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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-६६ 355 अप्सु चाद्भिर्भवेन्मृत्युस्तेजस्यग्निबलं भवेत्। वायुर्वायुकरो देहे त्वाकाशे शून्यता भवेत् ॥ ४५ ॥ (पृथ्वी से चलन होने पर विनाश) आप से जल या वृष्टि के कारण विनाश, तेज से अग्निकाण्ड से विनाश, वायु देह में वायुविकार की भाँति है जबकि आकाश से शून्यता होती है। धनधान्येषु नष्टेषु देहः पतति जर्जरः। इत्थं मृत्युः प्रभवति पञ्चतत्त्वविनाशतः ॥ ४६ ॥ जब धन-धान्य नष्ट हो जाए व देह जर्जर हो जाए और गिर पड़े तो इस प्रकार की अवस्था को मृत्यु कहते हैं यह पञ्चतत्त्वों के नष्ट होने से होती है (वैसे ही वास्तु के सन्दर्भ में भी विचार करना चाहिए)। अन्यदप्याह — आयव्ययांशनक्षत्रं ताराचन्द्रमैत्र्यादिकम्। प्रीतिरायुश्च मृत्युश्च चिरं नन्दति चेच्छुभाः ॥ ४७ ॥¹ (इस प्रकार उपर्युक्त) आय, व्यय, अंशक, नक्षत्र, तारा, चन्द्र की मैत्री आदि, प्रीति, आयु, मृत्यु आदि के लक्षण यदि शुभ हो तो चिरकाल तक आनन्द देते हैं। तथा च शुभानि — त्रिभिः श्रेष्ठैस्तु श्रेष्ठं स्यात् पञ्चभिश्चोत्तमोत्तमम्। सप्तभिः सर्वकल्याणं नवभिर्जयसम्पदा ॥ ४८ ॥ इसमें से तीन के श्रेष्ठ होने पर सब कुछ श्रेष्ठ होता है, पाँच के श्रेष्ठ होने पर उत्तमोत्तम माना जाता है और यदि नौ ही तत्त्व-निर्देश श्रेष्ठ हो तो जय एवं सम्पदा मिलती है। वास्तुकर्मे अशुभानि — न षट्काष्टकं त्रिकोणं द्वादशी द्वितीयाष्टमी। न चाष्टद्वादशे शशी तारा त्रिपञ्चसप्तमी ॥ ४९ ॥ न द्वितीयांशकं कुर्यात् तथा चाष्टममायकम्।²


  1. तुलनीय— आयव्ययांशनक्षत्रं ताराचन्द्रमैत्रादिकम्। प्रीतिआयुष्य मृत्युश्च शुभं नन्दति चच्चिरं ॥ (दीपार्णव 1,
  1. तथा च— आयर्ऋक्ष चन्द्रगण व्ययतारांशक राशयः। राशिमैत्री ग्रहमैत्री नाडीवेधाधिपतिः ॥ लग्नतिथिर्वारोत्पत्ति अधिपति वर्गवैरकं। योनिवैरं ऋक्षवैरं स्थितिर्नाशीक विंशतिः ॥ (तत्रैव 1, 51-52)
  1. समराङ्गण में आया है— आयो व्ययश्च योनित्वं ताराश्च भवनांशकाः ॥ गृहनामेति चिन्त्यानि करणानि गृहस्य षट्। त्रिभिः शुभैः शुभं वेश्म द्वाभ्यामेकेन चाशुभम् ॥ करणैश्चतुराद्यैस्तु शुभैरतिशुभं भवेत्। न समायव्ययं वेश्म नाव्ययं नाधिकव्ययम् ॥ न द्वितीयांशमसहगयोनिभं च न कारयेत्। भर्तुस्तुल्याभिधानं च

356 अपराजितपृच्छा न पृष्ठतस्तथा चन्द्रं नववास्तुककर्मणि ॥ 50 ॥ नए वास्तुकर्म के प्रसङ्ग में न षडाष्टक, न त्रिकोण, न द्विद्वादशक, न द्विष्मक योग को लेना चाहिए। इसी प्रकार आठवाँ, बारहवाँ चन्द्रमा भी न लें; न ही तीसरी, पाँचवीं और सातवीं तारा को ग्रहण करें। न द्वितीय अंशक (यमांश) ले न आठवीं आय (ध्वांक्ष) में कार्य करे। इसी प्रकार पृष्ठ का चन्द्रमा¹ भी नहीं लेना चाहिए। नाधिकस्तु व्ययः कार्यों न वैरा ²विषमाग्रहा। न स्वकुल अतिरिष्टं( ? ) न राशिवर्णबाह्यतः ॥ 51 ॥ इसी प्रकार निर्माण कार्य में क्षेत्र को जानकर आय से अधिक व्यय को न रखें और न विषम ग्रहों के वैर रखें। न एक ही कुल के अति अरिष्टों को ले और न राशि को वर्ण के बाहर से लें। पदे पूज्याः स्थिताः सर्वे हिंसन्ति त्वपदे स्थिताः। ग्रहा गावस्तथा विप्राः शापानुग्रहकारकाः ॥ 52 ॥ पद पर होने पर सभी पूज्य होते हैं और पदच्युत होने पर सभी उसकी हिंसा- निन्दा करते हैं। ग्रह, गाय और विप्र सदा ही शाप और अनुग्रह के कारक बनते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां व्ययांशकताराग्रहजीवमृत्युसर्वबलाधिकारो नाम षट्षष्टितमं सूत्रम् ॥ 66 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में व्यय- अंशक-तारा-ग्रह-जीव-मृत्यु, सर्वबलाधिकार नामक छासठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 66 ॥


गृहं दूरात् परित्यजेत्॥ समसप्तकमेकर्षं तृतीयैकादशं तथा। चतुर्थदशकं चेति कर्तव्यं मन्दिरं सदा॥ षट्कोष्ठकं त्रिकोणं च वर्ज्यं द्विर्द्वादशं तथा। षट्कोष्ठके मृतिर्देव्यं वियोगश्च भवेद् गृहे॥ त्रिकोणे वसतां दुःखं वैधव्यं च प्रजायते। द्विर्द्वादशे पुत्रपौत्रगुरुबन्धुधनक्षयः॥ (समराङ्गण. 26, 49-55) इस प्रकार समराङ्गणसूत्रधार में इन अङ्गों को करण कहा गया है। यह मान्यता वशिष्ठसंहिता के निकट है जिसमें योनि, तारा, व्यय, गृहांशक, आय व नाम इन छहों को करण नामाभिधान देते हुए गृहस्थ को इन पर विचार करने को कहा है— त्वं योनित्वं तथा तारा व्ययोऽथ भवनांशकं आयोऽथ गृहनामानि करणानि षडेष्विहि। गृहस्यैतानि चिन्त्यानि प्रयत्नेन च धीमता... (वशिष्ठसंहिता 39, 75)

  1. ज्योतिष व अन्य वास्तुग्रन्थों में कहा गया है कि आगे का चन्द्रमा आयु का हरण करता है व पृष्ठचन्द्र धन का क्षय करता है, चन्द्रमा वाम-दक्षिण का हो तो धन-धान्यकर्ता है। तथापि यदि देवप्रासाद व राजगृहादि का प्रसङ्ग हो तो आगे का चन्द्रमा दिया जाए अन्यत्र नहीं— अग्रतो हरते आयु पृष्ठतो हरते धनं। वामदक्षिण तो चन्द्रो धनधान्य करस्मृतः ॥ (क्षीरार्णव 1, 19) विशेषोञ्च— अग्रतो हरते ह्यायुः पृष्ठतो हरते धनम्। वामदक्षिणयोश्चन्द्रो धनधान्यकरः स्मृतः॥ प्रासादे राजगृहे च चन्द्रं दद्यात् सदाग्रतः। अन्येषां तु न दातव्यं श्रीमन्तादिगृहेषु च ॥ (दीपार्णव 1, 58-59)
  2. 'विमलाग्रहा?' इति प्रकाशित पाठः।

