भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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352 अपराजितपृच्छा पद्मिनी राक्षसी वीरा ह्यानन्दा नवमी स्मृता ॥ ३३ ॥

  1. शान्ता, 2. मनोहरा, 3. क्रूरा, 4. विजया, 5. कलिका, 6. पद्मिनी, 7. राक्षसी, 8. वीरा और 9. आनन्दा— ये नौ ताराओं के नाम है।¹ शान्ता शान्तिकरी नित्यं मनोल्हादा मनोहरा । क्रूरा प्रवर्जिता प्राज्ञैश्चौराग्न्यादिभयङ्करी ॥ ३४ ॥ शान्ता तारा सदा शान्तिकारक होती है, मनोहरा तारा मन में आह्लाद उत्पन्न करती है। क्रूरा तारा प्राज्ञों-विद्वानों के लिए वर्जित है और अग्नि आदि के भय उत्पन्न करने वाली है। विजया जयकल्याणा कलिका कलहप्रदा । पद्माया प्राप्यते सौख्यं महत्तीर्थफलं तथा ॥ ३५ ॥ विजया तारा विजय और कल्याण देने वाली तथा कलिका तारा कलह कराने वाली है। पद्मिनी तारा से सुख मिलता है जैसे महान् तीर्थ का फल। राक्षसी च तथा घोरा निशायां भयदायिनी । वीरा सौम्या भोगदा च ह्यानन्दानन्दकारिणी ॥ ३६ ॥ राक्षसी तारा भयङ्कर है और रात्रिकाल में भयोत्पादक है। वीरा तारा सौम्य है और भोगों को देने वाली है तथा आनन्दा तारा आनन्द करने वाली है। एवं नवविधाकारा निराकारा हि तारकाः । क्षीणश्चन्द्रो यदा वारे भवेत्तारा बलप्रदा ॥ ३७ ॥ इस प्रकार ये निराकार तारका नव प्रकार के आकार वाली है। जब चन्द्रमा क्षीण होता है, तब उस वार के दिन तारा बलवान होती है।²
  2. ताराओं के नामादि को लेकर शास्त्रों में दो रूप मिलते हैं। समराङ्गण. में कहा गया है—गणयेत् स्वामिनक्षत्राद् यावत् स्याद् भवनस्य भम्॥ नवभिर्भाजिते तस्मिन् शेषं तारा प्रकीर्तिता। जन्मसम्पद्विपत्क्षेमपापसाधकनैधनीः॥ मैत्रीपरममैत्र्यौ च प्राहुः संज्ञाः समाः फले। त्रिसप्तपञ्चमीर्भर्तुर्गृहतारा विवर्जयेत्॥ आद्याद्वितीयाष्टम्यस्तु ताराः स्युरिह मध्यमाः। तथा ऋक्षेऽपि चानिष्टे चन्द्रेऽष्टमगतेऽपि च॥ नयते दुरितं तारा चतुःषण्णवती नृणाम्। (समराङ्गण. 26, 40-44) इस प्रकार यहाँ 1. जन्म, 2. सम्पद, 3. विपत्, 4. क्षेम, 5. प्रत्यरि, 6. साधक, 7. बध, 8. मित्र व 9. परममित्र नाम से ताराओं की गणना हुई है। यही मत नारदसंहिताकार का है किन्तु जन्म सहित तीसरी, पाँचवीं व सातवीं तारा को अशुभद बताया है— जन्मसम्पद्विपत्क्षेम प्रत्यरिस्साधको वधः। मित्रं परममित्रं च जन्मभाच्च पुनः पुनः॥ जन्मत्रिप्रञ्चसप्ताख्या तारा नेष्टफलप्रदाः। (नारद. 13, 3-4)
  3. कृष्ण पक्ष में चन्द्रबल की अपेक्षा ताराबल की प्रधानता होती है। क्षीण चन्द्रमा होने पर तारा वैसे ही बलवान होती है जिस प्रकार पति के परदेश में होने पर पत्नी ही गार्हस्थ्य का सारा दायित्व निभाती है— न खलु बहुलपक्षे शीतरश्मेः प्रभावः कथितमिह हि तारा वीर्यमार्यैः प्रधानम्। अतिविकल शरीरे प्रेयसि