अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६६ 355 अप्सु चाद्भिर्भवेन्मृत्युस्तेजस्यग्निबलं भवेत्। वायुर्वायुकरो देहे त्वाकाशे शून्यता भवेत् ॥ ४५ ॥ (पृथ्वी से चलन होने पर विनाश) आप से जल या वृष्टि के कारण विनाश, तेज से अग्निकाण्ड से विनाश, वायु देह में वायुविकार की भाँति है जबकि आकाश से शून्यता होती है। धनधान्येषु नष्टेषु देहः पतति जर्जरः। इत्थं मृत्युः प्रभवति पञ्चतत्त्वविनाशतः ॥ ४६ ॥ जब धन-धान्य नष्ट हो जाए व देह जर्जर हो जाए और गिर पड़े तो इस प्रकार की अवस्था को मृत्यु कहते हैं यह पञ्चतत्त्वों के नष्ट होने से होती है (वैसे ही वास्तु के सन्दर्भ में भी विचार करना चाहिए)। अन्यदप्याह — आयव्ययांशनक्षत्रं ताराचन्द्रमैत्र्यादिकम्। प्रीतिरायुश्च मृत्युश्च चिरं नन्दति चेच्छुभाः ॥ ४७ ॥¹ (इस प्रकार उपर्युक्त) आय, व्यय, अंशक, नक्षत्र, तारा, चन्द्र की मैत्री आदि, प्रीति, आयु, मृत्यु आदि के लक्षण यदि शुभ हो तो चिरकाल तक आनन्द देते हैं। तथा च शुभानि — त्रिभिः श्रेष्ठैस्तु श्रेष्ठं स्यात् पञ्चभिश्चोत्तमोत्तमम्। सप्तभिः सर्वकल्याणं नवभिर्जयसम्पदा ॥ ४८ ॥ इसमें से तीन के श्रेष्ठ होने पर सब कुछ श्रेष्ठ होता है, पाँच के श्रेष्ठ होने पर उत्तमोत्तम माना जाता है और यदि नौ ही तत्त्व-निर्देश श्रेष्ठ हो तो जय एवं सम्पदा मिलती है। वास्तुकर्मे अशुभानि — न षट्काष्टकं त्रिकोणं द्वादशी द्वितीयाष्टमी। न चाष्टद्वादशे शशी तारा त्रिपञ्चसप्तमी ॥ ४९ ॥ न द्वितीयांशकं कुर्यात् तथा चाष्टममायकम्।²
- तुलनीय— आयव्ययांशनक्षत्रं ताराचन्द्रमैत्रादिकम्। प्रीतिआयुष्य मृत्युश्च शुभं नन्दति चच्चिरं ॥ (दीपार्णव 1,
- तथा च— आयर्ऋक्ष चन्द्रगण व्ययतारांशक राशयः। राशिमैत्री ग्रहमैत्री नाडीवेधाधिपतिः ॥ लग्नतिथिर्वारोत्पत्ति अधिपति वर्गवैरकं। योनिवैरं ऋक्षवैरं स्थितिर्नाशीक विंशतिः ॥ (तत्रैव 1, 51-52)
- समराङ्गण में आया है— आयो व्ययश्च योनित्वं ताराश्च भवनांशकाः ॥ गृहनामेति चिन्त्यानि करणानि गृहस्य षट्। त्रिभिः शुभैः शुभं वेश्म द्वाभ्यामेकेन चाशुभम् ॥ करणैश्चतुराद्यैस्तु शुभैरतिशुभं भवेत्। न समायव्ययं वेश्म नाव्ययं नाधिकव्ययम् ॥ न द्वितीयांशमसहगयोनिभं च न कारयेत्। भर्तुस्तुल्याभिधानं च