सूत्र-६७ 357 शास्त्रच्छन्दनिर्णयोनाम सप्तषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६७ ॥ अपराजित उवाच - छन्दश्च क्रमशः प्रोक्तं शाश्वतं शास्त्रकौशलम्। तदनुक्रमयुक्तीश्च कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥ अपराजित बोले कि हे प्रभु! कृपा करके शाश्वत शास्त्र कौशल में बताए गए सभी छन्दों को क्रमवार बताएँ और उनकी अनुक्रम से युक्ति भी कहें। विश्वकर्मावाच - एकाक्षरा क्षरे भिन्नं व्याप्तं चैतच्चराचरम्। त्रैलोक्यस्योत्पत्तिकरं छन्दो मेरुसृष्ट्युद्भवम् ॥ २ ॥ विश्वकर्मा बोले कि एक तो अक्षर और दूसरे क्षर इन भिन्न-भिन्नौं से चराचर व्याप्त है। इनसे तीनों लोकों की उत्पत्ति करने वाले सभी छन्द मेरुसृष्टि से उद्भूत हैं। तथा शम्भुश्च-मेरुश्च-चिन्तामणि-वृत्तार्णवः। चतुर्विधं छन्दशास्त्रमेकाद्याक्षरतः क्रमात् ॥ ३ ॥ अस्तु, एक छन्दशास्त्र से, एकाक्षर से क्रमानुसार चार प्रकार के छन्द उत्पन्न हुए यथा, १. शम्भु, २. मेरु, ३. चिन्तामणि और ४. वृत्तार्णव। एकाक्षरोद्भवः शम्भुस्तथामेरुश्च युग्मतः। चिन्तामणिस्त्रिभिश्चैव वेदैर्वृत्तार्णवः स्मृतः ॥ ४ ॥ एकाक्षर से उत्पन्न मेरु तथा शम्भु का युग्म तथा चिन्तामणि तीन से और वृत्तार्णव चार अक्षर से बने माने जाते हैं। छन्दश्चतुर्विधमाह - छन्दांश्चतुर्विधाः प्रोक्ता वेदान्ताश्चैकतः पृथक्। गुरुलघूद्भवा मात्रा प्लुतह्रस्वादि सञ्ज्ञकाः ॥ ५ ॥ छन्द भी चार प्रकार के कहे गए हैं। एक से चार तक अलग-अलग इनकी गुरु [ ऽ ] और लघु मात्रा [ । ] को प्लुत और ह्रस्व संज्ञा दी गई है। सानुस्वारा विसर्गान्ता वेदान्तोद्भवकल्पना। भिन्नाभिन्नास्तथानेके भेदाश्छन्दसमुद्भवाः ॥ ६ ॥ अनुस्वार से विसर्गान्त तक चार प्रकार की उत्पत्ति की कल्पना की गई है। इनको भिन्न-भिन्न स्थान पर रखते जाने से कई भेदों की उत्पत्ति होती है।

358 अपराजितपृच्छा एकाक्षरो द्रुतमात्रो भेदः सूर्यः स उच्यते । निबन्धपादाः पङ्क्तौ च वेदसंख्याः प्रकीर्तिताः ॥ ७ ॥ कलिकादिकवृत्तानां त्र्यष्टकं प्रोच्यते तथा । एकाक्षर और द्रुत मात्रा होने से उसे 'सूर्य' भेद (बारह) कहते हैं। निबन्ध पादपङ्क्तियों (दस) को 'वेदसंख्या' भेद (चार) तथा कलिकादिक वृत्तों को 'त्र्यष्टक' भेद (तियासी) कहते हैं। तेषां अभिधानपङ्क्तिमाह — तदभिधानपङ्क्तिं च कथयिष्याम्यनुक्रमात् ॥ ८ ॥ अब मैं इनकी अभिधानपङ्क्ति को भी अनुक्रम से कहता हूँ। कलिकाविकास्यवज्राः कुमारललितानुष्टुप् । अक्षमश्चैव प्रणम्योपेन्द्रवज्राजलानि च ॥ ९ ॥ करणराज्यं वसन्ततिलका चैव मालिनी । तिलगर्जतं चाद्भुता तथा च गिरिकर्णिका । शार्दूलविक्रीडितं च तथा चैवातिवृत्तकम् ॥ १० ॥ स्रग्धरा मदना मदनलता च मधुकरा । कलिका विकास्य, वज्रा, कुमारललिता, अनुष्टुप, अक्षम और प्रणम्य, उपेन्द्रवज्रा, जलवृत्त और करणराज्य, वसन्ततिलका, मालिनी और तिलगर्जत अद्भुता, गिरिकर्णिका, शार्दूलविक्रीडित, अतिवृत्तक, स्रग्धरा औरं मदना तथा मदनलता मधुकरा। अथ निबन्धमाह — निबन्धश्चाथ गोविन्दः प्रोक्ता मुक्ताफला तथा ॥ ११ ॥ शुद्धसमो विषमश्च विषमसमकस्तथा । समस्तुल्यपदैः ख्यातो विषमो विषमैः पदैः ॥ १२ ॥ विषमाक्षरगस्त्वेवं समवर्णगतस्तथा । विषमसमसञ्ज्ञश्च दशभेदाः ₁₀ क्रमोदिताः ॥ १३ ॥ इसके अतिरिक्त निबन्ध, गोविन्द, मुक्ताफल, शुद्धसम, विषम, विषमासम व समतुल्यपद के कारण और विषम-विषम पदों के कारण ख्यात हैं विषमाक्षरों में गए हुए भी ऐसे ही है, समवर्णगत की तरह विषमसम संज्ञा वाले— ऐसे दस भेद क्रमोदित हैं।

सूत्र-६७ ३५९ अथ गुणाः — शान्तिः कर्णश्च सम्पातः सिंहो बाणश्च पल्लवः । कर्णकारः शुक्रः शङ्कुस्तथाधर्मो गुणा दश ॥ 14 ॥ शान्ति, कर्ण, सम्पात, सिंह, बाण, पल्लव, कर्णकार, शुक्र, शङ्कु और धर्म— ये दस गुण कहे गए हैं। जयमाला तथा नन्दा मेघा च सिंहगर्जना । तथा कल्लोलतरङ्गा रत्नावली पुष्पोद्गिरा ॥ 15 ॥ पत्रोद्गवा अत्युद्गुता अतिच्छन्दा दशोदिताः । एते दशाभिधानाश्च विषमा वाद्यकन्दतः ? ॥ 16 ॥ जयमाला, नन्दा, मेघा, सिंहगर्जना, कल्लोलतरङ्गा, रत्नावली, पुष्पोद्गिरा, पत्रोद्गवा, अत्युद्गुता और अतिच्छन्दा— ये दश, इतने दशाभिधान है। अथार्याच्छन्दोद्भूत छन्दं — शान्ताद्भुता मुख्या सौम्या रम्या च रमणी पुरा । मुखोद्गीर्णा चपलाख्या भैरवी भुवनोत्तमा ॥ 17 ॥ शृङ्गारी हास्यकरणी तिलकारा पद्मोद्भवा । विकारास्या प्रज्ञावती प्रबला वीरसम्भवा ॥ 18 ॥ प्रकारणाक्षसम्भूर्तिर्विकास्याथ प्रभामला । चतुर्विंशतिरार्याणां छन्दसां च समुद्भवाः ॥ 19 ॥ (पूर्व श्लोकानुसार) विषमा, शान्ता, अद्भुता, मुख्या, सौम्या, रम्या, रमणी, पुरा, मुखोद्गीरा, चपला, भैरवी, भुवनोत्तमा, शृङ्गारी, हास्यकरणी, तिलकारा, पद्मोद्भवा, विकारास्या, प्रज्ञावती, प्रबला, वीरसम्भवा, प्रकारण, अक्षसम्भूर्ति, विकास्या और प्रभामला— ये चौबीस आर्या छन्दों से सम्भूत है। प्रकरणादीनां — प्रकरणसूत्रसन्धिपरिच्छेदाध्यायास्तथा । अङ्ककाण्डसर्गखण्डवर्गाद्या ग्रन्थसम्भवाः ॥ 20 ॥ (ग्रन्थ रचना में विषय-वस्तु के विभाजन के लिए) प्रकरण, सूत्र, सन्धि, परिच्छेद, अध्याय, अङ्क, काण्ड, सर्ग, खण्ड, वर्ग (विरचन, उल्लास) आदि से ग्रन्थ रचना सम्भव होती है।

