अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 418, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६८ 373 अथ सूचीछन्दः — तद्दिनेष्टाद्यगा सङ्ख्येत्येकाद्यैस्तैस्ततो गृहे। न्यस्ताङ्कसङ्ख्याः सङ्ख्याः ¹गुरुलघ्वाद्यैः प्रकल्पिताः ॥ 48 ॥ अब सूचीछन्द के विषय में कहा जा रहा है। इसी प्रकार नेष्टाद्य संख्या को भी एक के बाद एक गृह में रखते जाए, उन अङ्क संख्या के न्यस्त रखने पर संख्या गुरु और लघु आदि प्रकल्पित होती है। एकैकमिष्टस्थानेषुः लिखेत् सैकेष्वतः( सैकेश्वतः! ) परम्। अन्त्याहृते पूर्वपूर्वयुक्तेनायोजयेत् परम् ॥ 49 ॥ एक-एक को इष्टस्थान पर लिखते जाए और एक से आगे अन्त तक पहली- पहली युक्ति अनुसार जोड़ते जाए अर्थात् पुनः अन्त की छोड़कर पहले-पहले वाली को दूसरी-दूसरी से मिलाएँ। अन्त्यादारभ्यं तद्भानावेकाद्येषु च पर्यायत्। अलिन्दादिषु यत्र स्यात् सङ्ख्या सूचीं तु तां विदुः ॥ 50 ॥² इति सूचीछन्दः। इसी प्रकार अन्त से पुनरारम्भ कर पीछे लौटे, जहाँ पर पर्याय से अलिन्द आदि की रचना में यह संख्या निकले, उसे विद्वानों ने सूचीछन्द कहा है। अथोद्दिष्टछन्द नष्टच्छन्दश्च — उद्दिष्टे स्थापयेत् सङ्ख्यामुद्दिष्टं सम्भजेच्च ताम्। दलयेद् रूपयुक्तां तु दलयेन्नाम सम्भवेत् ॥ 51 ॥ लघुस्वरूपदलने सैकार्धे करणे गुरुः। यावदिष्टपदाप्तिः स्याल्लघवोऽलिन्दकोदयः ॥ 52 ॥³
- समराङ्गण में यहाँ पाठ है—'स्युलिन्दाद्यैः प्रकल्पिताः।' इसका आशय होगा कि उसको छोड़कर पहली आदि इष्ट संख्याओं से अंक-विन्यास वाली संख्याओं को अलिन्दों से प्रकल्पित कर एक-एक को इष्ट स्थानों में रखें।
- ये श्लोक भी ज्यों के त्यों समराङ्गण. में मिलते हैं—तद्दिनेष्टाद्यगा सङ्ख्येत्येकाद्यैस्तैस्ततो गृहे। न्यस्ताङ्कसङ्ख्याः सङ्ख्याः स्युरलिन्दाद्यैः प्रकल्पिताः॥ एकैकमिष्टस्थानेषु लिखेत् सैकेश्वतः परम्। अन्त्याद(ह)ते पूर्वपूर्वयुक्तेनायोजयेत् परम्॥ अन्त्यादारभ्य तद्भानावेकाद्येषु च पर्यायत्। अलिन्दादिषु यत्र स्यात् सङ्ख्या सूचीं तु तां विदुः॥ (समराङ्गण. 26, 71-73)
- ये श्लोक भी समराङ्गण. में इसी रूप में हैं—उद्दिष्टे स्थापयेत् सङ्ख्यामुद्दिष्टं सम्भवे(जे)च्च ताम्। दलयेद् रूपयुक्तां तु दलयेन्नाम सम्भवेत्॥ लघुस्वरूपदलने सैकार्धे करणे गुरुः। यावदिष्टपदाप्तिः स्याल्लघवोऽलिन्दकोदयः॥ (समराङ्गण. 26, 74-75)