भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 535 में से

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पृष्ठ 398

सूत्र-६६ 353 क्रूरा च कलिका चैव राक्षसी तु तृतीयका। क्रूराद्या इति वै तिस्रो वर्जयेच्छुभकर्मसु॥ ३८॥ शान्ता मनोहरा चैव विजया पद्मिनी तथा। वीरा नन्देति षट्‌तारा नित्यं कल्याणकारिकाः॥ ३९॥ इति ताराधिकाराः। उक्त ताराओं में पहली क्रूरा, दूसरी कलिका और तीसरी राक्षसी ताराओं को 'क्रूराद्यातिस्र' कहते हैं। इन्हें शुभ कर्मों में कभी नहीं लेना चाहिए, ये वर्जित हैं परन्तु शान्ता, मनोहरा, विजया, पद्मिनी, वीरा, आनन्दा— ये छह ताराएँ नित्य ही कल्याण करने वाली होती हैं। अथाधिनायकमाह — कर₂ राशि₁₂हतोत्था ये भागैर्हष्टं₈ तथोऽष्टभिः₈। आधिपत्यं भवेच्छेषं नाम्ना च सदृशं फलम्॥ ४०॥ (अब अधिनायक के विषय में कहा जा रहा है) आधिपत्य ज्ञात करने के लिए दो और बारह को गुणा कर (2 × 12 = 24), इनका चौंसठ (8 × 8 = 64) में भाग दें तो जो शेष रहेगा, वह 'अधिपति' कहलाता है। जिस अधिपति का जो नाम है, तद्नुसार ही उसका फल जानना चाहिए। अधिपतिनामानि — विकृत¹ कनकश्चैव धूम्रको विजयः स्वरः। बिडालविजयौचैव दन्तः कान्तस्तथा मृगः॥ ४१॥ अधिपतियों के नाम हैं— विकृत, कनक, धूम्रक, विजय, स्वर, विडाल, विजय, दन्त, कान्त और मृग।² प्रोषिते वा प्रभवति खलु कर्तुं सर्वकार्याणि योषा॥ (ज्योतिषरत्नमाला 11, 5) लल्लाचार्य का भी यही मत है— न कृष्णपक्षे शशिनः प्रभावो ताराबलं तत्र शुभं प्रदिष्टम्। देशान्तरस्थे विकले च पत्यौ सर्वाणि कार्याणि करोति नारी॥ अत्रापि तारापतिवीर्यमेव वदन्ति पक्षद्वितयेऽपि केचित्। केचिच्च तासां बलयुक्तमिन्दोर्बलं सदा देयमिति ब्रुवन्ति॥ (ज्योतिर्निबन्ध में उद्धृत पृष्ठ 49, श्लोक 8-9)

  1. 'वित्तत्य ?' इति प्रकाशित पाठः।
  2. यह पाठ त्रुटित जान पड़ता है। ज्ञानप्रकाशदीपार्णव में इसका पाठ मिलता है जो समझने योग्य है। दीपार्णवकार का कहना है कि बुद्धिमान शिल्पी को गृह के उदय क्षेत्रफल के अङ्क के साथ गुणा करते जो अङ्क आए उसे 8 से भाग करते जो शेष रहे, उसे अधिपति जाने और जो अधिपति सम हो वह शुभ है। इनके नाम हैं—1. विकृत, 2. कर्णक, 3. धूम्रद, 4. वितथस्वर, 5. विडाल, 6. दुन्दुभि, 7. दान्त, 8. कान्त—गेहस्योदयकं क्षेत्रफलने गुणयेद् बुधः। अष्टभिस्तु हरेच्छेषं शुभः सोऽधिपतिः समः॥ विकृतः
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