. Wait, in line 5: it curves to the left, which is (u). So स्वयंभुक्त,. Wait, let's check मनुमन्दिरः ? ।: There is clearly a question mark ? before the danda . Yes, मनुमन्दिरः ? । * प्रभामणिश्च ह्लादश्च ह्यङ्गाष्टकमुदाहृतम् ॥ २१ ॥ * Wait, ह्लादश्च or ह्रादश्च? Look at ह्लाद: the conjunct is with attached below. In Devanagari, ह्ल has below . ह्र has a diagonal slash. Here it clearly has the shape below ! So it is ह्लादश्च. And ह्यङ्गाष्टकमुदाहृतम् ॥ २१ ॥. * स्वयंभुक्त, तलकीर्ण, शान्त, मनु, मन्दिर, प्रभा, मणि, ह्लाद— इनको अङ्गाष्टक * कहा गया है। * क्षराक्षरपदादीनां — * Wait, is it क्षराक्षरपदादीनां —?

सूत्र-६७ ३०१ त्रयोदशा कर्णराज्यं वसन्ततिलकेन्द्रतः । मालिनी पञ्चदशतः षोडशतिलगर्जितम् ॥ २७ ॥ तेरह अक्षर वाले पद से कर्णराज्य वृत्त बनता है। चौदह अक्षरों के पद से बसन्ततिलक वृत्त बनता है। पन्द्रह अक्षर वाले पद से मालिनी वृत्त बनता है। सोलह अक्षरों वाले पद से तिलगर्जत वृत्त बनता है। अद्भुतं सप्तदशभिर्गिरिरष्टादशाक्षरैः । शार्दूलादि दिगङ्कैश्च विंशत्याश्वातिवृत्तकम् ॥ २८ ॥ इसी प्रकार सत्रह अक्षरों वाले पद से अद्भुत नामक वृत्त बनता है और अठारह अक्षर वाले पद से गिरिकर्णिका वृत बनता है। इसी में दिशा के अङ्क या उन्नीस अक्षरों वाले पद से शार्दूलविक्रीडित वृत्त और बीस अक्षरों वाले पद से अतिवृत्तक बनता है। स्रग्धरा चैकविंशत्या मदना द्वाविंशतिभिः । त्रयोविंशत्या मदन-लता मधुकरोऽर्कयोः ॥ २९ ॥ इक्कीस अक्षरों वाले पद से स्रग्धरा वृत्त बनता है और बाईस अक्षरों वाले पद से मदना वृत्त बनता है। तेईस अक्षरों वाले पद से मदन-लता वृत्त बनता है। चौबीस अक्षर वाले पद से मधुकर वृत्त बनता है। निबन्धः पञ्चविंशत्या गोविन्दश्च षड्‌विंशत्या । सप्तविंशतिभिर्मुक्ताफलेत्थं वृत्तकानि च ॥ ३० ॥ पच्चीस अक्षरों के पद से निबन्ध वृत्त बनता है। छब्बीस अक्षरों के पद से गोविन्द वृत्त बनता है। इसी तरह से सत्ताईस अक्षरों वाले पद से मुक्ताफल वृत्त बनता है— इतने सब वृत्त कहे गए हैं। इत्यमनन्तर गणश्छन्दमाह — मयौ रसौ तजौ भो नो गणाश्चाष्टौ लघुर्गुरुः । छन्दस्सुदशकं चेति प्रोक्तं वै शास्त्रकौशलैः ॥ ३१ ॥ अब मैं गण और छन्द के बारे में कहता हूँ। गण आठ होते है उनमें लघु और गुरु दो भेद हैं। (म-य-र-स-त-ज-भ-न ये आठगण हैं। यथा— मगण, यगण, रगण, सगण, तगण, जगण, भगण और नगण) ।¹ इसी तरह छन्द दस कह गए हैं, शास्त्र के कुशल जानकारों द्वारा ऐसा कहा गया है।

  1. छन्दोमञ्जर्यामप्येवमुक्तम्— मस्त्रिगुरुस्त्रिलघुश्च नकारो भादिगुरुः भादिगुरुः पुनरादिलघुर्यः । जो गुरुमध्यगतो रलमध्यः सोऽन्तगुरुः कथितोऽन्तलघुस्तः ॥ गुरेरेको गकारस्तु लकारो लघुरेककः । क्रमेण चैषां रेखाभिः संस्थानं दर्श्यते यथा ॥ गण पहचानने का सरल सूत्र है 'यमाताराजभानसलगा' इस सूत्र में

362 अपराजितपृच्छा समविषमवृत्तानि — समारक्षरपदं वृत्तं यत्तच्छुद्धसमं भवेत्। असमाक्षरपादं च भवेद् विषमसंज्ञकम् ॥ 32 ॥ समान अक्षरों वाले चारों पाद के जो वृत्त हैं, उन्हें शुद्ध सम वृत्त कहते हैं। असमानक्षरों वाले पद के वृत्तों को विषम वृत्त नाम दिया गया है। समपादं तु पूर्वार्द्धमुत्तरार्द्धं च वृद्धिगम्। समविषमं तु तन्नाम अन्तपादोऽधिको भवेत् ॥ 33 ॥ पूर्वार्द्धे च भवेद् वृद्धिः समवच्चोत्तरं समम्। पूर्ववच्चान्यविषमं विषमविषमं च तत् ॥ 34 ॥ आदिस्तृतीया विषमां द्वितीयो वा चतुर्थकः। एकवर्णगतावेवं सम्पुटं च दिशन्ति तत् ॥ 35 ॥ यदि पहला पाद तो सम अक्षरों वाला हो और उसका उत्तरार्ध पाद अधिक अक्षरों वाला हो तो उसे 'समविषम वृत्त नाम दिया गया है, जिसका अन्त पाद अधिक होता है। परन्तु, जिस वृत्त के पूर्वार्ध में अक्षर अधिक हो और उत्तरार्ध में समान अक्षर हो तो उसे समवच्चोत्तर समवृत्त कहते है। जिस वृत्त में पहला पद भी विषम हो और उत्तरपद भी विषम हो, दूसरा पद विषम हो या चौथा पद विषम हो— ये एक वर्णगत इस तरह होने पर सम्पुट और दिशन्ति कहलाते हैं। अष्टाविंशत्यक्षरतः सप्तत्रिंशत्तथान्ततः। भवत्यक्षरवृद्ध्या तद् गद्यानां दशकं तथा ॥ 36 ॥ अट्ठाईस (28) अक्षरों से लेकर सैंतीस (37) अक्षरों के अन्त तक अक्षर वृद्धि होते-होते उस गद्य को (पद्य को ?) दशक नाम दिया गया है। आर्यावृत्तमाह — यदा वृत्तेषु पूर्वार्द्धमुत्तरार्द्धसमं न हि। ह्रस्व-लघु (ल या ।), दीर्घ अथवा गुरु (ग या ऽ)। इससे इनको बनाना आसान हो जाता है। उदाहरण— यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण, (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), सगण (।।ऽ)। इन्हीं गणों को पहचानने का अन्य सूत्र इस प्रकार है— आदि मध्या वसानेषु यरता यान्ति लाघवम्। भजसा गौरवं यान्ति मनो तु गुरु लाघवम् ॥ अर्थात्— यगण (। ऽऽ) में आदि, रगण (ऽ।ऽ) रगण में मध्य, तगण में (ऽऽ।) में अन्त में लघु रहता है। भगण (ऽ।।) जगण में (।ऽ।), सगण में (।।ऽ) क्रमशः गुरु रहता है तथा मगण (ऽऽऽ) और नगण (।।।) पूरे गुरु और पूरे लघु युक्त होते हैं। छन्दशास्त्रों में यह वर्णन विशिष्ट रूप से मिलता है। विशेष जानकारी के लिए पुराणों में नारदपुराण, अग्नि और गरुडपुराण में छन्दशास्त्र द्रष्टव्य है।

