भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 404

सूत्र-६७ ३५९ अथ गुणाः — शान्तिः कर्णश्च सम्पातः सिंहो बाणश्च पल्लवः । कर्णकारः शुक्रः शङ्कुस्तथाधर्मो गुणा दश ॥ 14 ॥ शान्ति, कर्ण, सम्पात, सिंह, बाण, पल्लव, कर्णकार, शुक्र, शङ्कु और धर्म— ये दस गुण कहे गए हैं। जयमाला तथा नन्दा मेघा च सिंहगर्जना । तथा कल्लोलतरङ्गा रत्नावली पुष्पोद्गिरा ॥ 15 ॥ पत्रोद्गवा अत्युद्गुता अतिच्छन्दा दशोदिताः । एते दशाभिधानाश्च विषमा वाद्यकन्दतः ? ॥ 16 ॥ जयमाला, नन्दा, मेघा, सिंहगर्जना, कल्लोलतरङ्गा, रत्नावली, पुष्पोद्गिरा, पत्रोद्गवा, अत्युद्गुता और अतिच्छन्दा— ये दश, इतने दशाभिधान है। अथार्याच्छन्दोद्भूत छन्दं — शान्ताद्भुता मुख्या सौम्या रम्या च रमणी पुरा । मुखोद्गीर्णा चपलाख्या भैरवी भुवनोत्तमा ॥ 17 ॥ शृङ्गारी हास्यकरणी तिलकारा पद्मोद्भवा । विकारास्या प्रज्ञावती प्रबला वीरसम्भवा ॥ 18 ॥ प्रकारणाक्षसम्भूर्तिर्विकास्याथ प्रभामला । चतुर्विंशतिरार्याणां छन्दसां च समुद्भवाः ॥ 19 ॥ (पूर्व श्लोकानुसार) विषमा, शान्ता, अद्भुता, मुख्या, सौम्या, रम्या, रमणी, पुरा, मुखोद्गीरा, चपला, भैरवी, भुवनोत्तमा, शृङ्गारी, हास्यकरणी, तिलकारा, पद्मोद्भवा, विकारास्या, प्रज्ञावती, प्रबला, वीरसम्भवा, प्रकारण, अक्षसम्भूर्ति, विकास्या और प्रभामला— ये चौबीस आर्या छन्दों से सम्भूत है। प्रकरणादीनां — प्रकरणसूत्रसन्धिपरिच्छेदाध्यायास्तथा । अङ्ककाण्डसर्गखण्डवर्गाद्या ग्रन्थसम्भवाः ॥ 20 ॥ (ग्रन्थ रचना में विषय-वस्तु के विभाजन के लिए) प्रकरण, सूत्र, सन्धि, परिच्छेद, अध्याय, अङ्क, काण्ड, सर्ग, खण्ड, वर्ग (विरचन, उल्लास) आदि से ग्रन्थ रचना सम्भव होती है।