भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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242 अपराजितपृच्छा (अब भूमि परीक्षाविधि के प्रसङ्ग में कहा जा रहा है) इस शुभ कार्य के लिए शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, सुलग्न और सुमुहूर्त का अवश्य ध्यान रखें। पहले भूपरीक्षा के लिए शकुनों को अच्छी प्रकार से देख लें। पूजाबलिविधानेन शकुनेशं तथा परम्। दुर्लभं लभते वत्स विश्वकर्मप्रभाषितम् ॥ 12 ॥ शकुन के लिए भी पूजा बलि विधानपूर्वक शकुनेश का तथा परमतत्त्व का ध्यान करें। हे पुत्र! समझ लो कि विश्वकर्मा के द्वारा कही गई यह शिक्षा बड़ी दुर्लभ है जिसका तुम्हें लाभ मिलेगा। आदावुत्तरतो वत्स पश्चाद्दक्षिणतो भवेत्। उत्तरे सिद्धिसम्पत्तिः क्षेमलाभस्तु दक्षिणे ॥ 13 ॥ हे पुत्र! इसके लिए पहले उत्तर दिशा और बाद में दक्षिण दिशा की ओर जाना चाहिए। उत्तर में सिद्धि, सम्पत्ति और दक्षिण में क्षेम-कुशल का लाभ होता है। पुनः शब्दोत्तरे स्थाने शकुनस्यापराजित। सर्वकामफलं तत्र शकुनेशे न संशयः ॥ 14 ॥ हे अपराजित! पुनः यदि शब्द उत्तर दिशा से आता हो तो उस स्थान का शकुन सब कामनाओं की पूर्ति करने वाला, फलदायक है, ऐसा शकुनेश का निश्चित सङ्केत समझना चाहिए। प्राप्ते शकुनराजे तु सुलग्ने सुमुहूर्तके। आचार्ये चागमैर्युक्ते बलिपूजां निवेदयेत् ॥ 15 ॥ इस प्रकार से सर्वोत्तम शकुनराज को प्राप्त करके, सुलग्न और सुमुहूर्त में आचार्य के आगमन पर उन्हें बलि-पूजा निवेदित करें। सूत्रधारलक्षणम् — सूत्रधारः शास्त्रयुक्तो वास्तुवेदोपलक्षकः। सूत्रकम्बीसमायुक्तः सर्वशास्त्रसुकौशलः ॥ 16 ॥ तदा क्षेत्रे प्रतिष्ठा तु पुण्यस्थाने सुशोभने। आचार्यसूत्रधारैश्च कृता पूजा महोदिता ॥ 17 ॥ इस अवसर पर समस्त शिल्पशास्त्रों में कुशल, वास्तु वेद में वर्णित समस्त उपलक्षणों को समझने वाला, सूत्र और गज के सही-सही प्रयोगकर्त्ता सूत्रधार शिल्पशास्त्री को उस स्थान में पवित्र और शोभायमान मञ्च पर प्रतिष्ठित करके अन्य सभी सूत्रधार, आचार्यों के साथ महापूजा, सम्मान करना चाहिए।