सूत्र-६८ 363 आर्याभिधानकं तच्च भिन्नं वृत्तं च पादतः ॥ ३७ ॥ जब वृत्तों का पूर्वार्ध उत्तरार्ध के समान नहीं होता, तो उसे 'आर्या' नामक वृत्त कहते हैं क्योंकि उसके पाद भिन्न-भिन्न अक्षरों में होते हैं। कलिकाद्ये च नवमं मुक्ताफलकमन्ततः । त्यक्त्वा समानाक्षराणि शेषवृत्तानि सन्ति च ॥ ३८ ॥ एतानि वर्णवृत्तानि मात्रावृत्तं तु शेषकमू। नवें कलिकादि से लेकर मुक्ताफल तक के छोड़कर शेष वृत्त समान अक्षरों के होते हैं। इतने वर्णिक वृत्त हैं, मात्रिक वृत्त शेष होते हैं। द्विमात्रको गुरु ज्ञेय एकमात्रो लघुर्भवेत् ॥ ३९ ॥ सानुस्वारो विसर्गान्तो दीर्घो युक्तः परश्च यः । गुरुर्वा तु पदान्तस्थो द्विमात्रश्च लघुस्तथा ॥ ४० ॥ दो मात्रा को गुरु (ऽ) एक मात्रा को लघु ( । ) कहते हैं। अनुस्वार सहित विसर्ग के अन्त तक के स्वर दीर्घ (ऽ) कहे जाते हैं। पदों के अन्त में दो मात्रा गुरु या लघु होते हैं। गुरोर्लघुगता मात्रा सूर्यभेदसमुद्भवा₁₂ । एवं छन्दोगणाः प्रोक्ताः विज्ञेयाः शास्त्रकोविदैः ॥ ४१ ॥ गुरु और लघु मात्रा के बारह प्रकार होते हैं। इस तरह छन्दों और गणों को शास्त्रकोविद् पण्डितों ने जाना और कहा है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां शास्त्रच्छन्दनिर्णयाधिकारो नाम सप्तषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६७ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में शास्त्रच्छन्दनिर्णयाधिकार नामक सड़सठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ६७ ॥ गृहप्रासादसम्भूतच्छन्दभेदो नामाष्टषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६८ ॥ अपराजित उवाच — छन्दश्च कथितं देव सर्वशास्त्राद्यसम्भवम्। अन्यत्र छन्दभेदांश्च कथयस्व परमेश्वर ॥ १ ॥ अपराजित बोले कि हे देव ! आपने सर्वशास्त्रों के आदि में सम्भव होने वाले छन्दों के बारे में अब तक कहा। अब हे परमेश्वर ! अन्यत्र छन्दभेदों को भी कहिए।

364 अपराजितपृच्छा गृहप्रासादसम्भृताश्छन्दाः षटसञ्ज्ञकाः स्मृताः। कथयस्व प्रसादेन तेषां निर्णयमादितः॥ २॥ मेरुश्च खण्डमेरुश्च पताका सूचिका तथा। उद्दिष्टं नष्टमित्युक्ताश्छन्दाः षड्बुधसम्मिताः॥ ३॥ गृह-प्रासाद के बनने के छह प्रकार की संज्ञा के छन्द कहे गए हैं। अस्तु, कृपा करके आप उनका निर्णय आरम्भ से ही कहिए। वे छन्द क्रमशः 1. मेरु, 2. खण्डमेरु, 3. पताका, 4. सूचिका 5. उद्दिष्ट तथा 6. नष्ट छन्द— छह प्रकार के बुद्धिमानों ने स्वीकृत किए हैं। एषां प्रस्तारसन्दोहं मम भ्रान्तिहरं परम्। त्वत्प्रसादेन देवेश छन्दशास्त्रसमुद्भवम्॥ ४॥ हे देवेश! इस सब का प्रस्तार-सन्दोह (प्रस्तार समुच्चयक्रम) बताकर मेरी परम् भ्रान्ति का निवारण आप छन्दशास्त्र का उद्भव बताकर कृपापूर्वक कीजिए। विश्वकर्मोवाच — प्रोक्ता भेदाश्छन्दसां षट् रिपुरान्तवेदोद्भवाः( ?)। भेदे शून्यं त्रयशून्यं वेदाशू ^1उपाङ्गषडध्वः॥ ५॥ खशून्या भवेद्मुक्ता सङ्ख्यामिति छन्दोद्भवा ?। प्रयुक्तशास्त्रछन्देषु भेदाश्च षड्विधाः क्रमात्॥ ६॥ विश्वकर्मा बोले कि छन्दों के छह भेद कहे गए हैं। (आगे का अनुमानित अर्थ है कि षड्रिपु— काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य है, भेद से शून्य, तीन से शून्य, वेद के उपरान्त उपाङ्गों और षडध्व हैं— कलाध्व, तत्त्वाध्व, भुवनाध्व, वर्णाध्व, पदाध्व तथा मन्त्राध्व; वैसे ही शून्य या आकाश से उत्पन्न स्वर-संख्या से निष्पन्न छन्दों के) शास्त्र में प्रयुक्त छन्दों के क्रमशः छह प्रकार के भेद होते हैं। लक्षणालङ्कारयुता भिन्ना अर्थार्थतस्तथा। भिन्नास्तथैकाक्षरत इत्थं छन्दसमुद्भवः॥ ७॥ लक्षण अलङ्कारों से युक्त और अर्थ भिन्न-भिन्न अर्थों युक्त— इस तरह एक अक्षर से लेकर भिन्न तरह-तरह के छन्द निर्मित करते हैं। श्रुतिस्मृतिपुराणानि मन्त्रमुद्राक्षराणि च। मेरुच्छन्दसमुत्पन्नमाब्रह्मभुवनान्तकम्॥ ८॥

  1. उपाङ्गवध्रकशवः ? इति प्रकाशित पाठः।

सूत्र-६८ 365 श्रुतियों में, स्मृतियों में, पुराणों में, मन्त्रों में व मुद्राओं में मेरुछन्द से उत्पन्न हुए छन्द पूरे ब्रह्म और भुवनों अर्थात् चौदह भुवनों के अन्त तक भी व्याप्त है। माड-मौड-शुद्ध-शृङ्ग-तुङ्गार-सिंहकादिकाः । प्रोक्ता च राजवेश्मादौ मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ 9 ॥ उनके विविध नाम हैं— माड, मौड़, शुद्ध, शृङ्ग, तुङ्गार, सिंह आदि। अब मेरु छन्द से बनने वाले राजवेश्म अर्थात् राजभवनों, महल व प्रासादों के बारे में सबसे पहले कहता हूँ। आनकणाभि सङ्घाटा गृहमालाकूटपञ्जरम्। सम्भूता मेरुच्छन्दाच्च गृहा हर्म्यादिसञ्ज्ञकाः ॥ 10 ॥ आनक या सेना के काम आने वाले दुन्दुभि नगाड़े, घण्टादिकों की जोड़ी तथा सैनिकों के छावनी- गृहमाला के कूट, किले पञ्जर आदि और हर्म्यादि नाम के भवन सभी मेरुछन्द से ही बने हैं। तृणपट्टवाजिपूर्णखण्डपाण्डव एव च। प्रयुक्ता मेरुच्छन्दादौ वास्तुविद्भिरुदाहृताः ॥ 11 ॥ इसी तरह वास्तुविदों ने मेरुछन्द के प्रयोग से तृण, पट्ट, वाजि (बाण या अश्व), पूर्ण, खण्ड, पाण्डव आदि भेद भी बनाएँ।¹ लतिना नागरा भौमा द्राविडाश्च विराट्का। सावन्धारा विमानाख्या मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ 12 ॥ इन्ही की तरह लतिन, नागर, भौम, द्राविड़, विराट, सावन्धार, विमान के नाम की निर्मितियाँ भी मेरुछन्द से समुद्भूत है। स्तम्भगर्भतीर्यमाना खण्डा वेणुकलादिकम्। मेरुच्छन्दोद्भवा रेखाः प्रोक्ताश्च सुरवेश्मनाम् ॥ 13 ॥ स्तम्भ गर्भ से निकलने वाली खण्ड, वेणु-पर्व, कलादि भी मेरु छन्दोद्भव ही है जो रेखा देव मन्दिरों के शिखरों पर बनती है।

