भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 403

358 अपराजितपृच्छा एकाक्षरो द्रुतमात्रो भेदः सूर्यः स उच्यते । निबन्धपादाः पङ्क्तौ च वेदसंख्याः प्रकीर्तिताः ॥ ७ ॥ कलिकादिकवृत्तानां त्र्यष्टकं प्रोच्यते तथा । एकाक्षर और द्रुत मात्रा होने से उसे 'सूर्य' भेद (बारह) कहते हैं। निबन्ध पादपङ्क्तियों (दस) को 'वेदसंख्या' भेद (चार) तथा कलिकादिक वृत्तों को 'त्र्यष्टक' भेद (तियासी) कहते हैं। तेषां अभिधानपङ्क्तिमाह — तदभिधानपङ्क्तिं च कथयिष्याम्यनुक्रमात् ॥ ८ ॥ अब मैं इनकी अभिधानपङ्क्ति को भी अनुक्रम से कहता हूँ। कलिकाविकास्यवज्राः कुमारललितानुष्टुप् । अक्षमश्चैव प्रणम्योपेन्द्रवज्राजलानि च ॥ ९ ॥ करणराज्यं वसन्ततिलका चैव मालिनी । तिलगर्जतं चाद्भुता तथा च गिरिकर्णिका । शार्दूलविक्रीडितं च तथा चैवातिवृत्तकम् ॥ १० ॥ स्रग्धरा मदना मदनलता च मधुकरा । कलिका विकास्य, वज्रा, कुमारललिता, अनुष्टुप, अक्षम और प्रणम्य, उपेन्द्रवज्रा, जलवृत्त और करणराज्य, वसन्ततिलका, मालिनी और तिलगर्जत अद्भुता, गिरिकर्णिका, शार्दूलविक्रीडित, अतिवृत्तक, स्रग्धरा औरं मदना तथा मदनलता मधुकरा। अथ निबन्धमाह — निबन्धश्चाथ गोविन्दः प्रोक्ता मुक्ताफला तथा ॥ ११ ॥ शुद्धसमो विषमश्च विषमसमकस्तथा । समस्तुल्यपदैः ख्यातो विषमो विषमैः पदैः ॥ १२ ॥ विषमाक्षरगस्त्वेवं समवर्णगतस्तथा । विषमसमसञ्ज्ञश्च दशभेदाः ₁₀ क्रमोदिताः ॥ १३ ॥ इसके अतिरिक्त निबन्ध, गोविन्द, मुक्ताफल, शुद्धसम, विषम, विषमासम व समतुल्यपद के कारण और विषम-विषम पदों के कारण ख्यात हैं विषमाक्षरों में गए हुए भी ऐसे ही है, समवर्णगत की तरह विषमसम संज्ञा वाले— ऐसे दस भेद क्रमोदित हैं।