भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-४८ 243 आदौ तु पूजयेद् देवं गणनांथं विनायकम् ॥ सिद्धिबुद्धिसमायुक्तं मुदा विधिविधानतः ॥ 18 ॥ इस क्रम में सर्वप्रथम गणनांथ विनायक का पूजन करें जिनके साथ में सिद्धि व बुद्धि भी विराजमान हो। इस पूजा को बड़े आनन्द और प्रसन्न मन से विधि-विधान पूर्वक करना चाहिए। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च पूजनीयाः प्रयत्नतः । येषां स्मरणमात्रेण सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥ 19 ॥ तदन्तर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रदेव की प्रेम-प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए जिनके स्मरण मात्र से सब प्रकार की सिद्धि हमें मिलती है। क्षेत्रपालं ततोऽभ्यर्चेत् लाभार्थी सुजटाधरम् । योगिनीर्बटुकं देवीः कुमारीः सविशेषतः ॥ 20 ॥ फिर, लाभार्थी यजमान सुजटाधर, क्षेत्रपाल की अभ्यर्चना करें तथा सभी चौंसठ योगिनियों, बटुकों, देवियों और कुमारियों की विशेष तौर पर पूजा-अर्चना करें। सर्वदेवास्ततः पूज्या दिक्पालांश्च ततोऽ