  1. वास्तुमण्डनम् में कहा गया है कि पट्टछन्द के अनुसार विविध भेदों वाली शालाएँ व अलिन्दादि होते हैं तथा इसके विपरीत तृणछन्द से सोलह अन्य भेद होते हैं। जिसमें उदयमान न्यून होता है उसकी संज्ञा पाण्डु हैं तथा इनमें वाजन विस्तृत होता है। इसी प्रकार जिसमें फलक के अंत का उच्छ्रेय चार हाथ तक हो, वह शेष छन्द होता है— पट्टच्छन्दे यथा भेदा शालाऽलिन्दादिका मताः। विपरीतास्तृणछन्दे षोडशैवं प्रकीर्तिताः॥ हीनोदयाः पाण्डुसञ्ज्ञा वाजिनस्तु बुयेऽधिकाम्। फलकान्ते चतुर्हस्ता शेष छन्देष्ववोच्छ्रयः॥ (वास्तुमण्डनम् 6, 6-7)

366 अपराजितपृच्छा तथैक-त्रि-पञ्च-सप्त-नवशाखसमुद्भवम्। प्रयुक्तं द्वारविधानं वास्तूपदेशका विदुः ॥ 14 ॥ प्रासादों के द्वार पर बनने वाली रेखाएँ एक, तीन, पाँच, सात, नौ शाखा तक बनती है, ऐसा विद्वान वास्तुशास्त्रोपदेशकों ने द्वार-विधान में प्रयुक्त किया है। अथ मण्डपानि — गूढो नृत्यश्चन्द्रालोको भद्रावलोकनादिकाः। चतुःषष्टिः⁶⁴ समाख्याता मण्डपा मेरुछन्दतः॥ 15 ॥ अब मण्डपों के बारे में कहता हूँ जो गूढ मण्डप, नृत्य, चन्द्रावलोकन, भद्रावलोकन आदि नामों से चौंसठ प्रकार के मेरुछन्द से बनने वाले कहे गए हैं। वितानानि — पद्मनाभिसभामार्गमन्दारभिन्नमिश्रकम्। षड्विधं च वितानं स्यान् मेरुच्छन्दादुदाहृतम्॥ 16 ॥ इसी तरह सभामण्डपों के वितान भी यथा— पद्म, नाभि, सभा-मार्ग, मन्दार, भिन्न, मिश्रक ये छह प्रकार के वितान मेरुछन्दानुसार बनते हैं। शाला नामानि — कर्णजा भ्रमजाश्चैव भद्रजा गर्भजास्तथा। मध्यजाः पार्श्वजाः ख्याताः शालाश्च मेरुछन्दतः॥ 17 ॥ कर्णजा, भ्रमजा, भद्रजा, गर्भजा, मध्यजा, पार्श्वजा नाम वाली शालाएँ भी मेरुछन्द से बनती हैं। पीठानि — वेदीबन्धं श्रीबन्धाख्यं पङ्कजं भद्रकं तथा। सुभद्रं तारकं पीठं मेरुच्छन्दोविनिर्गतम्॥ 18 ॥ इसी प्रकार वेदीबन्ध, श्रीबन्ध, पङ्कज, भद्रक, सुभद्र और तारक इन नामों की पीठ भी मेरुछन्द से ही निकली हुई है। विविध लिङ्गनामानि — सुरार्चितं चाद्यनादि स्वभु बाणं चतुर्थकम्। शक्त्याख्यं वर्धमानं च लिङ्गं मेरुविनिःसृतम्॥ 19 ॥ सुरार्चितलिङ्ग, आद्यनादिलिङ्ग, स्वभुलिङ्ग, बाणलिङ्ग, शक्त्यालिङ्ग और वर्धमानलिङ्ग नाम के लिङ्ग भी मेरुछन्द से बने हैं।

सूत्र-६८ ३६७ वेदाश्रादि पीठिकाः — वेदाश्रा वर्तुलाख्या त्रिकोणा तु षडंशका। वेदिका पद्मका चैव पीठिका मेरुच्छन्दतः ॥ २० ॥ चतुरस्र, वर्तुल, त्रिकोण, षट्कोण, वेदिका, पद्मका जैसी पीठिकाएँ भी मेरुछन्द से चली हुई हैं। अथार्चा — सीमा गर्भस्तथा द्वारं तलकोर्ध्वविभक्तिकम्। अर्चा च षड्विधा प्रोक्ता मेरुच्छन्दसमुद्भवा ॥ २१ ॥ सीमा, गर्भ, द्वार, तलक, ऊर्ध्व, विभक्तिक— ये अर्चा भी छह प्रकार की कही गई हैं जो मेरुछन्द से ही बनती हैं। नगरादीनां — नगरं च पुरं ग्रामः खेटः कूटश्च कर्वटः। एते च षड्विधा ज्ञेया मेरुच्छन्दविनिर्गताः ॥ २२ ॥ इसी प्रकार नगर, पुर, ग्राम, खेट, कूट, कर्व्वट— ये छहों भी मेरुछन्द से बने कहे गए हैं। जलस्रोतादीनां — वापीकूपतडागं च रथयन्त्रचक्रादिकम्। प्रयुक्तं मेरुच्छन्देषु वास्तुविद्भिरुदाहृतम् ॥ २३ ॥ वापी, कूप, तड़ाग, रथ, यन्त्र, चक्रादिक— ये भी सब छहों वास्तुविदों ने मेरुछन्द से ही बने कहे हैं। वेदीसिंहासनं छत्रं शय्याकवचमायुधम्। वास्तुवेदे समाख्यातं मेरुच्छन्दसमुद्भवम् ॥ २४ ॥ वेदी (बाजोट), सिंहासन, छत्र, शय्या, कवच, आयुध— इन छहों को भी वास्तुवेद में मेरुछन्द से बने कहा गया है। रथवीथ्यन्तरमार्गाश्च षट् पन्थान एव च। प्रयुक्ता वास्तुविद्भिश्च मेरुच्छन्दसमुद्भवाः ॥ २५ ॥ इति छन्दादिनिकाशसङ्ख्याधिकारः। रथवीथिका, अन्तरमार्ग और अन्य षट् पन्थान (भ्रमर, पुर, प्राकार, तोरण, अट्ट, अट्टालक व संबाध- ये षट्पद) आदि भी वास्तुविदों ने मेरुछन्द से बने कहा है।

