अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषमआया भवेत्सम, आयहीना व्ययाः शुभाः । आधिपत्यं समं शान्तं शुभदं सर्वदा नृणाम् ॥ 42 ॥ इत्याधिपत्यम्। विषम आय सात हैं और आयहीन व्यय शुभ होते हैं। आधिपत्य सम संख्यक हो तो व्यक्ति के लिए सदा ही शान्त व शुभ होते हैं। अथायुष्यत्थाविनाशः — अष्टभिश्शु₈ हते क्षेत्रे फले षष्टि₆ विभाजिते । लब्धे दशगुणे जीवो मृत्युर्वै भूतभाजिते ॥ 43 ॥¹ पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च । पञ्च तत्त्वानि प्रोक्तानि विभक्तानि स्युरन्तके ॥ 44 ॥ जो क्षेत्रफल हो उसको 8 से गुणाकर जो फल आए उसे 60 की संख्या से विभाजित करने पर जो अङ्क आए, उससे 10 को गुणा करें। इस लब्धि तक उस वास्तु के जीवन-मृत्यु या आयुष्य को जानना चाहिए। साठ की संख्या से भाग करने पर जो शेष रहे, उसे 5 से भाजित करने पर पञ्चतत्त्वों को