भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 417

372 अपराजितपृच्छा इति खण्डमेरुः ?। एक से आरम्भ करके उनके बाद के अङ्कों को पहली पङ्क्ति में रखें, दूसरों को पङ्क्ति के किनारे आदि से शून्यों की कल्पना करें। दूसरे कोष्ठक में भी उनको एक- एक करके, दूसरे को तीसरे कोष्ठक में क्रमशः रखते जाएँ। अब विकर्ण का योग जानने हेतु और ऊपर नीचे के योग लाने के लिए विकर्ण योग के फल को एक जगह कल्पित कर लेना चाहिए। इसका आशय है कि एक जिनके आरम्भ में है और एक ही जिनके अन्त में है, इस प्रकार के अङ्कों की पहली पङ्क्ति में रखें। इसमें भी यही क्रिया करें, पुनः तृतीय आदि कोष्ठकों में क्रमशः विकरण-योग से उत्पन्न या ऊर्ध्वाध योग से उत्पन्न अन्य अङ्कों का विन्यास करें। पुनः विकरण-योग से उत्पन्न फल की एक कोष्ठ में प्रकल्पना करें। एकाधिकानभीष्टायाः सङ्ख्यायास्तिर्यगालिखेत्। कोष्ठोनेतांश्च रूपादींस्तन्मध्ये द्विगुणोत्तरान् ॥ 46 ॥ एकोनं पृष्ठतस्तेषामेकं द्विगुणमग्रतः। नातिक्रमेत् परां सङ्ख्यां पताकाछन्द उच्यते।¹ गृहमालायुक्ताख्यातं पताकानामकं विदुः ॥ 47 ॥ इति पताकाछन्दः। एक से अधिक जब अभीष्ट हो तो उन संख्याओं को तिरछे लिखें। इन कोष्ठों को रूपादि मध्य दुगुणे करते जाएँ, एक के पीछे एक रखते हुए आगे वालों को दुगुना करते जाए। अब संख्या का अतिक्रमण न करें तो इसे 'पताका' छन्द कहते हैं। इसी को विद्वज्जन 'गृहमाला' नाम से भी पताका छन्द कहते हैं। आशय यह है कि अभीष्ट संख्या को एक से अधिक तिरछे लिखें। मध्य में दुगुने-दुगुने अन्तः कोष्ठ-रूपादि का न्यास करें। उनमें से पीछे एक संख्या कम करें और अग्रतः एक को दुगुना कर यदि परा संख्या का अतिक्रमण न हो तो पताका-छन्द होता है। वामविभागाचितानधः॥ एकाद्येकोत्तरानङ्गानाद्यपङ्क्तौ निवेशयेत्। अन्यासु पङ्क्तिष्वाप्रान्तं शून्यान्या(ना)द्येषु कल्पयेत्॥ द्वितीयेषु च कोष्ठेषु तासामेकैकमावयेत्। द्वितीयायां तृतीयादिकोष्ठकेषु यथाक्रमम्॥ विकर्णयोगजानन्यानूर्ध्वाधोयोगसम्भवान्। फलं विकर्णयोगोत्थमेकस्मिन् परिकल्पयेत्॥ (समराङ्गण. 26, 64-68)

  1. ये श्लोक ज्यों के त्यों समराङ्गण. में आए हैं— एकाधिकानभीष्टयाः सङ्ख्यायास्तिर्यगालिखेत्। कोष्ठानेकांश्च (तांश्च) रूपादींस्तन्मध्ये द्विगुणोत्तरान्॥ एकोनं पृष्ठतस्तेषामेकं द्विगुणमग्रतः। नातिक्रमेत् परां सङ्ख्यां पताकाछन्द उच्यते॥ (समराङ्गण. 26, 69-70)
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