368 अपराजितपृच्छा मेरुच्छन्दवर्णनं — पृथ्व्याकारो यथा छन्दो मेर्वाकारसमुद्भवः । षड्विधं मेरुच्छन्दश्च षडत्रिंशच्छन्दभेदकाः ३६ ॥ २६ ॥ पृथ्वी के आकार का जो छन्द है वह भी मेरु के आकार से ही बना है। इस तरह मेरुछन्द छह प्रकार का होता है जिसके भी छत्तीस भेद के छन्द होते हैं। भेदैस्तत्र त्र्यष्टशतैर्दशभिर्गुणितेस्ततः । चतुर्विंशत्सहस्त्राणि छन्दभेदाश्च सङ्ख्यया ॥ २७ ॥ इन भेदों से भी चौबीस सौ के दशगुणे अर्थात् चौबीस हजार (24000) छन्दों के भेदों की संख्या बन जाती है। इन्द्रोद्भवक्षमावृद्धी भूतकोणान्तमध्यमैः ? । इषु प्राणेषु भक्षन्ती प्रत्येकविषमेपदम् ? ॥ २८ ॥ इन्द्रोद्भव, क्षमावृद्धि, पञ्चकोण, अन्त और मध्यम पञ्चप्राणों (संभवतः 14 से आरम्भ कर एक की शुद्धि करते हुए ?) से भक्षण.. प्रत्येक विषम पदस्थ होने पर ? षड्भिर्नभशब्दैः¹ कोटिमेरुच्छन्दे तु सङ्ख्यया । तत्रोक्तमेवप्रमाणं सृष्टाऽम्भोजप्रकाशिना ॥ २९ ॥ नाभिकमल से उद्भूत सृष्टा ब्रह्माजी ने तीन सौ साठ कोटि (षड्भि₆र्नभ₀शब्दैः₃ कोटिमेरु ?) मेरुछन्द संख्या वाले ये सब प्रमाण सहित प्रकाशित किए हैं। मेरुर्मेरूपमः कार्यः शरावस्येव चाकृतिः । सृष्टिस्तदुद्भवा सूत्र पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ ३० ॥ मेरु को मेरु रूप में ही करना चाहिए। उसकी आकृति शराव (सकोरे) के समान होती है। सारी सृष्टि उसी मेरु से उत्पन्न हुई है और ऐसे प्रतीत होती है जैसे कि घड़े पर घड़ा रखा गया हो। षट् छन्दभेदाः — मेरुश्च खण्डमेरुश्च पताका सूचिका तथा । उद्दिष्टं नष्टमिति षट् छन्दांसीह प्रचक्षते ॥ ३१ ॥ परम्परा में 1. मेरु, 2. खण्डमेरु, 3. पताका, 4. सूचिका, 5. उद्दिष्ट और 6. नष्ट—ये छह छन्द कहे गए हैं।²

  1. 'षड्भिर्नभशब्दैः' इति प्रकाशित पाठः। यहाँ ब्रह्मा के किसी आद्यशास्त्र का वर्णन है। बृहत्संहिता के वास्तुविद्याध्याय में वराहमिहिर ने 'कमलभवान्मुनिपरम्परायातम्' कहकर इसकी ओर सङ्केत किया है।
  2. नारदपुराण के पूर्वभाग के द्वितीय पादस्थ अध्याय 57 और गरुडपुराण के 212वें अध्याय में छन्दशास्त्र

सूत्र-६८ 369 छन्दस्य पुराख्यानमाह — मृत्युभीतैः पुरा देवैरात्मनश्छन्दनायकः । संस्मृतानीह छन्दांसि छादितैस्तैस्ततो ¹महीः ॥ ३२ ॥ पूर्वकाल में मृत्यु के भय से आक्रान्त देवताओं ने अपने छन्दनायक के पास जाकर इन छन्दों का स्मरण दिलाया था। तब उसने इनको छाया देकर इस भूमि पर रहने के योग्य बनाया। छन्दे-छन्दं समुद्दिष्टं वाससी कृतिरेव च। छन्दोभिरावृतं सर्वं वन्द्यं सर्वत्र नान्यथा ॥ ३३ ॥ तब छन्दों में छन्दों का प्रयोग करते हुए भवनों का निर्माण करके उन्हें उन्नत किया। अस्तु, सर्वत्र वे सभी छन्दों से आवृत्त होकर वन्दनीय बन गए, इसमें कोई भी बात अन्यथा नहीं है। व्योम्नः पतते बिन्दु ?पतितो स बिन्दुगर्भातो भवेत्। गुरुर्लघुर्लतायाश्च तस्य चाष्टौ समुद्भवाः ॥ ३४ ॥ व्योम से जो बिन्दु भूमि पर गिरता है,

370 अपराजितपृच्छा अङ्कभिः पूरयेत् पश्चाद् यावत् सर्वहतं पदम् ॥ 35 ॥ पहला गुरु है। उसके नीचे ह्रस्व या लघु हो, पुनः जो शेष बचे वह ऊपर हो, इनको अङ्कों से बाद में पूरा करें जब तक कि सभी पद गुणित न हो जाए। गुरोरधस्ताच्च गुरुं निधाय शेषं समानं परिलक्ष्य सम्यक्। खण्डं प्रकुर्याद् गुरुपूरणार्थं यावत्पदं सर्वलघुस्थमेते ॥ 36 ॥ गुरु के नीचे गुरु रखें, शेष को ठीक तरह से समान परिलक्ष्य करें। गुरु पूरण हेतु उसके खण्ड करते जाएँ जब तक कि सभी लघुत्व तक न पहुँच जाएँ। भवन्ति प्रस्तारगताश्च ¹एते षट् सप्तमीप्रत्यय वै गृहाणाम् ?। ये नैव जानन्ति गुरुपदिष्टान् ते सूत्रधारा रिपवः प्रजानाम् ॥ 37 ॥ इस तरह प्रस्तार करते जाने से— (छियोत्तर प्रत्यय ?) गृहों के बनते हैं, इस गणित को जो गुरु के उपदेश से नहीं जानते, उन सूत्रधारों को प्रजाजनों का शत्रु ही मानना चाहिए। एकाद्येकोत्तरान् कोष्ठान् विन्यसेदिच्छयात्मनः। आद्यादारभ्य तद्वृद्धिर्यथास्यात्पार्श्वयोः समम् ॥ 38 ॥ एक से एक उत्तर कोष्ठों को अपनी इच्छानुसार न्यसित करें। पहले से आरम्भ करके फिर उसे बढ़ाते हुए सभी दोनों पास वालों को एक जैसा समान बनाएँ। मेरोरेकाधिका सङ्ख्या शरावस्येव चाकृतिः। प्रथमे कोष्ठके रूपमन्तं यावच्च पार्श्वयोः ॥ 39 ॥ मेरु की एक से अधिक संख्या होती है और उनकी आकृति शराव (सकोरे) के समान है। प्रथम कोष्ठक का जो स्वरूप है, वह अन्त तक होगा और इसमें पार्श्ववर्ती के आकार को भी वैसा ही करना चाहिए। आसनोध्र्वस्थयोर्न्स्येन्मध्ये सङ्कलितं पृथक्। तस्मिन्निष्टविकल्पानां सङ्ख्या स्यादन्त्यपङ्क्तिगा ॥ 40 ॥ इति मेरुछन्दः। यह स्मरणीय है कि ऊर्ध्वस्थित इन दोनों के मध्य में अलग सङ्कल्पित स्वरूप

  1. यह श्लोक ग्रन्थान्त के 236वें सूत्र में त्रुटितपाठ के रूप में जुड़ गया है : (चत्वार आद्यास्सुरवेश्मनां च) कर्तारएवामरवेश्मनां च दक्षाअपि प्रत्ययकान् षडेतान्। ये वै न जानन्ति गुरुपदिष्टास्ते सूत्रधारा रिपवः प्रजानाम्॥ यह माना जाए कि इन छन्दों में से आरम्भ के चार छन्द देवताओं के लिए मंदिरों हेतु होते हैं। कर्ता को इन छहों की गणित में दक्ष होना चाहिए। गुरु के उपदेश से जो इनका ज्ञान नहीं रखते, वे मानों जनता के वैरी ही सिद्ध होते हैं।

