ 26 ॥ इसी तरह हे वत्स ! इस अवसर पर क्षितिपालक, भू स्वामी यजमान द्वारा सभी आगन्तुक वन्दनीय महानुभावों, अतिथियों की भक्तिपूर्वक पूजा-अर्चना करनी चाहिए और समस्त जीव-जन्तुओं पर दया-करुणा का भाव रखते हुए सिद्धि की आकांक्षा रखनी चाहिए। पश्चाद् दानं तथा कुर्याद् दीनान्धकृपणेषु च। ततः कामं समारभ्य चाष्टसूत्रं विधिक्रमम् ॥ 27 ॥ इसके बाद में दीन-अन्ध और निर्धन व्यक्तियों को दान-पुण्य करके ही अष्टसूत्र विधि-क्रमानुसार शिल्प कर्म का समारम्भ करना चाहिए। पूजा बलिविधानं च कृत्वा दीनान्धकृपणेषु च। सर्व सिद्ध्यति तत्कर्म सर्वकामफलप्रदम् ॥ 28 ॥ पूजा, बलि-विधान के साथ जो काम किए जाते हैं, वे सभी काम सिद्ध होते हैं और ऐसे काम सभी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। स्थिरे चित्ते सुधीस्तत्र स्फुरति विपुलाऽमला। नित्यं पुंसां यदुक्तं गुरुणा विधानं दैवेन या निर्मिता ? ॥ 29 ॥ इस प्रकार पूजन विधान के समारोह और उत्साह से, स्थिरचित से आरम्भ किए गए कार्य में समय-समय पर बड़ी ही विमल बुद्धि भी आवश्यकतानुसार स्फुरित होती रहती है। इससे हमेशा गुरुजनों द्वारा कही गई, देवताओं द्वारा निर्मित विधान के अनुसार लोगों को नित्य नई दृष्टि मिलती रहती है। शास्त्रगणितमूर्द्धि मपरे स्वस्थे बुद्धिशोभना।


  1. अष्टसूत्रों में 1. दृष्टिसूत्र, 2. गज, 3. मूँज की डोरी, 4. सूत की डोरी, 5. अवलम्ब या साउल, 6. गुणिया, 7. साधणी और 8. परकाल या विलेख्य को गिना गया है। शिल्पस्मृति में कहा गया है- दृष्टि : करस्तथा मौञ्जं कार्पासञ्चाबलम्बकम्। काष्ठसृष्टिविलेख्यानि सूत्राण्यष्ट वदन्ति च ॥ (शिल्प. 2, 107)