सूत्र-६८ 371 हो जाता है, पुनः इच्छित क्रिया-परिकल्पनाओं की वैकल्पिक संख्या अन्त की पङ्कि , में मिल जाती है।¹ अथ खण्डमेरु वर्णनं — खण्डमेरुं तु विन्यस्येत् तद्वदेवैकपार्श्ववतः । प्रवृद्धैः कोष्ठकैस्तत्राप्यङ्काः प्राग्वत् फलं यथा ॥ 41 ॥ अब खण्डमेरु के लिए कहते हैं कि उसी प्रकार से पार्श्व से खण्डमेरु का विन्यास करना चाहिए। उसके कोष्ठक प्रवृद्ध हों और अङ्क दूसरी पङ्कि में छोर तक, पहलों में शून्य रखें और अन्य कोष्ठों में भी पूर्व की भाँति, फल में भी वैसा ही करें। तथा चान्यं खण्डमेरु (पताकाच्छन्दश्च) — अथापरः खण्डमेरुः कोष्ठांस्तत्रेष्टसङ्ख्यया । कृत्वैकापचितान् वामविभागापचितानधः ॥ 42 ॥ इसके उपरान्त, दूसरे खण्डमेरु के विषय में कहा जा रहा है। वहाँ पर कोष्ठों को आठ की संख्या में रखना चाहिए। इस प्रकार इसमें नीचे से ऊपर कोष्ठ आठ होते हैं। इसके बाद (सम्भवतः पताका छन्दार्थ) एक-एक कम करते हुए नीचे के बायें भागों में भी कमी करते जाएँ। एकाद्येकोत्तरानङ्कानाद्यपङ्क्तौ निवेशयेत् । अन्यासु पङ्क्तिष्वाप्रान्तं शून्यानाद्येषु कल्पयेत् ॥ 43 ॥ द्वितीयेषु च कोष्ठेषु तासामेकैकं साधयेत् । द्वितीयायां तृतीयादिकोष्ठकेषु यथाक्रमम् ॥ 44 ॥ विकर्णयोगजानन्यानूर्ध्वाधोयोगसम्भवान् । फलं विकर्णयोगात्थमेकस्मिन् परिकल्पयेत् ॥ 45 ॥²

  1. यह मत समराङ्गणसूत्रधार से प्रेरित है। इसे इस तरह भी स्पष्ट किया जा सकता है—आगे से आगे एक एक कोष्ठों को इच्छानुसार विन्यसित करें, आदि से प्रारम्भ कर तदनन्तर बढ़ते जाएँ, जब तक दोनों पार्श्वों का एक समान सम्पादन हो जाए तब मेरुछन्द निष्पन्न होता है। मेरु की एक से अधिक संख्या होती है और शराव के सदृश्य उसकी आकृति होती है। प्रथम कोष्ठ का जो रूप होता है, वही पार्श्वों का रूप बन जाता है। ऊर्ध्वस्थित इन दोनों के मध्य में पृथक् सङ्कलित रूप हो जाता है, दुबारा इच्छित क्रिया कल्पनाओं की संख्या अन्तिम पङ्क्ति से संयुक्त हो जाती है— एकाद्येकोत्तरान् कोष्ठान् विन्यसेदिच्छयात्मनः। आद्यादारभ्य तद्वृद्धिर्यथा स्यात् पार्श्वयोः समम्॥ मेरोरेकाधिका सङ्ख्या शरावस्येव चाकृतिः। प्रथमे कोष्ठके रूपमन्तं यावच्च पार्श्वयोः॥ आसनोर्ध्वस्थयोर्नास्येन्मध्ये सङ्कलितं पृथक्। तस्मिंस्त्रिंशद्विकल्पनां सङ्ख्या स्यादन्त्यपङ्क्तिगा॥ (समराङ्गण. 26, 61-63)
  2. ये श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गण. में आए हैं— खण्डमेरुं तु विन्यस्येत् तद्वदेवैकपार्श्वतः। प्रवृद्धैः कोष्ठकैस्तत्राप्यङ्काः प्राग्वत् फलं तथा॥ अथापरः खण्डमेरुः कोष्ठांस्तत्रेष्टसङ्ख्यया। कृत्वैकापचितान्

372 अपराजितपृच्छा इति खण्डमेरुः ?। एक से आरम्भ करके उनके बाद के अङ्कों को पहली पङ्क्ति में रखें, दूसरों को पङ्क्ति के किनारे आदि से शून्यों की कल्पना करें। दूसरे कोष्ठक में भी उनको एक- एक करके, दूसरे को तीसरे कोष्ठक में क्रमशः रखते जाएँ। अब विकर्ण का योग जानने हेतु और ऊपर नीचे के योग लाने के लिए विकर्ण योग के फल को एक जगह कल्पित कर लेना चाहिए। इसका आशय है कि एक जिनके आरम्भ में है और एक ही जिनके अन्त में है, इस प्रकार के अङ्कों की पहली पङ्क्ति में रखें। इसमें भी यही क्रिया करें, पुनः तृतीय आदि कोष्ठकों में क्रमशः विकरण-योग से उत्पन्न या ऊर्ध्वाध योग से उत्पन्न अन्य अङ्कों का विन्यास करें। पुनः विकरण-योग से उत्पन्न फल की एक कोष्ठ में प्रकल्पना करें। एकाधिकानभीष्टायाः सङ्ख्यायास्तिर्यगालिखेत्। कोष्ठोनेतांश्च रूपादींस्तन्मध्ये द्विगुणोत्तरान् ॥ 46 ॥ एकोनं पृष्ठतस्तेषामेकं द्विगुणमग्रतः। नातिक्रमेत् परां सङ्ख्यां पताकाछन्द उच्यते।¹ गृहमालायुक्ताख्यातं पताकानामकं विदुः ॥ 47 ॥ इति पताकाछन्दः। एक से अधिक जब अभीष्ट हो तो उन संख्याओं को तिरछे लिखें। इन कोष्ठों को रूपादि मध्य दुगुणे करते जाएँ, एक के पीछे एक रखते हुए आगे वालों को दुगुना करते जाए। अब संख्या का अतिक्रमण न करें तो इसे 'पताका' छन्द कहते हैं। इसी को विद्वज्जन 'गृहमाला' नाम से भी पताका छन्द कहते हैं। आशय यह है कि अभीष्ट संख्या को एक से अधिक तिरछे लिखें। मध्य में दुगुने-दुगुने अन्तः कोष्ठ-रूपादि का न्यास करें। उनमें से पीछे एक संख्या कम करें और अग्रतः एक को दुगुना कर यदि परा संख्या का अतिक्रमण न हो तो पताका-छन्द होता है। वामविभागाचितानधः॥ एकाद्येकोत्तरानङ्गानाद्यपङ्क्तौ निवेशयेत्। अन्यासु पङ्क्तिष्वाप्रान्तं शून्यान्या(ना)द्येषु कल्पयेत्॥ द्वितीयेषु च कोष्ठेषु तासामेकैकमावयेत्। द्वितीयायां तृतीयादिकोष्ठकेषु यथाक्रमम्॥ विकर्णयोगजानन्यानूर्ध्वाधोयोगसम्भवान्। फलं विकर्णयोगोत्थमेकस्मिन् परिकल्पयेत्॥ (समराङ्गण. 26, 64-68)

  1. ये श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गण. में आए हैं— एकाधिकानभीष्टयाः सङ्ख्यायास्तिर्यगालिखेत्। कोष्ठानेकांश्च (तांश्च) रूपादींस्तन्मध्ये द्विगुणोत्तरान्॥ एकोनं पृष्ठतस्तेषामेकं द्विगुणमग्रतः। नातिक्रमेत् परां सङ्ख्यां पताकाछन्द उच्यते॥ (समराङ्गण. 26, 69-70)

सूत्र-६८ 373 अथ सूचीछन्दः — तद्दिनेष्टाद्यगा सङ्ख्येत्येकाद्यैस्तैस्ततो गृहे। न्यस्ताङ्कसङ्ख्याः सङ्ख्याः ¹गुरुलघ्वाद्यैः प्रकल्पिताः ॥ 48 ॥ अब सूचीछन्द के विषय में कहा जा रहा है। इसी प्रकार नेष्टाद्य संख्या को भी एक के बाद एक गृह में रखते जाए, उन अङ्क संख्या के न्यस्त रखने पर संख्या गुरु और लघु आदि प्रकल्पित होती है। एकैकमिष्टस्थानेषुः लिखेत् सैकेष्वतः( सैकेश्वतः! ) परम्। अन्त्याहृते पूर्वपूर्वयुक्तेनायोजयेत् परम् ॥ 49 ॥ एक-एक को इष्टस्थान पर लिखते जाए और एक से आगे अन्त तक पहली- पहली युक्ति अनुसार जोड़ते जाए अर्थात् पुनः अन्त की छोड़कर पहले-पहले वाली को दूसरी-दूसरी से मिलाएँ। अन्त्यादारभ्यं तद्भानावेकाद्येषु च पर्यायत्। अलिन्दादिषु यत्र स्यात् सङ्ख्या सूचीं तु तां विदुः ॥ 50 ॥² इति सूचीछन्दः। इसी प्रकार अन्त से पुनरारम्भ कर पीछे लौटे, जहाँ पर पर्याय से अलिन्द आदि की रचना में यह संख्या निकले, उसे विद्वानों ने सूचीछन्द कहा है। अथोद्दिष्टछन्द नष्टच्छन्दश्च — उद्दिष्टे स्थापयेत् सङ्ख्यामुद्दिष्टं सम्भजेच्च ताम्। दलयेद् रूपयुक्तां तु दलयेन्नाम सम्भवेत् ॥ 51 ॥ लघुस्वरूपदलने सैकार्धे करणे गुरुः। यावदिष्टपदाप्तिः स्याल्लघवोऽलिन्दकोदयः ॥ 52 ॥³

  1. समराङ्गण में यहाँ पाठ है—'स्युलिन्दाद्यैः प्रकल्पिताः।' इसका आशय होगा कि उसको छोड़कर पहली आदि इष्ट संख्याओं से अंक-विन्यास वाली संख्याओं को अलिन्दों से प्रकल्पित कर एक-एक को इष्ट स्थानों में रखें।
  2. ये श्लोक भी ज्यों के त्यों समराङ्गण. में मिलते हैं—तद्दिनेष्टाद्यगा सङ्ख्येत्येकाद्यैस्तैस्ततो गृहे। न्यस्ताङ्कसङ्ख्याः सङ्ख्याः स्युरलिन्दाद्यैः प्रकल्पिताः॥ एकैकमिष्टस्थानेषु लिखेत् सैकेश्वतः परम्। अन्त्याद(ह)ते पूर्वपूर्वयुक्तेनायोजयेत् परम्॥ अन्त्यादारभ्य तद्भानावेकाद्येषु च पर्यायत्। अलिन्दादिषु यत्र स्यात् सङ्ख्या सूचीं तु तां विदुः॥ (समराङ्गण. 26, 71-73)
  3. ये श्लोक भी समराङ्गण. में इसी रूप में हैं—उद्दिष्टे स्थापयेत् सङ्ख्यामुद्दिष्टं सम्भवे(जे)च्च ताम्। दलयेद् रूपयुक्तां तु दलयेन्नाम सम्भवेत्॥ लघुस्वरूपदलने सैकार्धे करणे गुरुः। यावदिष्टपदाप्तिः स्याल्लघवोऽलिन्दकोदयः॥ (समराङ्गण. 26, 74-75)

374 अपराजितपृच्छा इसी प्रकार उद्दिष्टछन्द के क्रम में इष्ट संख्या को स्थापित करें, पुनः उसको समान रूप से विभाजित करे। रूप वाली संख्या लघु स्वरूप के दलन में आधे सहित एक में जब गुरु बन जाए और इष्टपद की प्राप्ति हो जाए और सारे लघु हो जाए तब अलिन्द का उदय होता है अर्थात् लघु स्वरूप में बाँटने पर आधे गुरु करते हुए जब तक इष्ट पद न आए तब तक लघु अलिन्द बनते जाएँगे। कृत्वा छन्दः समुद्दिष्टं तदन्ते लघुनि द्विकम्। न्यसेदेकं गुरूणां च द्विगुणं द्विगुणं ततः॥ 53॥ व्यत्ययाल्लघुनः स्थाने द्विगुणादेककं गुरोः। कुर्यात् तमाद्यस्थानाङ्कसङ्ख्यं नष्टे गृहं भवेत्॥ 54॥¹ इत्युद्दिष्टनष्टछन्द। इसी प्रकार चाहा गया छन्द करके उसके अन्त में दो लघु रखें फिर एक गुरु रखे फिर उनको दुगुना-दुगुना करते जाए। फिर लघु के स्थान पर दुगुने युक्त को परस्पर रखे फिर उसको आद्य संख्या स्थान तक ले तो इसे नष्ट गृह कहते हैं। आशय यह है कि छन्द को समुद्दिष्ट करके अन्त लघु में एक जोड़ा न्यस्त करें, फिर दुगुना-दुगुना गुरुओं को विन्यास कर फिर इस क्रिया को पलट दे, लघु के स्थान में एक गुरु रखे तो नष्ट में आदि संख्या वाला गृह कहलाता है। प्राक्स्यैकं कोष्ठमेकैकवृद्ध्या न्यस्येदूर्ध्वं पङ्क्त्यो यावदिष्ट्राः। इष्टानेकार्दींलिखेदानुपूर्व्या कर्णेनाधः शून्यरूपे च दद्यात्॥ 55॥ कोष्ठक में एक रखकर एक-एक कोष्ठक में वृद्धि करते जाए; यह ऊपर की पङ्क्ति में रखते जाएँ जब तक की इष्ट की प्राप्ति न हो जाए, एकादि से इष्टों को लिखकर अनुपूर्व कर्ण के नीचे शून्य रूप में लिखें। कर्णस्थाङ्कश्लेषतोऽङ्के भवेद् यस्तं विन्यस्येत् कोष्ठकेषु क्रमेण। उद्दिष्टाङ्को भद्रसङ्ख्यानि मध्ये याभ्यः कर्णश्लेषतो मूषिकास्ताः॥ 56॥ एकादिषु द्विगुणितेष्विहः यावदिष्टमूषाक्रमव्युपहितेष्वथ तेषु विद्यात्। उद्दिष्टवेश्मकृतनिर्गममार्गमूषासत्काङ्कसैकयुतिनिर्मितसङ्ख्यमोकः॥ 57॥²

  1. तुलनीय- कृत्वा छन्दः समुद्दिष्टं तदन्ते लघुनि द्विकम्। न्यसेदेकं गुरूणां च द्विगुणं द्विगुणं ततः॥ व्यत्ययाल्लघुनः स्थाने द्विगुणादेककं गुरोः। कुर्या तमाद्यस्थानाङ्कसङ्ख्यं नष्टे गृहं भवेत्॥ (समराङ्गण. 26, 76-77)
  2. ये श्लोक समराङ्गणकार के हैं। तुलनीय- प्राक्स्यैकं कोष्ठमेकैकवृद्ध्या न्यस्येदूर्ध्वं पङ्क्तयो यावदिष्ट्राः। इष्टानेकादींलिखेदानुपूर्व्या कर्णेनाधः शून्यरूपे च दद्यात्॥ कर्णस्थाङ्कश्लेषतोऽङ्के भवेद् यस्तं विन्यस्येत् कोष्ठकेषु क्रमेण। उद्दिष्टाङ्को भद्रसङ्ख्यानि मध्ये याभ्यः कर्णश्लेषतो मूषिकास्ताः॥ एकादिषु द्विगुणितेष्विह